सरायकेला: गम्हरिया जेएफसीआई गोदाम अग्निकांड में झुलसे सहायक गोदाम प्रबंधक अभिषेक हाजरा ने मंगलवार को टाटा मुख्य अस्पताल में दम तोड़ दिया. पूरे दिन विभाग के किसी भी अधिकारी ने न तो परिजनों को सांत्वना दी, न ही टीमएच पहुंचकर स्थिति की जानकारी ली.

देर शाम जिला उपायुक्त ने अपने कक्ष में एक औपचारिक श्रद्धांजलि सभा आयोजित कर मृतक की आत्मा की शांति के लिए दो मिनट का मौन रखा और शोक संतप्त परिवार के प्रति संवेदना जताई. इस दौरान संबंधित विभाग के अधिकारी समेत अन्य अधिकारी मौजूद रहे.
यह घटना प्रशासनिक तंत्र की संवेदनहीनता और सिस्टम की गहरी खामियों को उजागर करती है. चाहे विभागीय अधिकारी हों या मीडिया, हर किसी की भूमिका अब सवालों के घेरे में है. गोदाम अग्निकांड में झुलसे डीएसडी ठेकेदार राजू सेनापति और सहायक गोदाम प्रबंधक अभिषेक हाजरा दोनों की मौत ने कई ऐसे सवाल छोड़ दिए हैं जिनके जवाब अब तक किसी के पास नहीं हैं.
जैसे…
गोदाम में आग कैसे लगी ?
आग लगी या लगाई गई ?
विभाग के हवाले से मीडिया ट्रायल क्यों किया गया वह भी बड़े नामचीन अखबार में ?
घटना के एक हफ्ते बाद भी एफआईआर क्यों दर्ज नहीं कराई गई ?
जांच टीम ने अब तक अपनी रिपोर्ट उपायुक्त को क्यों नहीं सौंपी ?
तीस हजार क्विंटल खाद्यान्न की गड़बड़ी का आरोप मीडिया में किसने और किसके हवाले से छपवाया ?
घटना के बाद विभाग ने एजीएम को बचाने के लिए क्या कदम उठाए ?
घटना से दो दिन पहले एमओ का प्रभार बीसीओ को क्यों सौंपा गया और बाद में बैक डेट में रिसीव क्यों कराया गया ?
घटना के बाद से विभाग के कितने अधिकारियों ने पीड़ित परिवार से मुलाकात कर सहानुभूति जताई ?
अब तक डीएसओ, एमओ, बीसीओ, आरटीआई कार्यकर्ता हरिदत्त तिवारी और मीडिया कर्मियों की भूमिका की जांच क्यों शुरू नहीं की गई ?
मृतक एजीएम द्वारा आदित्यपुर थाना में दी गई शिकायत को रजिस्टर क्यों नहीं किया गया ?
राजू सेनापति की मौत के बाद डीएसओ रात के अंधेरे में उसके घर क्यों गए ?
विभाग के कर्मी की मौत पर विभाग ने चुप्पी क्यों साध ली ?
डाटा ऑपरेटर अशोक शर्मा को बलि का बकरा बनाने की साजिश किसने रची ? क्यों मीडिया में उसकी भूमिका को संदिग्ध बताया गया, जबकि वही दिन-रात अभिषेक हाजरा और राजू सेनापति के इलाज और सहयोग में जुटा था ?
सुलगते सवाल
अब सवाल यह उठता है कि क्या किसी कर्मचारी की मौत के बाद भी विभाग अपनी जिम्मेदारी से बच सकता है ? क्या जांच सिर्फ औपचारिकता बनकर रह जाएगी ? क्या दोषियों तक पहुंचने की बजाय निर्दोषों को फंसाया जाएगा ?
जवाब चाहे जो भी हों, लेकिन यह घटना सिस्टम की सच्चाई को बेनकाब कर रही है- जहां संवेदनाएं मर चुकी हैं और जवाबदेही का नाम तक नहीं बचा है. अभिषेक हाजरा और राजू सेनापति की मौत केवल हादसा नहीं, बल्कि एक व्यवस्था की नाकामी का दस्तावेज बन चुकी है. अब देखना यह है कि प्रशासन इस आग में झुलसती सच्चाई को दबाएगा या न्याय की लौ जलाएगा.
अगली रिपोर्ट में इंडिया न्यूज़ वायरल सभी संदिग्धो की भूमिका उजागर करने जा रही है. बने रहिये हमारे साथ…

