सरायकेला/ Pramod Singh जिले में इन दिनों शिक्षा विभाग ने प्रशासनिक नवाचार का एक नया मॉडल पेश किया है, जिसका नाम रखा जा सकता है “चहेते को मौका, नियम को आराम”. सरकार जहां ट्रेजरी से जुड़े कार्यों में पारदर्शिता लाने के लिए तीन साल की समय सीमा तय कर चुकी है, वहीं यहां नियमों को शायद फाइल में रखकर आराम दिया जा रहा है. मामला बड़ा दिलचस्प है.

एक ही शिक्षक कामिनी कांत मेहता जो पहले ही तीन साल से ज्यादा समय तक मैसेंजर की भूमिका निभा चुके थे, उन्हें दोबारा उसी जिम्मेदारी से नवाजा गया है. अब इसे अनुभव का सम्मान कहें या व्यवस्था का ‘रीयूज प्लान’, यह समझ पाना थोड़ा मुश्किल है.
सवाल उठता है कि क्या पूरे प्रखंड में बाकी शिक्षक केवल पढ़ाने के लिए ही बने हैं और प्रशासनिक काम के लिए एक ही ‘सुपर स्पेशलिस्ट’ उपलब्ध हैं ? या फिर यह कोई ऐसा पद है, जिसमें योग्यता से ज्यादा “विश्वास” की डिग्री काम आती है ?
जब इस मामले में प्रखंड शिक्षा पदाधिकारी दिनेश दंडपात से पूछा गया, तो उन्होंने बड़ी सहजता से कहा कि “कोई दूसरा शिक्षक तैयार ही नहीं था”. अब यह बयान सुनकर लगता है कि सरायकेला के सभी शिक्षक अचानक संन्यास ले चुके हैं या फिर उन्हें इस जिम्मेदारी से एलर्जी हो गई है. सूत्र बताते हैं कि कई शिक्षकों ने इस फैसले पर नाराजगी जताई, लेकिन उनकी आवाज फाइलों के बीच कहीं दबकर रह गई. ऐसा प्रतीत होता है कि यहां “चयन प्रक्रिया” कम और “चयनित व्यक्ति” ज्यादा महत्वपूर्ण है.
दरअसल, ट्रेजरी घोटालों के बाद सरकार ने जो नियम बनाए थे, उनका मकसद साफ था, एक ही व्यक्ति के लंबे समय तक एक ही जगह रहने से होने वाली गड़बड़ियों पर रोक लगाना. लेकिन सरायकेला में लगता है कि नियमों को केवल पढ़ने के लिए रखा गया है, पालन करने के लिए नहीं. अब जनता भी सोच में है- अगर सब कुछ नियमों के अनुसार है, तो फिर सवाल क्यों उठ रहे हैं ? और अगर सवाल उठ रहे हैं, तो जवाब देने से परहेज क्यों ?
कुल मिलाकर, सरायकेला का शिक्षा विभाग इन दिनों “इनोवेशन” के नाम पर वही पुराना फार्मूला दोहरा रहा है “जो भरोसेमंद है, वही बार- बार जिम्मेदार है”. अब देखना यह है कि इस प्रयोग पर प्रशासन अंक देता है या फिर जनता ही रिपोर्ट कार्ड तैयार करती है.

