आदित्यपुर: नगर निगम एक बार फिर सवालों के घेरे में है. शहर के 35 वार्डों में पिछले करीब एक पखवाड़े से कचरा उठाव ठप है. नतीजा यह है कि सड़कें, गलियां और मोहल्ले कूड़े के ढेर में तब्दील हो चुके हैं. लोगों के घरों से कचरा उठाव बंद पड़ा हुआ है. बरसात के मौसम में सड़ता कचरा दुर्गंध फैला रहा है और संक्रामक बीमारियों का खतरा लगातार बढ़ता जा रहा है. शहर की तस्वीर ऐसी हो गई है मानो नगर निगम नहीं, बल्कि किसी लावारिस बस्ती का दृश्य हो.



स्थिति इतनी गंभीर है कि जनप्रतिनिधियों से लेकर चुने गए पार्षद लगातार शिकायत कर रहे हैं, लेकिन अधिकारी और कर्मी को मानो किसी के प्रति जवाबदेह ही नहीं हैं. उन्हें समय पर तनख्वाह और टेबल के नीचे से काला धन मिल ही रहा है जनता नर्क में रहें या स्वर्ग मे. गाहे- बगाहे चुने गए जनप्रतिनिधि उनके नियमितीकरण और मानदेय बढ़ाने की वकालत भी कर ही देते हैं उन्हें जनता की पीड़ा से क्या लेनादेना. ऐसे में सवाल उठ रहा है कि यदि चुने हुए जनप्रतिनिधियों की बात नहीं सुनी जा रही, तो आम जनता आखिर किसके पास जाए ?
कभी आदित्यपुर को लंदन, पेरिस और स्विट्जरलैंड जैसा शहर बनाने के दावे किए गए थे. आज वही शहर कूड़े के ढेर पर खड़ा है. लोग तंज कस रहे हैं कि आखिर वे सपने गए कहां ? सवाल उनपर भी उठ रहे हैं जो चुनाव में हार गए अब वे विपक्ष मे हैं. क्या अब उनकी जिम्मेदारी नहीं बनती कि वे मजबूत विपक्ष की भूमिका निभाएं और जनता के मुद्दे पर निगम प्रशासन से सवाल पूछें. वायदे तो उन्होंने भी किए थे, ये अलग है कि जनता ने उन्हें नकार दिया मगर स्वास्थ्य लोकतंत्र के लिए मजबूत विपक्ष का होना जरुरी है. समस्या सभी के लिए समान है.
वैसे यह संकट केवल कचरा उठाव तक सीमित नहीं है. नगर निगम के गठन के आठ वर्ष बाद भी ठोस कचरा प्रबंधन की स्थायी व्यवस्था नहीं बन सकी. घर- घर पाइपलाइन से जलापूर्ति का सपना अधूरा है. सीवरेज और आधुनिक ड्रेनेज सिस्टम अब भी फाइलों में कैद हैं. हर बारिश में जलजमाव और गंदगी शहर की पहचान बनती जा रही है.
दूसरी ओर, जनता का आरोप है कि सुविधाएं केवल व्यवस्था चलाने वालों की बढ़ी हैं. पदाधिकारी और जनप्रतिनिधि बेहतर वाहनों और संसाधनों से लैस होते गए, लेकिन टैक्स देने वाली जनता को मूलभूत सुविधाएं भी नसीब नहीं हुईं. ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि जनता के टैक्स का हिसाब कौन देगा ?
शहर के लोग यह भी पूछ रहे हैं कि यदि नगर निगम सफाई जैसी बुनियादी व्यवस्था भी सुनिश्चित नहीं कर सकता, तो करोड़ों रुपये के बजट और विकास योजनाओं का वास्तविक लाभ आखिर किसे मिल रहा है ?
अब जरूरत केवल कचरा उठाने की नहीं, बल्कि जवाबदेही तय करने की भी है. क्योंकि यदि यही हाल रहा, तो आदित्यपुर का विकास मॉडल कागजों और सोशल मीडिया की रीलों तक ही सीमित रह जाएगा, जबकि जमीनी हकीकत कूड़े के ढेर में दम तोड़ती रहेगी.





