सरायकेला/ Pramod Singh सरायकेला की पहचान मानी जाने वाली छऊ नृत्य परंपरा को लेकर एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं. एक ओर जहां सरायकेला राजघराना आज भी इस विरासत को सहेजने में पूरी प्रतिबद्धता के साथ जुटा हुआ है, वहीं दूसरी ओर प्रशासनिक स्तर पर हो रहे आयोजनों में स्थानीय कलाकारों की अनदेखी गंभीर चिंता का विषय बनती जा रही है.

इसका जीता- जागता उदाहरण है सरायकेला के राजा प्रताप आदित्य सिंहदेव द्वारा राजमहल परिसर में आयोजित तीन दिवसीय छऊ महोत्सव, जहां ग्रामीण और स्थानीय कलाकारों को न केवल मंच दिया जा रहा है, बल्कि उन्हें पूरा सम्मान और पहचान भी मिल रही है. यहां छऊ की मूल आत्मा और परंपरा को जीवंत रखने का सच्चा प्रयास दिखाई देता है. वहीं दूसरी ओर बिरसा मुंडा स्टेडियम में आयोजित राजकीय तीन दिवसीय छऊ महोत्सव की तस्वीर इससे बिल्कुल उलट नजर आ रही है.
स्थानीय लोगों और कलाकारों का आरोप है कि इस आयोजन में बाहरी कलाकारों को प्राथमिकता दी जा रही है, जबकि वर्षों से छऊ को जीवित रखने वाले ग्रामीण और स्थानीय कलाकारों को दरकिनार किया जा रहा है. सूत्रों के अनुसार, बाहरी कलाकारों पर जहां 50 से 60 लाख रुपये तक खर्च किए जा रहे हैं, वहीं स्थानीय कलाकारों को मात्र औपचारिकता निभाने के लिए बेहद कम राशि देकर उनके योगदान और सम्मान को ठेस पहुंचाई जा रही है. इसको लेकर कलाकारों और आम लोगों में गहरा असंतोष देखा जा रहा है.
लोगों का कहना है कि अगर यही स्थिति रही, तो सरायकेला की पारंपरिक छऊ कला धीरे- धीरे विलुप्त होने की कगार पर पहुंच जाएगी. छऊ केवल एक नृत्य नहीं, बल्कि यहां की संस्कृति, इतिहास और पहचान का जीवंत प्रतीक है. इसे बचाए रखने के लिए जरूरी है कि स्थानीय कलाकारों को प्राथमिकता, सम्मान और पर्याप्त मंच मिले.
विशेषज्ञों का मानना है कि छऊ को बचाने के लिए जमीनी स्तर पर कार्य करना होगा. गांव- गांव में कलाकारों को प्रोत्साहन, प्रशिक्षण और आर्थिक सहयोग देना होगा, तभी यह कला आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित रह पाएगी. आज जरूरत है संतुलन की जहां एक ओर बाहरी कलाकारों से कला का विस्तार हो, वहीं दूसरी ओर स्थानीय कलाकारों के योगदान को नजरअंदाज न किया जाए.
सरायकेला का राजमहल यह साबित कर रहा है कि अगर इच्छाशक्ति हो, तो परंपरा को बचाया जा सकता है. अब देखना यह है कि प्रशासन इस संदेश को कितनी गंभीरता से लेता है.

