सरायकेला: गम्हरिया थाना परिसर में महिला के साथ कथित दुष्कर्म की घटना ने पूरे झारखंड को झकझोर दिया है. जिस थाने में एक महिला सुरक्षा की उम्मीद लेकर पहुंची, उसी परिसर में एक पुलिसकर्मी पर दुष्कर्म का आरोप लगना पुलिस व्यवस्था के माथे पर गंभीर दाग है. इस पर विपक्ष सवाल उठाए, सरकार से जवाब मांगे और महिला सुरक्षा का मुद्दा उठाए- लोकतांत्रिक व्यवस्था में यह स्वाभाविक भी है और जरूरी भी. मगर इस पूरे प्रकरण को केवल सत्ता बनाम विपक्ष की लड़ाई बनाकर देखने से कई ऐसे सवाल पीछे छूट जाएंगे, जिनका जवाब मिलना उतना ही जरूरी है.


सबसे महत्वपूर्ण सवाल है- आखिर उस महिला को आधी रात अपना घर छोड़कर सुरक्षा के लिए भटकना क्यों पड़ा ? पति ने महिला के साथ ऐसा क्या किया था कि मामला आधी रात पुलिस तक पहुंचा ? और जब महिला पुलिस की सुरक्षा में आ गई तो तत्कालीन थाना प्रभारी उस सुरक्षा को सुनिश्चित करने में क्यों विफल रहे ? यानी इस कहानी की शुरुआत गम्हरिया थाना परिसर से नहीं हुई थी. उसकी एक महत्वपूर्ण कड़ी महिला के घर से भी जुड़ी है.
पहला सवाल पति से- महिला को आधी रात घर छोड़ने की नौबत क्यों आई ?
पुलिस और मीडिया में सामने आई जानकारी के अनुसार महिला कथित तौर पर पति से विवाद और प्रताड़ना के बाद घर से निकली थी. बाद में स्थानीय लोगों के माध्यम से पुलिस तक मामला पहुंचा और महिला को गम्हरिया थाना लाया गया. महिला द्वारा दिए गए बयान में पति द्वारा कथित प्रताड़ना और पारिवारिक विवाद का उल्लेख है. इसलिए जांच की एक महत्वपूर्ण कड़ी महिला का पति भी होना चाहिए. इसका अर्थ यह कतई नहीं कि पति को थाना परिसर में कथित रूप से हुए अपराध का जिम्मेदार मान लिया जाए. वह एक अलग आपराधिक आरोप है और उसकी जिम्मेदारी साक्ष्यों के आधार पर ही तय होगी. लेकिन महिला ने यदि पति पर मारपीट या प्रताड़ना का आरोप लगाया था तो पुलिस को उस शिकायत की तह तक भी जाना चाहिए.
• क्या महिला के साथ पहले भी मारपीट होती थी ?
• पति- पत्नी के बीच विवाद की प्रकृति क्या थी ?
• क्या इससे पहले भी महिला ने किसी से मदद मांगी थी ?
• उस रात आखिर क्या हुआ था ?
• महिला को घर छोड़ने की स्थिति क्यों पैदा हुई ?
• उसके पति, परिजनों, पड़ोसियों और उस व्यक्ति से भी जानकारी ली जानी चाहिए जिसने सबसे पहले पुलिस को महिला की स्थिति के बारे में बताया.
यदि पति द्वारा प्रताड़ना का आरोप सही पाया जाता है तो उस पर भी कानून के मुताबिक कार्रवाई होनी चाहिए. महिला को थाना तक पहुंचाने वाली परिस्थितियों की जांच किए बिना इस केस की पूरी टाइमलाइन अधूरी रहेगी.
दूसरा और सबसे बड़ा प्रशासनिक सवाल थाना प्रभारी से
महिला घर से निकलकर पुलिस की सुरक्षा में पहुंच गई. इसके बाद उसकी जिम्मेदारी किसकी थी ? यहीं तत्कालीन गम्हरिया थाना प्रभारी संजय प्रसाद की प्रशासनिक जवाबदेही का सवाल सबसे गंभीर हो जाता है. एसडीपीओ की प्रारंभिक जांच के बाद थाना प्रभारी समेत छह पुलिसकर्मियों को पहले निलंबित किया गया और अगले दिन नौ अन्य पुलिसकर्मियों पर कार्रवाई हुई. इस प्रकार दो दिनों में कुल 15 पुलिसकर्मी निलंबित किए गए. बाद में ओडी अधिकारी और मुंशी की गिरफ्तारी भी हुई. कुल मिलाकर मुख्य आरोपी समेत तीन पुलिसकर्मी गिरफ्तार किए जा चुके हैं.
• सवाल है कि आधी रात एक महिला को थाना लाया गया तो महिला पुलिसकर्मी की व्यवस्था क्यों नहीं हुई ?
• उसकी सुरक्षा किसके जिम्मे छोड़ी गई ?
