
जामताड़ा: जिले का स्वास्थ्य विभाग एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है. सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, जामताड़ा के अधीन कार्यरत अनुबंधित एएनएम रेखा कुमारी की मौत के बाद विभाग की कार्यशैली और प्रशासनिक संवेदनशीलता पर बहस तेज हो गई है.


रेखा कुमारी, जो मोहड़ा स्वास्थ्य उपकेंद्र में कार्यरत थीं, की 13 जून 2026 को तबीयत बिगड़ने के बाद सदर अस्पताल में मौत हो गई. चिकित्सकों ने मौत का कारण हृदयगति रुकना बताया, लेकिन परिजनों और सहकर्मियों का आरोप है कि महीनों से वेतन नहीं मिलने के कारण आर्थिक तंगी में उनका नियमित इलाज नहीं हो सका, जिससे उनकी हालत लगातार बिगड़ती गई.
इस मामले को लेकर झारखंड चिकित्सा एवं जनस्वास्थ्य कर्मचारी संघ ने अपर मुख्य सचिव, स्वास्थ्य विभाग को पत्र भेजकर उच्चस्तरीय जांच की मांग की है. संघ का आरोप है कि फरवरी 2026 से अनुबंध कर्मियों का वेतन लंबित है, जबकि मार्च में भुगतान के लिए राशि उपलब्ध करा दी गई थी.
सबसे चौंकाने वाला आरोप यह है कि ब्लॉक एकाउंट मैनेजर की कार्यशिथिलता के कारण वेतन विपत्र तैयार नहीं हुआ और करीब 42 लाख रुपये की राशि बिना खर्च किए सरकार को वापस (सरेंडर) कर दी गई. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब पैसा उपलब्ध था तो स्वास्थ्य कर्मियों को वेतन क्यों नहीं मिला ?
संघ ने यह भी आरोप लगाया है कि जिला कार्यक्रम प्रबंधन इकाई के कुछ कर्मियों ने अपने वेतन वृद्धि और एरियर का भुगतान तो करा लिया, लेकिन अनुबंध कर्मियों को उसी लाभ से वंचित रखा गया.
इधर, प्रभारी चिकित्सा पदाधिकारी डॉ. निलेश कुमार ने स्वीकार किया कि वित्तीय वर्ष समाप्त होने के कारण राशि सरेंडर करनी पड़ी. उन्होंने बताया कि लापरवाही बरतने के आरोप में ब्लॉक एकाउंट मैनेजर को हटा दिया गया है और लंबित वेतन का भुगतान जल्द किया जाएगा.
हालांकि, कई सवाल अब भी अनुत्तरित हैं. जब फरवरी से वेतन लंबित था तो मार्च में उपलब्ध राशि से भुगतान क्यों नहीं किया गया ? 42 लाख रुपये वापस क्यों चले गए ? क्या प्रशासनिक लापरवाही ने एक अनुबंधित स्वास्थ्यकर्मी की जान जोखिम में डाल दी ?
संघ ने रेखा कुमारी के परिजनों को उचित मुआवजा, लंबित वेतन का तत्काल भुगतान, अनुकंपा के आधार पर सेवा लाभ तथा सभी अनुबंध कर्मियों के लंबित आर्थिक लाभों के शीघ्र भुगतान की मांग की है.
रेखा कुमारी की मौत अब केवल एक कर्मचारी की मौत नहीं, बल्कि सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था की जवाबदेही और संवेदनशीलता पर खड़े होते गंभीर सवालों का प्रतीक बन चुकी है.
रिपोर्ट: मनीष बर्णवाल


