जामताड़ा: यह झारखंड के स्वास्थ्य मंत्री इरफान अंसारी का गृह जिला है. वही जिला, जहां स्वास्थ्य सेवाएं सबसे बेहतर होने की उम्मीद की जाती है. लेकिन सोमवार की रात जामताड़ा में हुई तीन सड़क दुर्घटनाओं ने स्वास्थ्य व्यवस्था की हकीकत को एक बार फिर बेनकाब कर दिया.


एक ही रात में जिले के अलग- अलग इलाकों में तीन सड़क हादसे हुए और तीन लोग गंभीर रूप से घायल हो गए. मोहड़ा गांव के पास दो बाइकों की टक्कर में शेख हरोज गंभीर रूप से घायल हुए. वहीं दूसरी घटना में टेंपो की टक्कर से बुधन महतो जख्मी हो गए. तीसरी दुर्घटना फुलजरी के पास हुई, जहां अज्ञात ट्रैक्टर की चपेट में आने से मोहन किस्कू गंभीर रूप से घायल हो गए.
हैरानी की बात यह है कि इन हादसों के बाद घायलों को समय पर एम्बुलेंस नहीं मिल सकी. स्थानीय लोगों और समाजसेवियों को निजी वाहनों से घायलों को अस्पताल पहुंचाना पड़ा. आरोप है कि रेफर के दौरान एम्बुलेंस में ऑक्सीजन जैसी बुनियादी सुविधा भी उपलब्ध नहीं थी. ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि आखिर आपातकालीन स्वास्थ्य सेवाओं के दावे जमीन पर क्यों नहीं दिखाई देते.
यह पहला मामला नहीं है. हाल ही में गोपालपुर के मोनू टुडू मामले में भी समय पर एम्बुलेंस नहीं मिलने को लेकर सवाल उठे थे. मामला अभी ठंडा भी नहीं पड़ा था कि एक ही रात में तीन नए हादसों ने स्वास्थ्य तंत्र की तैयारियों पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया.
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि दुर्घटना के बाद घायल को अस्पताल पहुंचाने के लिए समाजसेवियों और ग्रामीणों पर निर्भर रहना पड़े, तो फिर करोड़ों रुपये खर्च कर संचालित की जा रही आपातकालीन सेवाओं का लाभ किसे मिल रहा है ? क्या 108 एम्बुलेंस सेवा सिर्फ कागजों में बेहतर है या जमीनी स्तर पर भी उतनी ही सक्रिय है ?
अक्सर जब मीडिया ऐसे मामलों को उठाता है तो कुछ लोग इसे नकारात्मक खबर कहकर खारिज करने की कोशिश करते हैं. लेकिन सवाल यह है कि यदि घायल सड़क पर तड़पते रहें, एम्बुलेंस समय पर न पहुंचे और अस्पतालों में जरूरी सुविधाएं न मिलें, तो जिम्मेदार कौन है ? मीडिया, जो इन सवालों को सामने ला रहा है या वह सिस्टम, जो जवाबदेही से बचता नजर आ रहा है ?
फिलहाल तीनों घायल बेहतर इलाज के लिए रेफर किए जा चुके हैं. मगर इन हादसों ने एक बार फिर यह बहस छेड़ दी है कि जामताड़ा में स्वास्थ्य सेवाओं की वास्तविक स्थिति क्या है और आखिर कब तक घायल मरीज व्यवस्था की लापरवाही का खामियाजा भुगतते रहेंगे.
रिपोर्ट: मनीष बर्णवाल

