नई दिल्ली: सहारा समूह से जुड़े लंबे समय से लंबित मामलों की सुनवाई के दौरान सोमवार को सुप्रीम कोर्ट ने कर्मचारियों के बका,या वेतन दावों की जांच के लिए स्वतंत्र समिति (Independent Committee) गठित करने का संकेत दिया है. अदालत ने स्पष्ट किया कि सेबी- सहारा रिफंड खाते से किसी भी राशि का भुगतान करने से पहले पात्र कर्मचारियों की स्वतंत्र जांच कराई जाएगी. पहली नजर में यह फैसला सकारात्मक और स्वागतयोग्य है. लेकिन इसके साथ ही कई बड़े सवाल भी खड़े हो गए हैं.



करीब 14 वर्षों से चले आ रहे सहारा- सेबी प्रकरण में हजारों कर्मचारी, लाखों एजेंट और करोड़ों निवेशक अब भी न्याय की प्रतीक्षा कर रहे हैं. अदालत ने कर्मचारियों के बकाये को प्राथमिकता देने का संकेत दिया है. यह मानवीय दृष्टिकोण से उचित भी है. लेकिन क्या न्याय की प्रक्रिया केवल यहीं तक सीमित रह जाएगी ?
सार्वजनिक डोमेन में उपलब्ध जानकारी के अनुसार सहारा समूह से जुड़े करोड़ों निवेशकों की जमा पूंजी वर्षों से फंसी हुई है. सरकार द्वारा शुरू किए गए सीआरसीएस- सहारा रिफंड पोर्टल के माध्यम से सीमित भुगतान हुए हैं. लेकिन आज भी बड़ी संख्या में निवेशकों को उनका पैसा नहीं मिल सका है. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर करोड़ों निवेशकों का भुगतान कब तक पूरा होगा.
दूसरा बड़ा सवाल सीआरसीएस- सहारा रिफंड पोर्टल की प्रक्रिया को लेकर है. दस्तावेज सत्यापन, आवेदन निरस्त होना, रिकॉर्ड का मिलान नहीं होना और तकनीकी त्रुटियों जैसी समस्याओं के कारण लाखों पात्र निवेशकों को भी भुगतान नहीं मिल पाया. यदि व्यवस्था ही इतनी जटिल होगी तो आम निवेशक न्याय तक कैसे पहुंचेगा !
इस पूरे प्रकरण का सबसे उपेक्षित पक्ष लगभग 12 लाख एजेंटों का है. जिन्होंने वर्षों तक गांव- गांव जाकर सहारा की योजनाओं को लोगों तक पहुंचाया. कारोबार बंद होने के बाद उनका रोजगार समाप्त हो गया. अनेक परिवार आर्थिक संकट में आ गए. कई लोगों ने मानसिक और सामाजिक प्रताड़ना झेली. विभिन्न सामाजिक दावों में आत्महत्या की घटनाओं का भी उल्लेख मिलता रहा है. हालांकि इन मामलों का कोई आधिकारिक समेकित आंकड़ा सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है.
सवाल यह भी है कि-
एजेंटों के फ्यूचर फंड (FF), बकाया कमीशन, टीडीएस और अन्य देयकों का हिसाब कौन देगा ?
क्या इस विषय पर भी कभी कोई स्वतंत्र जांच होगी ?
क्या शीर्ष अदालत के समक्ष इन पहलुओं की समग्र तस्वीर रखी गई है ?
सुप्रीम कोर्ट का यह कदम निश्चित रूप से कर्मचारियों के लिए उम्मीद की नई किरण है. यदि समिति समयबद्ध तरीके से अपनी रिपोर्ट प्रस्तुत करती है तो कर्मचारियों के भुगतान का रास्ता खुल सकता है. लेकिन न्याय तभी पूर्ण माना जाएगा जब निवेशकों, एजेंटों और इस पूरे प्रकरण से प्रभावित प्रत्येक वर्ग की पीड़ा का समाधान भी समान गंभीरता से किया जाए.
सहारा प्रकरण अब केवल एक वित्तीय विवाद नहीं रह गया है. यह देश की न्यायिक. प्रशासनिक और नियामक व्यवस्था की भी बड़ी परीक्षा बन चुका है. इतिहास जब इस मामले का मूल्यांकन करेगा. तब यह भी दर्ज होगा कि न्याय मिलने में कितना समय लगा. क्योंकि लोकतंत्र में एक सिद्धांत हमेशा प्रासंगिक रहेगा.
“विलंबित न्याय. न्याय की गुणवत्ता को कमजोर कर देता है.”
हालांकि शीर्ष अदालत ने छः बिंदुओं पर नियमित सुनवाई के लिए प्रत्येक शुक्रवार का दिन मुकर्रर किया है. इस दिन सहारा मामले की विशेष सुनवाई की जाएगी. इससे पूर्व कि मामला और लंबा खिंचे न्यायपालिका को मामले में गंभीर होना पड़ेगा और इस प्रकरण से जुड़े सभी पीड़ित पक्षो के प्रति सहानुभूति दिखानी होगी.





