जामताड़ा: सदर अस्पताल में आठ दिनों से अंतिम संस्कार के इंतजार में पड़े दो लावारिस शवों को आखिरकार सम्मानजनक अंतिम विदाई मिल गई. इंडिया न्यूज वायरल बिहार झारखंड ने “मोक्ष के इंतजार में आठ दिन से पड़े दो लावारिस शव, अस्पताल और प्रशासन के बीच फंसा अंतिम संस्कार” शीर्षक से मामले को प्रमुखता से उठाया था. खबर प्रकाशित होने के बाद जामताड़ा चेम्बर्स ऑफ कॉमर्स के अध्यक्ष सह समाजसेवी संजय अग्रवाल आगे आए और दोनों शवों के अंतिम संस्कार का बीड़ा उठाया.


इस पूरी प्रक्रिया में सिविल एसडीओ अनंत कुमार और जामताड़ा थाना प्रभारी मनोज कुमार महतो की महत्वपूर्ण भूमिका रही. थाना प्रभारी ने सदर अस्पताल से शवों को श्मशान घाट तक पहुंचाने के लिए वाहन की व्यवस्था कराई. इसके बाद संजय अग्रवाल ने अजय नदी घाट पर दोनों शवों की विधि- विधान और सम्मान के साथ अंत्येष्टि कराई.
खबर के बाद जागा सिस्टम, तो आठ दिन तक क्यों रहा इंतजार ?
दोनों शवों के अंतिम संस्कार के बाद एक बड़ा सवाल व्यवस्था पर भी खड़ा हो रहा है. आखिर ऐसी क्या वजह थी कि दो लावारिस शव आठ दिनों तक सदर अस्पताल में पड़े रहे और उनके अंतिम संस्कार की जिम्मेदारी तय नहीं हो सकी ? अस्पताल प्रबंधन प्रशासन की ओर देखता रहा और प्रशासनिक स्तर पर भी तत्काल समाधान नहीं निकल सका. लेकिन मामला समाचार के माध्यम से सामने आने के बाद अंतिम संस्कार की व्यवस्था हो गई.
सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि सदर अस्पताल में नियमित रूप से पुलिस, स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी-कर्मचारी और अन्य लोग आते- जाते हैं. पत्रकार भी समाचार संकलन के लिए पहुंचते हैं. इसके बावजूद आठ दिनों तक दो लावारिस शवों की अंतिम विदाई का मामला प्राथमिकता क्यों नहीं बन सका, यह व्यवस्था के बीच समन्वय पर सवाल खड़ा करता है.
अंतिम विदाई मिली, मगर व्यवस्था के लिए छोड़ गई सवाल
लावारिस शवों का अंतिम संस्कार महज एक प्रशासनिक औपचारिकता नहीं, बल्कि मानवीय गरिमा और संवेदना से जुड़ा विषय है. ऐसे मामलों में अस्पताल प्रबंधन, पुलिस और प्रशासन के बीच स्पष्ट जिम्मेदारी और त्वरित समन्वय जरूरी है. आठ दिनों तक शवों का अंतिम संस्कार नहीं होना और मामला सामने आने के बाद तेजी से पहल होना इसी समन्वय की कमी की ओर इशारा करता है.
हालांकि अंतिम चरण में आगे आकर दोनों शवों को सम्मानजनक अंतिम विदाई दिलाने वाले समाजसेवी संजय अग्रवाल, सिविल एसडीओ अनंत कुमार और थाना प्रभारी मनोज कुमार महतो की पहल सराहनीय रही. साथ ही यह घटनाक्रम व्यवस्था के सामने एक सवाल छोड़ गया है कि यदि खबर प्रकाशित नहीं होती, तो क्या इन दो लावारिस शवों को अंतिम विदाई के लिए अभी और इंतजार करना पड़ता.
रिपोर्ट: मनीष बर्णवाल

