आदित्यपुर: वार्ड संख्या 9 के मीरूडीह में करोड़ों रुपये की लागत से तैयार कचरा ट्रीटमेंट प्लांट को शुरू कराने की कोशिश ने आदित्यपुर नगर निगम की कार्यप्रणाली और निर्वाचित जनप्रतिनिधियों की भूमिका पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं. बुधवार को ग्रामीणों के विरोध और हंगामे के बीच जहां डिप्टी मेयर कुछ पार्षदों के साथ मौके पर डटे नजर आए, वहीं मेयर संजय सरदार के विलंब से पहुंचने और पहुंचते ही दोबारा वार्ड सभा तथा परियोजना की फाइल जांचने की बात कहने से पूरा मामला और उलझ गया.


सवाल इसलिए भी बड़ा है क्योंकि जिस परियोजना को आदित्यपुर की वर्षों पुरानी कचरा समस्या के समाधान के रूप में देखा जा रहा है, उसे शुरू कराने के वक्त निगम के 35 वार्डों में से महज पांच- छह पार्षद ही मौके पर दिखाई दिए. बाकी पार्षद कहां थे ? क्या उन्हें इस महत्वपूर्ण कार्यक्रम की जानकारी नहीं थी ? या फिर करोड़ों की इस परियोजना को लेकर नगर निगम के निर्वाचित बोर्ड में ही एक राय नहीं है ?
डिप्टी मेयर पहुंचे, मेयर को आने में देर क्यों लगी ?
बुधवार के घटनाक्रम में सबसे अधिक चर्चा मेयर और डिप्टी मेयर की भूमिका को लेकर है. डिप्टी मेयर ने पांच-छह पार्षदों के साथ मौके पर पहुंचकर प्लांट शुरू कराने की पहल की. ग्रामीणों का विरोध सामने आने के बावजूद वे मौके पर मौजूद रहे. इसके उलट सवाल उठ रहा है कि इतनी महत्वपूर्ण परियोजना को शुरू कराने के समय मेयर शुरुआत से मौके पर क्यों नहीं थे ? ग्रामीणों का विरोध और हंगामा शुरू होने के बाद उनके पहुंचने में विलंब क्यों हुआ ? यदि यह नगर निगम की प्राथमिक परियोजना थी तो मेयर के नेतृत्व में निगम बोर्ड को पहले से वहां मौजूद नहीं होना चाहिए था ? इन सवालों पर मेयर का कहना है कि मैंने कहा कि आप लोग जाकर प्लांट चालु करवाइए यदि कोई परेशानी होती है तो मैं आऊंगा. सवाल यही सबसे बड़ा है. जहां बात-बात पर फोटो खिंचवाने और श्रेय लेने के मामले में मेयर पूरे तामझाम के साथ पहुंचते हैं उनका सोशल मीडिया सेल उनसे पहले पहुंचकर पूरी तैयारी में जुटा रहता है इतनी बड़ी परियोजना को लेकर वह देर से क्यों पहुंचे ? इतना ही नहीं उन्होंने पुनः वार्ड सभा और फाईल जांच कराने की बात कहकर पूरे परियोजना पर सवालिया निशान खड़ा कर दिया क्यों ?
डिप्टी मेयर की पहल को इस मायने में महत्वपूर्ण माना जा सकता है कि वे सीमित संख्या में पार्षदों के साथ ही सही, तैयार प्लांट को शुरू कराने पहुंचे. मगर मेयर के पहुंचने के बाद घटनाक्रम ने दूसरा मोड़ ले लिया. अब सवाल सीधा है- जब करोड़ों रुपये खर्च करके प्लांट बन चुका है तो मेयर को उसकी फाइल जांचने की जरूरत उद्घाटन के समय क्यों महसूस हुई ?
क्या मेयर को इससे पहले परियोजना की स्वीकृति, जमीन, स्थानीय सहमति और निर्माण प्रक्रिया की जानकारी नहीं थी ? यदि जानकारी थी तो दोबारा वार्ड सभा क्यों ?और यदि जानकारी नहीं थी तो नगर निगम की इतनी बड़ी परियोजना बिना शीर्ष निर्वाचित नेतृत्व की पूरी जानकारी के यहां तक कैसे पहुंच गई ?
35 वार्ड, मौके पर पांच- छह पार्षद- बाकी की जवाबदेही कौन तय करेगा ?
