सरायकेला: ऐतिहासिक रथयात्रा महोत्सव के पांचवें दिन सोमवार रात सरायकेला में सदियों से चली आ रही ‘रथ भंगिनी’ की परंपरा श्रद्धा, आस्था और वैदिक विधि-विधान के साथ संपन्न हुई. इस अनूठी धार्मिक आयोजन को देखने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौसीबाड़ी परिसर में जुटे. पूरे आयोजन के दौरान भक्ति और उत्साह का वातावरण बना रहा.



रथ भंगिनी की परंपरा ओडिशा के पुरी स्थित श्रीजगन्नाथ मंदिर में मनाई जाने वाली प्रसिद्ध हेरा पंचमी की तर्ज पर निभाई जाती है. पौराणिक मान्यता के अनुसार, भगवान जगन्नाथ अपनी पत्नी देवी महालक्ष्मी को श्रीमंदिर में छोड़कर बड़े भाई भगवान बलभद्र और बहन देवी सुभद्रा के साथ नौ दिनों के लिए मौसीबाड़ी (गुंडिचा मंदिर) जाते हैं. कई दिनों तक भगवान के वापस नहीं लौटने पर देवी महालक्ष्मी क्रोधित होकर मौसीबाड़ी पहुंचती हैं.
इसी प्रसंग की स्मृति में रथ भंगिनी की परंपरा का निर्वहन किया जाता है. धार्मिक मान्यता के अनुसार, देवी महालक्ष्मी अपने मान और क्रोध के प्रतीक स्वरूप भगवान जगन्नाथ के रथ के एक हिस्से को क्षतिग्रस्त करती हैं. सरायकेला में भी इसी परंपरा का विधिवत पालन करते हुए धार्मिक अनुष्ठान के बीच भगवान के रथ को प्रतीकात्मक रूप से क्षतिग्रस्त किया गया. इसके बाद देवी महालक्ष्मी बिना भगवान से मिले पुनः श्रीमंदिर लौट गईं.
धार्मिक विद्वानों के अनुसार, रथ भंगिनी केवल एक धार्मिक रस्म नहीं है, बल्कि दांपत्य जीवन में प्रेम, मान-मनुहार, विरह और पुनर्मिलन की भावनाओं का प्रतीक मानी जाती है. हेरा पंचमी के बाद भगवान जगन्नाथ की बहुदा यात्रा (वापसी यात्रा) की तैयारियां प्रारंभ होती हैं और अंततः श्रीमंदिर लौटने पर भगवान जगन्नाथ एवं देवी महालक्ष्मी का पुनर्मिलन होता है.
सरायकेला में वर्षों से निभाई जा रही यह परंपरा स्थानीय संस्कृति और जगन्नाथ परंपरा का अद्भुत संगम मानी जाती है. हर वर्ष बड़ी संख्या में श्रद्धालु इस धार्मिक आयोजन के साक्षी बनने पहुंचते हैं. रथ भंगिनी की यह परंपरा न केवल आस्था का केंद्र है, बल्कि सरायकेला की सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत की महत्वपूर्ण पहचान भी है.
प्रमोद सिंह (संपादक)





