सरायकेला: ऐतिहासिक रथयात्रा महोत्सव के दौरान रविवार को गुंडिचा मंदिर में महाप्रभु श्री जगन्नाथ, बड़े भाई बलभद्र और बहन सुभद्रा ने राम–परशुराम अवतार के दुर्लभ एवं दिव्य भेष में श्रद्धालुओं को दर्शन दिए. इस अलौकिक स्वरूप के दर्शन के लिए सुबह से ही मंदिर परिसर में श्रद्धालुओं की भारी भीड़ उमड़ पड़ी. पूरा वातावरण “जय जगन्नाथ स्वामी, नयन-पथगामी भवतु मे.” के जयघोष से भक्तिमय बना रहा.


राम–परशुराम भेष केवल धार्मिक आस्था का प्रतीक नहीं, बल्कि धर्म की रक्षा, अधर्म के विनाश तथा सत्य और मर्यादा की स्थापना का संदेश भी देता है. भगवान परशुराम भगवान विष्णु के छठे तथा भगवान श्रीराम उनके सातवें अवतार माने जाते हैं. इन दोनों अवतारों के आध्यात्मिक संदेश को एक साथ प्रस्तुत करने वाला यह दिव्य स्वरूप श्रद्धालुओं के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बना रहा.
सरायकेला की यह भेष-सज्जा परंपरा सदियों पुरानी मानी जाती है. मान्यता है कि राम–परशुराम अवतार का यह विशेष भेष केवल सरायकेला की ऐतिहासिक रथयात्रा में ही देखने को मिलता है. यही परंपरा इसे देश की अन्य रथयात्राओं से अलग और विशिष्ट पहचान प्रदान करती है.
महाप्रभु के इस दिव्य भेष की सज्जा गुरु श्री सुशांत महापात्र के मार्गदर्शन में की गई. इस सेवा में पार्थ सारथी दास, उज्ज्वल सिंह, सुमित महापात्र, अनुभव सतपथी, शुभम कर, कान्हू महापात्र, मुकेश साहू तथा गौतम बनर्जी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई. सेवायतों के समर्पण और श्रद्धा से महाप्रभु का यह अलौकिक स्वरूप साकार हुआ, जिसकी श्रद्धालुओं ने मुक्त कंठ से सराहना की.
श्रद्धालुओं ने महाप्रभु के दिव्य दर्शन कर सुख, शांति और समृद्धि की कामना की. गुंडिचा मंदिर परिसर दिनभर भक्ति, आस्था और आध्यात्मिक उल्लास से सराबोर रहा.
प्रमोद सिंह (संपादक)





