सरायकेला: झारखंड के प्रमुख औद्योगिक क्षेत्रों में शुमार सरायकेला- खरसावां में रामकृष्णा ग्रुप की इकाइयों में लगातार हो रहे ठेका मजदूरों के आंदोलन ने अब सामान्य श्रमिक असंतोष से आगे कई सवाल खड़े कर दिए हैं. RKFL और RKCL की अलग- अलग इकाइयों में एक के बाद एक मजदूरों का काम रोकना महज संयोग है या इसके पीछे कोई और वजह है ? यह सवाल आदित्यपुर औद्योगिक क्षेत्र में चर्चा का विषय बनने लगा है. पहले दुगनी- कोलाबिरा स्थित यूनिट 6, 7 और 9, उसके बाद RKCL की यूनिट 8 और 9, फिर यूनिट 6 और अब गुरुवार को RKFL की यूनिट 3 और 4 में बड़ी संख्या में ठेका श्रमिक हड़ताल पर चले गए.


गुरुवार को प्रबंधन की ओर से मजदूरों की मांगों पर सहमति जताए जाने के बावजूद श्रमिक वार्ता के लिए JLKM नेता तरुण महतो की मौजूदगी पर अड़े रहे. तरुण महतो के पहुंचने के बाद वार्ता हुई और उसके बाद मजदूर वापस काम पर लौटे.
मांग लगभग एक जैसी, आंदोलन भी एक के बाद एक
अलग- अलग इकाइयों में आंदोलन कर रहे ठेका मजदूरों की प्रमुख मांगों में स्किल्ड मजदूरों का बढ़ा हुआ मानदेय, ओवरटाइम का दोगुना भुगतान, कैंटीन में नियमित कर्मचारियों के समान सुविधा तथा स्किल्ड और अनस्किल्ड कामगारों के बीच मजदूरी का स्पष्ट निर्धारण शामिल है. बताया जा रहा है कि पूर्व में आंदोलन वाली इकाइयों में भी लगभग यही मांगें उठी थीं. प्रबंधन ने मांगों पर सहमति जताते हुए एक नवंबर से लागू करने का आश्वासन दिया है. यदि प्रबंधन मांगें स्वीकार कर चुका है तो फिर एक के बाद एक यूनिट में काम रोकने की नौबत क्यों आ रही है ? क्या प्रबंधन और ठेका श्रमिकों के बीच संवाद का कोई प्रभावी तंत्र नहीं बचा है या मजदूरों के असंतोष को कोई दूसरा पक्ष हवा दे रहा है ?
तरुण महतो की मौजूदगी पर ही वार्ता क्यों ?
गुरुवार के आंदोलन में एक तथ्य ने विशेष रूप से ध्यान खींचा. प्रबंधन मांगों को स्वीकार करने को तैयार था, लेकिन मजदूर कथित तौर पर तरुण महतो की मौजूदगी में ही वार्ता पर अड़े रहे. इससे सवाल उठना स्वाभाविक है कि तरुण महतो पर मजदूरों का इतना भरोसा क्यों है ? क्या वे मजदूरों के लिए नेतृत्व का नया केंद्र बनकर उभरे हैं या लगातार हो रहे आंदोलनों में उनकी भूमिका इससे कहीं अधिक है ?
फिलहाल ऐसा कोई पुष्ट प्रमाण सामने नहीं है जिससे यह कहा जा सके कि आंदोलनों के पीछे तरुण महतो हैं. लेकिन एक के बाद एक इकाइयों में समान मांगों को लेकर आंदोलन और वार्ता में उनकी बढ़ती भूमिका को देखते हुए इस पहलू पर चर्चा तेज होना स्वाभाविक है.
या कंपनी के भीतर से ही मिल रही आंदोलन को हवा ?
इस कहानी का दूसरा और ज्यादा गंभीर पहलू कंपनी के अंदर चल रही कथित खींचतान से जुड़ा है. विश्वसनीय सूत्रों का दावा है कि रामकृष्णा ग्रुप के प्रबंधन स्तर पर इन दिनों सब कुछ सामान्य नहीं है. कुछ वरिष्ठ अधिकारियों के अधिकारों में बदलाव और कुछ को नई जिम्मेदारियां दिए जाने के बाद अंदरूनी स्तर पर प्रभाव और वर्चस्व को लेकर खींचतान की चर्चा है. ऐसे में औद्योगिक क्षेत्र में यह सवाल भी उठ रहा है कि कहीं प्रबंधन के भीतर बैठा कोई असंतुष्ट धड़ा मजदूरों के असंतोष को अपने हित में इस्तेमाल तो नहीं कर रहा ?
