सरायकेला/ Pramod Singh जिले की पहचान मानी जाने वाली छऊ कला को लेकर हर साल होने वाला छऊ महोत्सव सवालों के घेरे आता जा रहा है. जिस मिट्टी ने इस कला को जन्म दिया, उसी क्षेत्र के कलाकार खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं.

स्थानीय कलाकारों का आरोप है कि महोत्सव में बाहरी कलाकारों पर 5 से 10 लाख रुपये तक खर्च किए जा रहे हैं, जबकि वर्षों से छऊ परंपरा को जीवित रखने वाले स्थानीय कलाकारों को महज 1000 रुपये देकर औपचारिक सम्मान दिया जा रहा है. नाम नहीं छापने की शर्त पर कई कलाकारों ने अपनी पीड़ा जाहिर करते हुए कहा कि उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी छऊ कला को समर्पित कर दी, लेकिन आज उन्हें खुद अपने ही मंच पर उपेक्षा का सामना करना पड़ रहा है. उनका कहना है कि यह केवल आर्थिक असमानता नहीं, बल्कि स्थानीय प्रतिभाओं को नजरअंदाज करने की प्रवृत्ति है.
कलाकारों ने यह भी सवाल उठाया कि क्या छऊ महोत्सव अब स्थानीय कलाकारों के लिए नहीं रह गया है. उनका मानना है कि अगर इसी तरह बाहरी कलाकारों को प्राथमिकता दी जाती रही, तो सरायकेला की पारंपरिक छऊ कला की असली पहचान धीरे- धीरे खत्म हो सकती है. उन्होंने प्रशासन से मांग की है कि स्थानीय कलाकारों को उचित सम्मान, पारिश्रमिक और मंच दिया जाए, ताकि इस विरासत को बचाया जा सके.
अब देखना यह होगा कि इन सवालों और आरोपों पर प्रशासन क्या रुख अपनाता है और क्या स्थानीय कलाकारों की नाराजगी दूर करने के लिए कोई ठोस कदम उठाया जाता है.
वैसे इसबार आर्टिस्ट एसोसिएशन ने स्थानीय कलाकारों को सम्मान देने का बीड़ा उठाया है. एसोसिएशन के संरक्षक सह सरायकेला नगर पंचायत के अध्यक्ष मनोज कुमार चौधरी ने छऊ कलाकारों को उचित सम्मान दिलाने की बात कही है. इससे पूर्व आर्टिस्ट एसोसिएशन ही राजकीय चैत्र पर्व महोत्सव से अलग हटकर आयोजन कर रहा था मगर इसबार एसोसिएशन जिला प्रशासन के साथ है. मनोज कुमार चौधरी ने छऊ कलाकारों के लिए एक लंबी लड़ाई लड़ी है मगर इसबार देखना यह दिलचस्प होगा कि क्या वाकई राजकीय महोत्सव में स्थानीय कलाकारों को उचित मंच और सम्मान मिलता है या इसबार भी राजकीय पर्व एक विलासिता का मंच बनकर रह जाता है.

