सरायकेला: जिले के कांड्रा थाना क्षेत्र में राहुल हांसदा और तपन प्रधान की संदिग्ध मौत ने कई सवाल खड़े कर दिए हैं. शनिवार को पुलिस ने दोनों के शव रपचा फुटबॉल मैदान के पीछे वन भूमि से बरामद कर लिए हैं. शवों की बरामदगी को पुलिस की बड़ी सफलता मानी जा रही है, लेकिन इसके साथ ही कई ऐसे सवाल सामने आए हैं, जिनके जवाब जांच पूरी होने के बाद ही मिल पाएंगे.


कहानी शुरू होती है 13 अगस्त की रात से
पिंड्राबेड़ा निवासी राहुल हांसदा और खरखावां निवासी तपन प्रधान अपने साथी सूरज हांसदा के साथ धातकीडीह स्कूल के पास बैठे थे. सूरज के कथित बयान के अनुसार रात करीब आठ बजे कुछ लोग वहां पहुंचे और तीनों के साथ मारपीट की. इसके बाद तीनों को एक कार से गम्हरिया की ओर ले जाया गया.

यहीं से कहानी में पहला बड़ा मोड़ आता है
तीनों में से सूरज किसी तरह वहां से भाग निकलने में सफल रहा. लेकिन राहुल और तपन फिर कभी घर नहीं लौटे. परिजन उनकी तलाश में थाने का चक्कर लगाते रहे. अपहरण और हत्या की आशंका जताई गई, लेकिन मामला तत्काल दर्ज नहीं होने को लेकर भी अब सवाल उठ रहे हैं.

फिर सामने आया रपचा का जंगल
20 अगस्त को पुलिस ने दोनों युवकों की गुमशुदगी का मामला दर्ज किया. सूरज से मिली जानकारी के आधार पर पुलिस ने रविन्द्र मार्डी और फूलचंद हांसदा को हिरासत में लेकर पूछताछ शुरू की. पुलिस के अनुसार पूछताछ और उनकी निशानदेही के आधार पर रपचा फुटबॉल मैदान के पीछे वन भूमि से राहुल और तपन के शव बरामद किए गए.
लेकिन यहीं से असली रहस्य शुरू होता है

• दो युवक आखिर रपचा के जंगल तक पहुंचे कैसे ?
• अगर दोनों की हत्या कहीं और हुई, तो शवों को जंगल तक कौन लेकर गया ?
• शवों को जमीन में दफनाने के लिए कितने लोग शामिल थे ?
• क्या यह काम सिर्फ हिरासत में लिए गए दोनों युवकों ने किया ?
• या फिर इस पूरी घटना के पीछे कोई और बड़ी कड़ी मौजूद है ?
और अब सामने आ रही है गम्हरिया सामुदायिक भवन की कड़ी
सूत्रों के हवाले से दावा किया जा रहा है कि तीनों युवकों पर मोबाइल चोरी का आरोप था. चर्चा यह भी है कि कथित तौर पर तीनों को धातकीडीह से उठाकर गम्हरिया टायो गेट के समीप स्थित एक सामुदायिक भवन तक ले जाया गया था. वहां मारपीट किए जाने की बात भी सामने आ रही है. दावा यह भी किया जा रहा है कि मारपीट करने वालों में सत्ताधारी दल के कुछ नामचीन चेहरे भी थे. हालांकि, इन दावों की आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है. पुलिस की जांच और पोस्टमार्टम रिपोर्ट से ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि दोनों युवकों की मौत कैसे हुई और उनकी मौत से पहले उनके साथ क्या हुआ था. सूरज के भाग निकलने और राहुल- तपन के शव बरामद होने के बीच की कड़ी फिलहाल इस पूरे मामले का सबसे अहम हिस्सा है.
सबसे बड़ा सवाल यही है
• अगर तीनों को एक साथ ले जाया गया था, तो सूरज भागने में कैसे सफल हुआ ?
• राहुल और तपन के साथ उसके बाद क्या हुआ ?
• उनके शव रपचा तक कैसे पहुंचे ?
• और शवों को दफनाने में वास्तव में कितने लोग शामिल थे ?
स्थानीय स्तर पर राजनीतिक दबाव और प्रभाव को लेकर भी तरह-तरह की चर्चाएं हैं. कुछ लोग दावा कर रहे हैं कि इस मामले में कुछ प्रभावशाली लोगों की भूमिका की जांच होनी चाहिए. हालांकि, ऐसे दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना जांच पूरी होने से पहले उचित नहीं होगा.
फिलहाल पुलिस के सामने चुनौती सिर्फ दो शव बरामद करने की नहीं है. चुनौती उस पूरी कड़ी को जोड़ने की है, जो 13 अगस्त की रात धातकीडीह से शुरू होकर गम्हरिया और फिर रपचा के जंगल तक पहुंचती है. क्या पुलिसिया अनुसंधान में सामुदायिक भवन का जिक्र होगा ? यदि हुआ तो सामुदायिक भवन में घटना के दिन कौन- कौन थे उनका मोबाईल लोकेशन सार्वजनिक किया जाएगा ? एक तरफ दो परिवारों को उनके बेटों की मौत का जवाब चाहिए. दूसरी तरफ पुलिस के सामने कई अनसुलझे सवाल हैं. क्या इस मामले में सिर्फ दो लोग ही जिम्मेदार हैं या जांच की परतें खुलने के साथ कुछ और चेहरे भी सामने आएंगे ?
फिलहाल रपचा का जंगल खामोश है. लेकिन उसी जंगल से बरामद हुए दो शव एक ऐसी कहानी कह रहे हैं, जिसका पूरा सच पोस्टमार्टम रिपोर्ट, वैज्ञानिक साक्ष्य, चश्मदीदों के बयान और पुलिस की जांच से ही सामने आएगा. अब निगाहें पुलिस की अगली कार्रवाई पर हैं. क्योंकि असली कहानी शव मिलने से खत्म नहीं हुई है. शायद यहीं से शुरू हुई है. जनता जानना चाहती है कि आखिर वास्तव में हुआ क्या था और इस हत्याकांड के असल खिलाड़ी कौन हैं. वैसे सत्ता के आगे सिस्टम की कहां चलती है. आशंका है कि दोनों युवकों की हत्या के असल खिलाड़ी शायद ही बेनाकब हों क्योंकि सियासी चादर में कई राज दफ़न हो चुके हैं जो आज भी इंसाफ की चौखट पर टकटकी लगाए बैठा है.
संतोष कुमार (प्रधान संपादक)

