जामताड़ा: कहते हैं, जब उम्मीदें दम तोड़ने लगती हैं, तब कुछ लोग फरिश्ता बनकर सामने आते हैं. जामताड़ा सदर अस्पताल में भी ऐसी ही एक कहानी लिखी गई, जहां सीमित संसाधनों के बीच एक डॉक्टर की जिद, पूरी टीम की मेहनत और माता- पिता के भरोसे ने दो नन्हीं जिंदगियों को मौत के मुंह से वापस खींच लिया.


13 अप्रैल 2026 को आरती कुमारी ने एक साथ तीन बच्चों को जन्म दिया. जन्म के समय तीनों नवजातों का वजन महज 800 ग्राम था. बच्चों की हालत इतनी गंभीर थी कि उन्हें तत्काल सदर अस्पताल के SNCU में भर्ती करना पड़ा. हर दिन एक नई चुनौती थी और हर पल जिंदगी व मौत के बीच संघर्ष चल रहा था.
इलाज के दौरान एक बच्चे की हालत ज्यादा बिगड़ने पर उसे धनबाद के पीएमसीएच रेफर किया गया, लेकिन तमाम कोशिशों के बावजूद उसकी जान नहीं बचाई जा सकी. इस दुखद घटना ने परिवार को तोड़ दिया, लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी. माता- पिता ने जामताड़ा सदर अस्पताल की SNCU इंचार्ज डॉ. कीर्ति पाठक झा और उनकी टीम पर भरोसा जताया और बाकी दो बच्चों का इलाज यहीं जारी रखने का फैसला किया.

इसके बाद शुरू हुआ जिंदगी बचाने का लंबा संघर्ष. करीब दो महीने तक डॉक्टरों और स्टाफ नर्सों ने दिन- रात एक कर दिया. हर सांस पर नजर रखी गई, हर छोटी- बड़ी जरूरत का ध्यान रखा गया. आखिरकार मेहनत रंग लाई और डिस्चार्ज के समय दोनों बच्चों का वजन बढ़कर 1.5 किलोग्राम हो गया.
जब दोनों मासूम स्वस्थ होकर अस्पताल से अपने माता- पिता की गोद में घर लौटे तो वहां मौजूद लोगों की आंखें भी नम हो गईं. माता- पिता ने भावुक होकर डॉ. कीर्ति पाठक झा और पूरी SNCU टीम को धन्यवाद दिया और कहा कि उनके लिए ये डॉक्टर किसी भगवान से कम नहीं हैं.
डॉ. कीर्ति ने बताया कि इलाज के दौरान कई बार हालात बेहद चुनौतीपूर्ण हो गए थे, लेकिन पूरी टीम ने हार नहीं मानी. लगातार देखभाल, अनुभव और टीमवर्क की बदौलत दोनों बच्चों को नई जिंदगी मिल सकी.
यह सिर्फ दो बच्चों के बचने की कहानी नहीं है, बल्कि यह उस भरोसे की जीत है जो आज भी सरकारी अस्पतालों और समर्पित डॉक्टरों पर कायम है. जामताड़ा सदर अस्पताल की यह सफलता साबित करती है कि संसाधन सीमित हो सकते हैं, लेकिन अगर इरादे मजबूत हों तो चमत्कार भी संभव है.
रिपोर्ट: मनीष बर्णवाल

