सरायकेला/ Pramod Singh जिले के ग्रामीण इलाकों में बिना लाइसेंस अंग्रेजी शराब की खुलेआम बिक्री अब सिर्फ अवैध कारोबार का मामला नहीं रह गया है, बल्कि यह व्यवस्था और कानून की व्याख्या पर गंभीर सवाल खड़े कर रहा है.

गांवों में काउंटर से धड़ल्ले से शराब बिकने की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं. हैरानी की बात यह है कि सख्त कार्रवाई के बजाय संबंधित लोगों पर मामूली जुर्माना लगाकर छोड़ देने की बात खुद विभागीय स्तर पर स्वीकार की जा रही है.
उत्पाद अधीक्षक क्षितिज विजय मिंज के अनुसार, यदि झारखंड निर्मित शराब गांवों में अवैध रूप से बिकती है तो उस पर हल्का जुर्माना लगाकर छोड़ दिया जाता है, जबकि अन्य राज्यों की शराब मिलने पर कड़ी कार्रवाई करते हुए सीधे जेल भेजा जाता है.
इस दोहरे रवैये ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं. जब बिना लाइसेंस शराब बेचना अपराध है, तो स्थानीय और बाहरी शराब के बीच यह फर्क क्यों ? क्या यह कानून की कमजोरी है या राजस्व से जुड़ा कोई खेल.
स्थिति यह संकेत देती है कि गांवों में बिक रही स्थानीय शराब को लेकर प्रशासन का रवैया नरम है, जिससे यह धारणा बन रही है कि यह अवैध नहीं बल्कि अघोषित रूप से वैध कारोबार बन गया है.
स्थानीय लोगों का आरोप है कि इस अवैध बिक्री में विभागीय स्तर पर मिलीभगत की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता. वहीं दूसरी ओर सरकार जहां नशामुक्ति की बात करती है, वहीं गांव- गांव में शराब की आसान उपलब्धता सामाजिक माहौल को प्रभावित कर रही है. अब सवाल यह उठता है कि लागू नियमों का मकसद क्या है ? नियंत्रण या केवल राजस्व संग्रह !