इस पूरे घटनाक्रम में केवल मेयर ही नहीं, बाकी पार्षदों की भूमिका भी सवालों से परे नहीं है. आदित्यपुर नगर निगम में 35 वार्ड हैं. यदि मीरूडीह प्लांट पूरे शहर के कचरे के निष्पादन से जुड़ा है तो यह केवल वार्ड 9 का मामला नहीं है. फिर बाकी पार्षद कहां थे ? शहर में नाली, सड़क, पानी और सफाई के मुद्दे पर आवाज उठाने वाले जनप्रतिनिधियों के लिए शहर के कचरे के स्थायी निष्पादन से जुड़ी इतनी बड़ी परियोजना प्राथमिकता क्यों नहीं बनी ?यदि पांच-छह पार्षद पहुंच सकते थे तो बाकी क्यों नहीं ?क्या पार्षदों को कार्यक्रम की सूचना नहीं दी गई थी ? यदि सूचना नहीं दी गई तो जिम्मेदार कौन है ? और यदि सूचना मिलने के बावजूद वे नहीं पहुंचे तो उन्हें अपने- अपने वार्ड की जनता को बताना चाहिए कि शहर की इतनी महत्वपूर्ण परियोजना से उन्होंने दूरी क्यों बनाई.
मेयर का सवाल ग्रामीणों से पहले अपने सिस्टम से होना चाहिए
ग्रामीण पूछ रहे हैं कि प्लांट स्थापित करने से पहले उनकी सहमति ली गई थी या नहीं. लेकिन अब यही सवाल मेयर को अपने अधिकारियों से पूछना चाहिए. परियोजना की फाइल कहां है ? स्थानीय स्तर पर कौन सी बैठक हुई ? उसमें कौन शामिल हुआ ? जमीन का चयन किसने किया ? डीपीआर किसने तैयार की ? आवश्यक स्वीकृतियां किसने जांचीं ? और यदि सब कुछ नियम के मुताबिक हुआ तो बुधवार को निगम पीछे क्यों हटा ? करोड़ों रुपये खर्च होने के बाद फाइल जांचने की घोषणा प्रशासनिक सतर्कता है या परियोजना की प्रक्रिया पर स्वयं निगम नेतृत्व को ही भरोसा नहीं है- यह स्पष्ट होना चाहिए.
जब प्लांट बन रहा था तब मेयर और पार्षदों ने सवाल क्यों नहीं पूछा ?
यह सवाल ग्रामीणों से जितना है, उससे कम नगर निगम के निर्वाचित प्रतिनिधियों से नहीं है. प्लांट रातोंरात खड़ा नहीं हुआ. योजना बनी होगी, जमीन चिह्नित हुई होगी, डीपीआर तैयार हुई होगी, टेंडर हुआ होगा और निर्माण चला होगा. इस पूरी अवधि में स्थानीय विरोध था तो उसका समाधान क्यों नहीं कराया गया ? और यदि विरोध नहीं था तो प्लांट चालू करने के ठीक समय ऐसा क्या हुआ कि निगम को दोबारा वार्ड सभा की जरूरत पड़ गई ?
शनिवार को ग्रामीणों ने ‘ना’ कहा तो करोड़ों का जिम्मेदार कौन ?
अब असली परीक्षा शनिवार की प्रस्तावित वार्ड सभा में होगी. मान लीजिए ग्रामीण प्लांट शुरू करने से साफ इनकार कर देते हैं. तब क्या होगा ?
• क्या करोड़ों रुपये से बना प्लांट सफेद हाथी बन जाएगा ?
• क्या नई जमीन खोजी जाएगी ?
• क्या दूसरी जगह फिर सरकारी पैसा खर्च होगा ?
यदि ऐसा हुआ तो इसकी जिम्मेदारी कौन लेगा- अधिकारी, मेयर, स्थानीय प्रतिनिधि या पूरा निगम बोर्ड ? जनता का पैसा खर्च करने के बाद जिम्मेदारी ग्रामीणों के विरोध पर डालकर मामला समाप्त नहीं किया जा सकता.
आदित्यपुर के कचरे का समाधान कौन करेगा ?
मीरूडीह विवाद ने एक और असहज सवाल खड़ा कर दिया है. आदित्यपुर का कचरा आखिर जाएगा कहां ? हर वार्ड चाहता है कि उसके इलाके से कचरा उठे, लेकिन उसका वैज्ञानिक निष्पादन कहां और कैसे हो, इस पर निगम नेतृत्व और सभी 35 पार्षदों को सामूहिक जवाब देना होगा. बुधवार की तस्वीर में यह सामूहिकता नजर नहीं आई. एक तरफ डिप्टी मेयर कुछ पार्षदों के साथ प्लांट शुरू कराने की कोशिश करते दिखाई दिए, दूसरी तरफ अधिकांश पार्षद नदारद रहे और मेयर विरोध बढ़ने के बाद मौके पर पहुंचे. इसलिए अब केवल ग्रामीणों से सवाल करना पर्याप्त नहीं है.
पहला सवाल नगर निगम के नेतृत्व से है- करोड़ों की परियोजना तैयार होने तक सब ठीक था तो उद्घाटन के समय फाइल पर संदेह क्यों ?
दूसरा सवाल मेयर से है- हंगामे के बाद मौके पर पहुंचने की नौबत क्यों आई ?
और तीसरा सवाल उन पार्षदों से है जो वहां दिखाई ही नहीं दिए- शहर के कचरे की समस्या का समाधान यदि उनकी जिम्मेदारी नहीं है तो फिर किसकी है ?

