सरायकेला: भारत की जनगणना- 2027 के प्रथम चरण की शुरुआत से पहले ही सरायकेला नगर पंचायत कार्यालय विवादों में घिर गया है. नगर पंचायत प्रशासन पर पारा शिक्षकों के साथ भेदभावपूर्ण रवैया अपनाने और सरकारी शिक्षकों को विशेष राहत देने का आरोप लग रहा है. मामला सामने आने के बाद शिक्षा व्यवस्था और प्रशासनिक संवेदनशीलता पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं.


आरोप है कि जहां एक ओर मोटी तनख्वाह पाने वाले सरकारी शिक्षकों को जनगणना कार्य से दूर रखकर राहत दी जा रही है, वहीं बेहद कम मानदेय पर काम करने वाले पारा शिक्षकों को भीषण गर्मी और चिलचिलाती धूप में घर- घर सर्वे के लिए भेज दिया गया है. सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि कई पारा शिक्षक गंभीर बीमारियों से जूझ रहे हैं, बावजूद इसके उन्हें किसी तरह की छूट नहीं दी गई.
जनगणना कार्य में लगाए गए सहायक अध्यापक (पारा शिक्षक) जयराज दास ने बताया कि नगर पंचायत क्षेत्र में कुल 34 शिक्षकों को जनगणना कार्य के लिए प्रशिक्षण दिया गया था. इनमें 30 सरकारी शिक्षक और 4 पारा शिक्षक शामिल थे, लेकिन 16 मई से शुरू हुए प्रथम चरण के कार्य में केवल 22 शिक्षकों को ही लगाया गया, जबकि 12 शिक्षकों को कार्य से बाहर रखा गया.
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिन 12 शिक्षकों को ड्यूटी से राहत दी गई, वे सभी सरकारी शिक्षक हैं. एक भी पारा शिक्षक को छूट नहीं मिली. इतना ही नहीं, ड्यूटी में लगाए गए 18 सरकारी शिक्षकों में से एक शिक्षिका को कार्य शुरू होने से कुछ घंटे पहले अनुरोध पर मुक्त कर दिया गया, लेकिन गंभीर बीमारी से पीड़ित पारा शिक्षकों की अपील तक नहीं सुनी गई.
जयराज दास ने बताया कि वे स्वयं मधुमेह जैसी गंभीर बीमारी से पीड़ित हैं और इसकी जानकारी नगर पंचायत कार्यालय को पहले ही दे चुके थे. इसके बावजूद उन्हें जनगणना कार्य से मुक्त नहीं किया गया. उनका कहना है कि स्वास्थ्य खराब होने के बावजूद मजबूरी में उन्हें धूप में घर-घर जाकर सर्वे करना पड़ रहा है.
अब सवाल उठ रहा है कि एक ही शिक्षा व्यवस्था में काम करने वाले शिक्षकों के बीच इतना भेदभाव आखिर क्यों. क्या सरकारी शिक्षक प्रशासन के “करीबी” हैं और पारा शिक्षक केवल काम निकालने का साधन ? क्या कम मानदेय पाने वाले शिक्षकों के स्वास्थ्य, सम्मान और जीवन की कोई कीमत नहीं ?
इस मामले के सामने आने के बाद पारा शिक्षकों में भारी नाराजगी देखी जा रही है. शिक्षकों का कहना है कि यदि यही रवैया जारी रहा तो आने वाले दिनों में विरोध प्रदर्शन भी हो सकता है. वहीं स्थानीय लोगों का भी कहना है कि प्रशासन को सभी शिक्षकों के साथ समान व्यवहार करना चाहिए. जनगणना जैसा राष्ट्रीय कार्य जरूरी जरूर है, लेकिन इसके नाम पर बीमार और आर्थिक रूप से कमजोर शिक्षकों पर अतिरिक्त बोझ डालना कहीं न कहीं प्रशासनिक असंवेदनशीलता को दर्शाता है. अब नगर पंचायत प्रशासन के रवैये पर सवाल उठने लगे हैं कि आखिर नियम और मानवीय संवेदनाएं केवल कमजोर वर्ग के लिए ही क्यों बदल जाती हैं. यदि समय रहते इस मामले पर निष्पक्ष निर्णय नहीं लिया गया तो यह विवाद और बड़ा रूप ले सकता है.
Report: Pramod Singh

