आदित्यपुर: रविवार को खरकई पुल से टायो गेट तक कथित मजदूरों की लंबी मानव श्रृंखला दिखी. कोल्हान मजदूर यूनियन के अध्यक्ष एवं ईचागढ़ के पूर्व विधायक अरविंद सिंह इसकी अगुआई कर रहे थे और मुद्दा था मजदूरों का हक, अधिकार, सम्मान और रोजगार. गम्हरिया के घोड़ा बाबा मंदिर परिसर में सभा हुई तो अरविंद सिंह ने साफ किया कि लड़ाई किसी उद्योग या प्रबंधन के खिलाफ नहीं है. उनका नारा था- “उद्योग मजबूत हों, मजदूर सुरक्षित हों और श्रम का सम्मान हो.”


बात मजदूरों की थी और भीड़ में मजदूरों की मौजूदगी को लेकर तरह- तरह की चर्चाएं होती रही. खैर राजनीति ऐसी चीज है कि भीड़ दिखे और उसके मायने न निकाले जाएं, ऐसा भला कैसे हो सकता है !

चाचा ने मजदूरों की चेन बनाई, चर्चा भतीजे की होने लगी
मानव श्रृंखला समाप्त हुई नहीं कि सियासी गलियारों में दूसरी ‘चेन’ जुड़ने लगी. सवाल उठने लगे कि पूर्व विधायक अरविंद सिंह का यह नया मजदूर अभियान सिर्फ श्रमिक अधिकारों की लड़ाई है या इसके तार भविष्य की राजनीति से भी जुड़ेंगे ? इस चर्चा के केंद्र में उनके भतीजे और आदित्यपुर नगर निगम के डिप्टी मेयर अंकुर सिंह भी आ गए हैं. हालांकि ऐसा कोई प्रमाण सामने नहीं है कि मजदूर यूनियन का यह अभियान अंकुर सिंह की राजनीतिक जमीन तैयार करने के लिए शुरू किया गया है. लिहाजा इसे फिलहाल राजनीतिक चर्चाओं और अटकलों के दायरे में ही रखना उचित होगा.

इधर मजदूर का हक, उधर डिप्टी मेयर के कामकाज पर सवाल
दिलचस्प यह है कि जिस समय चाचा अरविंद सिंह मजदूरों के हक- अधिकार की लड़ाई को धार दे रहे हैं, उसी समय भतीजे अंकुर सिंह के डिप्टी मेयर के रूप में कामकाज को लेकर भी स्थानीय स्तर पर सवाल उठ रहे हैं. नगर निगम क्षेत्र में सड़क, नाली, सफाई, जलापूर्ति और दूसरी नागरिक समस्याओं को लेकर शिकायतें लगातार सामने आती रही हैं. ऐसे में विरोधी और आलोचक यह सवाल उठा सकते हैं कि सियासत की अगली पारी से पहले मौजूदा पारी का स्कोरकार्ड भी जनता देखेगी.

सामाजिक और व्यावसायिक कार्यक्रमों में अंकुर सिंह की सक्रियता जरूर दिखाई देती है, लेकिन डिप्टी मेयर के रूप में उनके कामकाज का निष्पक्ष आकलन उपलब्धियों, निगम के अधिकार क्षेत्र और ठोस नतीजों के आधार पर ही किया जाना चाहिए.
मजदूरों की ‘चेन’ कितनी दूर जाएगी, यही असली परीक्षा
फिलहाल अरविंद सिंह ने औद्योगिक क्षेत्र के मजदूरों को सड़क पर उतारकर यह संदेश जरूर दिया है कि कोल्हान मजदूर यूनियन अपनी मौजूदगी दर्ज कराना चाहती है. मगर किसी भी मजदूर संगठन की असली ताकत मानव श्रृंखला की लंबाई से नहीं, मजदूरों को मिले परिणाम से तय होती है. इसलिए अब निगाह इस बात पर रहेगी कि आंदोलन के बाद कितने मजदूरों की समस्याएं हल होती हैं, कितनों को उनका दावा किया गया हक मिलता है और उद्योगों तथा श्रमिकों के बीच उठाए गए मुद्दों पर क्या ठोस पहल होती है. बाकी राजनीति है साहब- यहां एक तरफ मजदूर हाथ से हाथ जोड़कर मानव श्रृंखला बनाते हैं, तो दूसरी तरफ सियासी गलियारों में लोग उन्हीं हाथों से अगली चुनावी कड़ी जोड़ने का हिसाब लगाने लगते हैं. फिलहाल चेन मजदूरों की है, इसे चुनावी चेन मानने के लिए सबूत और वक्त- दोनों का इंतजार करना होगा.
संतोष कुमार

