जमशेदपुर: शहर में एक बार फिर पुलिस एनकाउंटर की घटना ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं. शहर में सोमवार देर शाम शुरू हुई चेन स्नैचिंग की वारदात रात गहराने के साथ एक ऐसे घटनाक्रम में बदल गई, जिसने छह महीने पहले हुए चर्चित कैरव गांधी अपहरण कांड की यादें ताजा कर दीं.


कहानी की शुरुआत टेल्को इलाके से हुई, जहां बाइक सवार दो अपराधियों द्वारा एक महिला से चेन छीनने की सूचना मिली. इसके बाद शहर की करीब आधा दर्जन थानों की पुलिस सक्रिय हुई और अपराधियों की घेराबंदी शुरू कर दी गई. पुलिस का दावा है कि खुद को घिरता देख अपराधियों ने फायरिंग शुरू कर दी. जवाबी कार्रवाई में एक अपराधी घायल हुआ, जबकि दो आरोपी सिदगोड़ा स्थित JAP-6 परिसर में घुस गए, जहां उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया.
लेकिन असली कहानी इसके बाद शुरू होती है.
पुलिस के अनुसार, गिरफ्तार अपराधी हरपाल सिंह उर्फ गबरू को देर रात लूटी गई चेन की बरामदगी के लिए टाउन हॉल क्षेत्र ले जाया गया था. इसी दौरान उसने टाइगर मोबाइल के जवान तबरेज का सर्विस रिवॉल्वर छीन लिया और पुलिस पर फायरिंग करने का प्रयास किया. पुलिस ने जवाबी कार्रवाई की और हरपाल सिंह घायल हो गया. फिलहाल उसका इलाज एमजीएम अस्पताल में चल रहा है. पुलिस की यह कहानी सुनने में किसी क्राइम थ्रिलर फिल्म की पटकथा जैसी लगती है. लेकिन यहीं से कई सवाल भी खड़े होते हैं.
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस अपराधी को कुछ घंटे पहले ही हाई-प्रोफाइल ऑपरेशन के तहत गिरफ्तार किया गया था, वह इतनी कड़ी सुरक्षा के बीच जवान का हथियार कैसे छीन लेता है ? क्या पुलिस टीम ने सुरक्षा प्रोटोकॉल का पालन नहीं किया था ? क्या आरोपी के हाथ बंधे नहीं थे ? क्या उसकी तलाशी और निगरानी पर्याप्त नहीं थी ?

सिदगोड़ा थाना प्रभारी फैयाज़ अहमद
दिलचस्प बात यह है कि इसी साल जनवरी में हुए कैरव गांधी अपहरण कांड में भी लगभग ऐसी ही कहानी सामने आई थी. तब भी गिरफ्तार अपराधी को हथियार बरामदगी के लिए घटनास्थल ले जाया गया था. तब भी आरोपी द्वारा पुलिस का हथियार छीनकर फायरिंग करने और जवाबी कार्रवाई में घायल होने की कहानी सामने आई थी. उस घटना को लेकर पुलिस की कार्यशैली पर कई सवाल उठे थे.
संयोग देखिए कि तब भी शहर के एसएसपी पियूष पांडे थे और सोमवार की घटना के समय भी वही एसएसपी हैं. उस मामले में बिष्टुपुर थाना प्रभारी आलोक दुबे चर्चा में थे और इस बार भी अपराधियों की घेराबंदी करने वाली टीम में उनकी सक्रिय भूमिका बताई जा रही है.
हालांकि पुलिस की बहादुरी पर सवाल नहीं उठाए जा सकते. यदि पुलिस के दावे सही हैं तो जवानों ने बेहद साहस का परिचय दिया. पूरे शहर में पीछा, फायरिंग और मुठभेड़ के बावजूद किसी आम नागरिक को नुकसान नहीं पहुंचा. यह पुलिस की पेशेवर क्षमता को भी दर्शाता है. लेकिन लोकतंत्र में हर एनकाउंटर और हर पुलिस कार्रवाई की जांच और समीक्षा भी उतनी ही जरूरी होती है. क्योंकि सवाल सिर्फ यह नहीं है कि अपराधी घायल कैसे हुआ. सवाल यह भी है कि ऐसी परिस्थितियां बार-बार क्यों बन रही हैं, जहां गिरफ्तार आरोपी पुलिस का हथियार छीनने में सफल हो जा रहे हैं.

घटनास्थल की जांच करती पुलिस
जमशेदपुर की यह ताजा घटना अब दो बहसों को जन्म दे रही है. पहली, क्या शहर के अपराधी इतने बेखौफ हो चुके हैं कि पुलिस हिरासत में भी हथियार छीनने की कोशिश कर रहे हैं ? और दूसरी, क्या पुलिस की कुछ कार्रवाईयों में अब भी ऐसे सवाल हैं जिनका जवाब जनता जानना चाहती है ?

MGM अस्पताल में सुरक्षा कड़ी
फिलहाल सच क्या है, इसका अंतिम जवाब जांच के बाद ही सामने आएगा. लेकिन इतना तय है कि सोमवार रात का यह घटनाक्रम सिर्फ एक स्नैचिंग केस नहीं रहा. इसने पुलिसिंग, सुरक्षा व्यवस्था और एनकाउंटर की कहानियों पर नई बहस छेड़ दी है.