यह गंभीर आशंका है और बिना प्रमाण किसी अधिकारी को इसके लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता. मगर जिस तेजी से अलग- अलग यूनिटों में लगभग समान मांगों को लेकर आंदोलन सामने आ रहे हैं, उससे प्रबंधन के लिए अपने आंतरिक तंत्र की समीक्षा जरूरी हो गई है.
पहले अपने ‘घर’ की पड़ताल करे प्रबंधन
यदि श्रमिकों की मांगें जायज थीं और उन्हें स्वीकार किया जा चुका है तो रामकृष्णा ग्रुप को यह समझना होगा कि फिर बार-बार उत्पादन रोकने की स्थिति क्यों बन रही है. सिर्फ आंदोलन समाप्त कराकर उत्पादन शुरू करा देना समस्या का स्थायी समाधान नहीं है. प्रबंधन को यह भी देखना होगा कि मजदूरों और कंपनी के बीच संवाद की कड़ी कहां कमजोर हुई है. ठेका एजेंसियों की भूमिका क्या है ? मजदूरों की शिकायतें समय रहते उच्च प्रबंधन तक क्यों नहीं पहुंच रही हैं ? और यदि पहुंच रही हैं तो समाधान आंदोलन के बाद ही क्यों निकल रहा है ?साथ ही यदि प्रबंधन के भीतर गुटबाजी अथवा वर्चस्व की लड़ाई की चर्चाओं में कोई तथ्य है तो शीर्ष प्रबंधन को उसकी भी निष्पक्ष आंतरिक समीक्षा करनी चाहिए.
मजदूरों को भी समझना होगा, उत्पादन रुका तो नुकसान उनका भी
इस पूरे घटनाक्रम में मजदूरों की जिम्मेदारी भी कम नहीं है. अपने वेतन, ओवरटाइम और सुविधाओं की मांग करना उनका अधिकार है. उन्हें अपनी मांगों को लोकतांत्रिक और वैधानिक तरीके से प्रबंधन के सामने रखने का पूरा अधिकार है. लेकिन श्रमिकों को यह भी समझना होगा कि वे किसी व्यक्ति अथवा समूह के शक्ति प्रदर्शन का माध्यम न बनें. बार- बार उत्पादन प्रभावित होने का दीर्घकालिक असर कंपनी के साथ रोजगार पर भी पड़ सकता है.
पर्दे के पीछे राजनीति करने वाला व्यक्ति नुकसान होने पर शायद सामने नहीं आएगा, लेकिन उत्पादन और कारोबार प्रभावित हुआ तो उसकी पहली मार अंततः श्रमिकों और उनके परिवारों पर भी पड़ सकती है.
बड़े औद्योगिक समूह में लगातार असंतोष को हल्के में लेना खतरनाक
रामकृष्णा ग्रुप सरायकेला- खरसावां के औद्योगिक परिदृश्य की महत्वपूर्ण इकाइयों में शामिल है. ऐसे बड़े समूह की अलग- अलग यूनिटों में लगातार श्रमिक आंदोलन होना केवल कंपनी का आंतरिक मामला मानकर नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए. श्रम विभाग और औद्योगिक गतिविधियों की निगरानी से जुड़े तंत्र को भी स्थिति पर नजर रखनी चाहिए. श्रमिकों के अधिकार सुरक्षित रहें, प्रबंधन के साथ संवाद कायम रहे और औद्योगिक उत्पादन अनावश्यक रूप से प्रभावित न हो- तीनों के बीच संतुलन जरूरी है.
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है- एक ही औद्योगिक समूह की अलग- अलग इकाइयों में एक के बाद एक आंदोलन क्यों हो रहे हैं ? यह स्वाभाविक श्रमिक असंतोष है, नेतृत्व स्थापित करने की कवायद है या कंपनी के अंदर चल रही किसी वर्चस्व की लड़ाई की परछाईं ? इसका जवाब आरोपों से नहीं, बल्कि रामकृष्णा ग्रुप के शीर्ष प्रबंधन द्वारा अपने श्रम और आंतरिक प्रशासनिक तंत्र की गंभीर समीक्षा से सामने आ सकता है.
संतोष कुमार
9431341001

