जमशेदपुर: आज़ाद नगर में शनिवार रात पुरानी रंजिश ने हिंसक रूप लिया, चाकूबाजी हुई, कई लोग घायल हुए और बाइक भी फूंक दी गई. लेकिन इस पूरे घटनाक्रम में सबसे “शानदार टाइमिंग” अगर किसी की रही, तो वो पुलिस की रही.

रूहानी मरकज़ के पास महज 50 मीटर की दूरी पर यह सब होता रहा- चाकू चले, लोग लहूलुहान हुए, आगजनी भी हो गई और पुलिस शायद “सही मौके” का इंतजार करती रही. जैसे ही सब कुछ खत्म हुआ, पुलिस ने एंट्री मारी और अपना क्लासिक डायलॉग दोहराया “जांच जारी है”.
घायल मोहम्मद इब्राहिम उर्फ सोहेब और पप्पू अस्पताल में जिंदगी और मौत से जूझ रहे हैं, जबकि हमलावरों में से कुछ फरार हैं. लेकिन पुलिस की सक्रियता का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि वारदात के बाद इलाके में गश्त तेज कर दी गई है. यानी जब सब हो गया, तब एक्शन शुरू.
स्थानीय लोगों का कहना है कि अगर समय पर पुलिस पहुंचती, तो शायद मामला इतना नहीं बिगड़ता. लेकिन यहां तो जैसे “घटना होने दो, फिर कार्रवाई करो” की नीति पर काम हो रहा है.
एमजीएम अस्पताल में घायलों का इलाज चल रहा है और एक की हालत गंभीर बनी हुई है. उधर पुलिस कागजी कार्रवाई और आरोपियों की तलाश में जुटी है. अब सवाल यह उठता है कि क्या शहर में कानून- व्यवस्था केवल कागजों तक सीमित रह गई है ? क्या पुलिस की भूमिका सिर्फ घटनाओं के बाद “स्थिति नियंत्रण” तक ही सीमित है ? फिलहाल इलाके में तनाव है, पुलिस तैनात है और जांच जारी है. लेकिन जनता के मन में एक ही सवाल है- अगर यही “रफ्तार” रही, तो अगली घटना में भी क्या पुलिस इसी तरह “लेट एंट्री” करेगी ?

