
सरायकेला- खरसावां: जिले की सड़कें इन दिनों विकास की नहीं, बल्कि विनाश की कहानी बयां कर रही हैं. करोड़ों रुपये खर्च कर बनाई गई सड़कें समय से पहले टूट रही हैं, पुल क्षतिग्रस्त हो रहे हैं और आए दिन होने वाले हादसों में लोगों की जान जा रही है. इसके बावजूद ओवरलोड वाहनों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई कहीं नजर नहीं आ रही है.


सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर 30 टन क्षमता वाली सड़कों पर 100 से 150 टन तक भार लेकर दौड़ने वाले भारी वाहनों को संरक्षण कौन दे रहा है ? स्थानीय लोगों का आरोप है कि श्री सीमेंट और रुंगटा माइंस से जुड़े भारी वाहन दिन-रात सड़कों पर दौड़ रहे हैं और पूरी सड़क व्यवस्था को बर्बाद कर रहे हैं.
डेढ़ साल में उखड़ गई करोड़ों की सड़क
सरायकेला-राजनगर मार्ग इसका सबसे बड़ा उदाहरण बन चुका है. करोड़ों रुपये की लागत से बनी यह सड़क डेढ़ साल भी नहीं टिक सकी. निर्माण के बाद दो बार मरम्मत कराई गई, लेकिन आज फिर सड़क बड़े-बड़े गड्ढों में तब्दील हो चुकी है.
सवाल उठता है कि आखिर गलती सड़क निर्माण में है या फिर ओवरलोड वाहनों के दबाव में. यदि सड़क मानक के अनुसार बनी थी तो इतनी जल्दी क्यों टूट गई? और यदि निर्माण में गड़बड़ी हुई थी तो जिम्मेदारों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई ?
तीतिरबिला पुल पर मंडरा रहा खतरा
सरायकेला- राजनगर मार्ग पर स्थित तीतीरबिला पुल भी लगातार चिंता का विषय बना हुआ है. स्थानीय लोगों के अनुसार पुल दो बार क्षतिग्रस्त हो चुका है. हर बार मरम्मत होती है, फिर कुछ महीनों बाद वही स्थिति सामने आ जाती है. क्या पुल की क्षमता से कई गुना अधिक वजन लेकर गुजर रहे वाहनों की वजह से ऐसा हो रहा है ? यदि हां, तो प्रशासन अब तक मौन क्यों है ?
सड़कें नहीं, मौत के गलियारे बन चुके हैं मार्ग
सरायकेला- टाटा, सरायकेला- राजनगर, सरायकेला- चाईबासा और सरायकेला- खरसावां मार्ग पर लगातार दुर्घटनाएं हो रही हैं. पिछले दिनों कई लोगों की जान सड़क हादसों में जा चुकी है. टूटे हुए रास्ते, गहरे गड्ढे और भारी वाहनों का दबाव इन हादसों की बड़ी वजह माने जा रहे हैं. आम लोगों का कहना है कि सड़क सुरक्षा समिति की बैठकें सिर्फ कागजों तक सीमित हैं. हर महीने समीक्षा होती है, लेकिन जमीन पर न तो ओवरलोडिंग रुकती है और न ही सड़कों की हालत सुधरती है.
क्या बड़े उद्योगों के सामने बेबस है सिस्टम ?
क्षेत्र में चर्चा है कि बड़े उद्योग समूहों और खनन कंपनियों के प्रभाव के कारण प्रशासनिक कार्रवाई अपेक्षित स्तर पर नहीं हो पाती. भले इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हो, लेकिन जब छोटे वाहन चालकों पर तुरंत कार्रवाई होती है और सैकड़ों टन भार लेकर चलने वाले वाहनों पर कोई रोक नहीं लगती, तो सवाल उठना स्वाभाविक है. यदि कानून सबके लिए बराबर है तो फिर ओवरलोड वाहनों पर विशेष छूट क्यों दिखाई देती है ?
जवाबदेही तय होगी या नहीं ?
सड़कें जनता के टैक्स के पैसे से बनती हैं. यदि कुछ कंपनियों के भारी वाहनों के कारण सड़कें टूट रही हैं, पुल क्षतिग्रस्त हो रहे हैं और दुर्घटनाओं में लोगों की जान जा रही है, तो नुकसान की भरपाई कौन करेगा ?
क्या सड़क निर्माण पर हर साल करोड़ों रुपये खर्च होते रहेंगे और जनता अपनी जान जोखिम में डालती रहेगी? क्या ओवरलोड वाहनों के कारण हुए नुकसान की भरपाई संबंधित कंपनियों से वसूली जाएगी ? क्या परिवहन विभाग, जिला प्रशासन और पथ निर्माण विभाग अपनी जिम्मेदारी तय करेंगे ?
सबसे बड़ा सवाल
सरायकेला- खरसावां की जनता जानना चाहती है कि आखिर कब तक श्री सीमेंट और रुंगटा माइंस से जुड़े कथित ओवरलोड वाहनों का बोझ उनकी सड़कों और उनकी जान पर पड़ता रहेगा ? और कब प्रशासन सड़कों को बचाने तथा लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए निष्पक्ष और कठोर कार्रवाई करेगा ?
प्रमोद सिंह
संपादक