• महिला को जिस कमरे में रखा गया, उसकी निगरानी की व्यवस्था क्या थी ?
• थाना प्रभारी ने अधीनस्थों को क्या निर्देश दिए और उसके अनुपालन की जानकारी क्यों नहीं ली ?
थाना प्रभारी केवल एक पद नहीं होता, पूरे थाना तंत्र का प्रशासनिक नेतृत्व होता है. इसलिए संजय प्रसाद के निलंबन के बाद अब उनके पूरे प्रशासनिक आचरण और सेवा रिकॉर्ड की समीक्षा भी होनी चाहिए. गम्हरिया जैसे महत्वपूर्ण और संवेदनशील थाने में उनकी पदस्थापना किन आधारों पर हुई थी ? क्या पूर्व पदस्थापन के दौरान उनके खिलाफ कोई गंभीर शिकायत, विभागीय जांच अथवा प्रतिकूल रिकॉर्ड था ? यदि था तो उनकी नियुक्ति का निर्णय किस आधार पर लिया गया ? और यदि नहीं था तो इस रात इतनी बड़ी प्रशासनिक चूक कैसे हुई ?इन सवालों के उत्तर दस्तावेजों से तलाशे जाने चाहिए, आरोपों या अटकलों से नहीं.
एसपी की कार्रवाई को कम करके आंकना भी उचित नहीं
घटना गंभीर है तो कार्रवाई की समीक्षा भी तथ्यों के आधार पर होनी चाहिए. एसपी मनोज स्वर्गीयारी ने दो दिनों के भीतर थाना प्रभारी समेत 15 पुलिसकर्मियों को निलंबित किया. मुख्य आरोपी सहित तीन पुलिसकर्मी गिरफ्तार किए गए. एसआईटी जांच चल रही है. एसपी स्वयं गम्हरिया थाना पहुंचे, पुलिसकर्मियों से अलग- अलग पूछताछ की और महिला फरियादियों की सुरक्षा को लेकर जिले के थानों के लिए नए निर्देश भी जारी किए. ऐसे में सवाल यह भी होना चाहिए कि एक जिला पुलिस अधीक्षक प्रशासनिक और कानूनी दायरे में तत्काल इससे आगे और क्या कार्रवाई कर सकता था ? आरोप सामने आने के बाद गिरफ्तारी, FIR, SIT, साक्ष्य संकलन, थाना प्रभारी सहित 15 कर्मियों का निलंबन और जिम्मेदारी तय करने की प्रक्रिया- प्रारंभिक स्तर पर ये व्यापक कदम हैं. अब आपराधिक आरोपों पर अंतिम फैसला एसपी या सरकार को नहीं करना है. पुलिस को निष्पक्ष अनुसंधान कर साक्ष्य न्यायालय के समक्ष रखने हैं और दोषसिद्धि का निर्णय न्यायालय करेगा. इसलिए पुलिस की विभागीय कार्रवाई चलती रहे, लेकिन आपराधिक मामले में न्यायिक प्रक्रिया को अपना काम करने देना भी उतना ही आवश्यक है.
विपक्ष को भी मिलना चाहिए सवाल पूछने का पूरा अधिकार
इस घटना पर विपक्ष ने सरकार और पुलिस व्यवस्था को घेरा है. नेता प्रतिपक्ष से लेकर भाजपा के अन्य नेताओं ने महिला सुरक्षा को लेकर सवाल उठाए हैं. स्थानीय स्तर पर प्रदर्शन भी हुए हैं. इन सवालों को केवल राजनीति कहकर खारिज करना उचित नहीं होगा. विपक्ष का काम ही सरकार से जवाब मांगना है. सरकार से पूछा जाना चाहिए कि थानों में महिला सुरक्षा के लिए निर्धारित प्रोटोकॉल जमीन पर कितना लागू है. रात में महिला फरियादी आने पर क्या व्यवस्था होनी चाहिए ? महिला पुलिसकर्मियों की उपलब्धता कितनी है ? क्या थानों के आवासीय और कार्य क्षेत्र पर्याप्त रूप से अलग और निगरानी में हैं ?
मगर दूसरी तरफ विपक्ष को भी यह स्वीकार करना चाहिए कि इस मामले में कार्रवाई स्वयं पुलिस तंत्र ने की है. अपने ही थाना प्रभारी सहित 15 कर्मियों को निलंबित करना और तीन पुलिसकर्मियों को गिरफ्तार करना सामान्य विभागीय औपचारिकता नहीं है.
क्या पूरी कहानी में कोई और परत है ? SIT को देखने दीजिए
इतने संवेदनशील मामले में राजनीतिक गतिविधियां तेज होना स्वाभाविक है. इसके साथ स्थानीय स्तर पर कई तरह की चर्चाएं भी चल रही हैं. लेकिन यहां अत्यधिक सावधानी जरूरी है. बिना साक्ष्य किसी व्यक्ति, संगठन, राजनीतिक दल या औद्योगिक हित को इस घटना के पीछे बताना उचित नहीं होगा. फिर भी SIT को महिला के घर से निकलने से लेकर घटना सार्वजनिक होने तक की पूरी टाइमलाइन खंगालनी चाहिए.
