
सरायकेला. जिले में भारी वाहनों के बढ़ते दबाव और कथित ओवरलोडिंग के कारण सड़क व्यवस्था गंभीर संकट में पहुंचती दिख रही है. सरायकेला-टाटा, सरायकेला-राजनगर, सरायकेला-चाईबासा और सरायकेला-खरसावां मार्गों की स्थिति लगातार बिगड़ती जा रही है, जिससे आम लोगों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं.


स्थानीय लोगों के अनुसार 30 टन क्षमता वाली सड़कों पर 100 से 150 टन तक भार लेकर भारी वाहन बेरोकटोक चल रहे हैं. आरोप है कि इन मार्गों पर श्री सीमेंट और रुंगटा माइंस से जुड़े भारी वाहनों का लगातार परिचालन हो रहा है, जिसके कारण सड़कें जगह-जगह से टूट चुकी हैं और बड़े-बड़े गड्ढे बन गए हैं.
सरायकेला-राजनगर मार्ग की स्थिति सबसे अधिक चिंताजनक बताई जा रही है. यह सड़क करीब डेढ़ वर्ष पहले बनी थी, लेकिन निर्माण के कुछ ही समय बाद इसमें दरारें और गड्ढे उभर आए. दो बार मरम्मत के बावजूद सड़क की स्थिति में सुधार नहीं हो सका है. इससे निर्माण गुणवत्ता और भारी वाहनों के दबाव दोनों पर सवाल उठ रहे हैं.
तीतीरबिला पुल की हालत भी स्थानीय लोगों के लिए चिंता का विषय बनी हुई है. जानकारी के अनुसार पुल दो बार क्षतिग्रस्त हो चुका है. मरम्मत के बाद इसे पुनः चालू किया गया, लेकिन कुछ समय बाद फिर इसकी स्थिति खराब हो गई. स्थानीय लोग सवाल उठा रहे हैं कि क्या यह लगातार नुकसान ओवरलोड वाहनों के कारण हो रहा है, और यदि हां तो जिम्मेदारी तय क्यों नहीं की जा रही है.
इन मार्गों पर आए दिन सड़क दुर्घटनाएं भी सामने आ रही हैं. कई लोगों की जान जा चुकी है, जबकि अनेक लोग गंभीर रूप से घायल हुए हैं. खराब सड़कें, गड्ढे और भारी वाहनों का दबाव इन हादसों के प्रमुख कारण माने जा रहे हैं. स्थानीय लोगों का कहना है कि प्रशासनिक दावों के बावजूद ओवरलोडिंग पर प्रभावी नियंत्रण नहीं हो पा रहा है.
सड़क सुरक्षा समिति की नियमित बैठकों में ओवरलोडिंग रोकने और सुरक्षित यातायात सुनिश्चित करने के दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति इसके विपरीत दिखाई देती है. न तो भारी वाहनों की प्रभावी जांच हो रही है और न ही सड़क संरक्षण को लेकर ठोस कार्रवाई दिखाई दे रही है.
क्षेत्र में यह चर्चा भी तेज है कि बड़े औद्योगिक और खनन संस्थानों के प्रभाव के कारण कार्रवाई में ढिलाई बरती जाती है, हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं है. लेकिन लगातार खराब हो रही सड़कें और निर्बाध ओवरलोड वाहनों का संचालन लोगों में कई सवाल जरूर खड़े कर रहा है.
स्थानीय जनता का कहना है कि सड़कें जनता के टैक्स के पैसे से बनती हैं, लेकिन भारी वाहनों के दबाव के कारण वे समय से पहले ही नष्ट हो रही हैं. इससे न केवल सरकारी धन की बर्बादी हो रही है बल्कि आम लोगों की जान भी खतरे में पड़ रही है.
सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्या प्रशासन ओवरलोड वाहनों पर सख्त कार्रवाई करेगा या फिर सरायकेला-खरसावां की जनता इसी तरह टूटती सड़कों और बढ़ते हादसों का बोझ उठाती रहेगी.
रिपोर्ट: प्रमोद सिंह