• महिला ने घटना से पहले और बाद में किन लोगों से संपर्क किया ?
• किसे सबसे पहले क्या जानकारी मिली ?
• थाना परिसर में किस पुलिसकर्मी को कब घटना की जानकारी हुई ?
• वरीय अधिकारियों तक सूचना पहुंचने में कितना समय लगा ?
• उसके बाद किन- किन लोगों ने महिला अथवा उसके परिवार से संपर्क किया ?
कॉल डिटेल, उपलब्ध CCTV, स्टेशन डायरी, ड्यूटी चार्ट, मोबाइल लोकेशन और अन्य तकनीकी साक्ष्य इसकी तस्वीर साफ कर सकते हैं. यदि कोई अंदरूनी कड़ी है तो वह साक्ष्य से सामने आनी चाहिए. यदि नहीं है तो अनावश्यक साजिश की चर्चाओं पर भी विराम लगना चाहिए. पुलिस अधीक्षक को अपने तंत्र की भी समीक्षा करने की जरुरत है. इतनी बड़ी चूक आखिर कैसे हुई और कार्रवाई के बाद कौन मामले को संवेदनशील बना रहा है. कौन विभागीय सूचनाएं किस स्तर पर लीक कर रहा है. ऐसे कुछ सवाल हैं जो पुलिस के आंतरिक तंत्र पर सवाल उठा रहे हैं.
पिंड्राजोरा में 28 पुलिसकर्मियों पर हुई थी सामूहिक कार्रवाई
ऐसी सामूहिक पुलिस कार्रवाई का झारखंड में हाल का एक बड़ा उदाहरण बोकारो का पिंड्राजोरा थाना है. पुष्पा महतो प्रकरण में बोकारो एसपी हरविंदर सिंह ने अप्रैल 2026 में पिंड्राजोरा थाना प्रभारी समेत थाने में पदस्थापित 28 पुलिस अधिकारियों एवं कर्मियों को निलंबित किया था. गम्हरिया की कार्रवाई को झारखंड के इतिहास में दूसरी बड़ी कार्रवाई के रूप में देखा जा रहा है.
एक घटना पूरी पुलिस फोर्स की पहचान नहीं हो सकती
गम्हरिया की घटना ने पुलिस की छवि को चोट पहुंचाई है. इससे इनकार नहीं किया जा सकता. मगर जिस पुलिसकर्मी पर आरोप लगा है, उसकी कथित करतूत को पूरे पुलिस बल का चरित्र बना देना भी न्यायसंगत नहीं होगा. याद रखना होगा कि आरोपी पुलिसकर्मी को गिरफ्तार करने वाली भी पुलिस है. थाना प्रभारी को निलंबित करने वाली भी पुलिस व्यवस्था है. 15 कर्मियों पर कार्रवाई करने वाला भी उसी व्यवस्था का एक एसपी है. दोषी पुलिसकर्मी को बचाने से पुलिस का मनोबल नहीं बढ़ता. दोषी के खिलाफ निष्पक्ष और कठोर कार्रवाई ही ईमानदारी से काम करने वाले पुलिसकर्मियों का मनोबल बढ़ाती है. एसपी मनोज स्वर्गीयारी की कार्रवाई का सबसे बड़ा संदेश शायद यही है कि वर्दी जवाबदेही से ऊपर नहीं है.
अब आवश्यकता है कि जांच तीन दिशाओं में पूरी गंभीरता से आगे बढ़े- कथित यौन अपराध की निष्पक्ष जांच, तत्कालीन थाना प्रभारी एवं अन्य पुलिसकर्मियों की प्रशासनिक जवाबदेही और महिला को आधी रात घर छोड़ने पर मजबूर करने वाली परिस्थितियों सहित पति पर लगे प्रताड़ना के आरोप की जांच. राजनीति अपनी जगह है. विपक्ष सवाल पूछे और सरकार जवाब दे. लेकिन इस मामले का अंतिम उद्देश्य किसी राजनीतिक पक्ष की जीत नहीं, पीड़िता को न्याय और पुलिस व्यवस्था में भरोसे की पुनर्स्थापना होना चाहिए.
गम्हरिया थाना परिसर में लगे इस दाग को मिटने में समय लगेगा. लेकिन यदि जांच निष्पक्ष हुई, हर जिम्मेदार व्यक्ति तक कानून पहुंचा और अदालत के सामने मजबूत साक्ष्य रखे गए, तो यही घटना पुलिस व्यवस्था के लिए सुधार का एक बड़ा सबक भी बन सकती है.
संतोष कुमार
9431341001

