जामताड़ा: जिले की स्वास्थ्य व्यवस्था इन दिनों खुद आईसीयू में नजर आ रही है. विडंबना यह है कि जिस जिले को झारखंड के स्वास्थ्य मंत्री डॉ. ईरफान अंसारी का गृह जिला और राजनीतिक कर्मभूमि माना जाता है, वहीं मरीजों को समय पर एंबुलेंस तक नसीब नहीं हो रही है.


कभी जिले में 13 एंबुलेंस संचालित होती थीं. आज यह संख्या घटकर महज 5 रह गई है. जामताड़ा, मिहिजाम, नारायणपुर और करमाटांड़ जैसे बड़े क्षेत्रों की जिम्मेदारी सिर्फ दो एंबुलेंस के भरोसे चल रही है. ऐसे में हादसा हो या गंभीर बीमारी, मरीजों और परिजनों के सामने सबसे बड़ा सवाल इलाज नहीं, बल्कि अस्पताल तक पहुंचने का बन जाता है.
हालात इतने खराब हैं कि कई एंबुलेंसों में पंखे और एसी महीनों से खराब पड़े हैं. भीषण गर्मी में मरीजों को बेहतर इलाज के लिए धनबाद और रांची भेजा जाता है, लेकिन जीवन रक्षक वाहन ही उनके लिए यातना का सफर बन जाते हैं. जिस एंबुलेंस में मरीज को राहत मिलनी चाहिए, वहीं उसे घुटन और परेशानी का सामना करना पड़ रहा है.

चिकित्सा विज्ञान में “गोल्डन आवर” को जीवन बचाने का सबसे महत्वपूर्ण समय माना जाता है. लेकिन जामताड़ा में यह गोल्डन आवर अक्सर एंबुलेंस का इंतजार करते- करते खत्म हो जाता है. सवाल यह है कि जब समय पर एंबुलेंस ही नहीं पहुंचेगी तो मरीज की जान कैसे बचेगी ?
स्वास्थ्य विभाग के अधिकारी अब मरम्मत और अतिरिक्त एंबुलेंस भेजने की बात कर रहे हैं. वहीं अंदरखाने चर्चा है कि टेंडर प्रक्रिया और एजेंसी की उदासीनता का खामियाजा आम मरीज भुगत रहे हैं. लेकिन जनता पूछ रही है कि आखिर मरीजों की जान से बड़ा टेंडर कैसे हो सकता है ?
सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब स्वास्थ्य मंत्री का गृह जिला ही एंबुलेंस संकट से जूझ रहा है, तो राज्य के दूरदराज इलाकों की स्थिति कैसी होगी? सरकारी दावों में स्वास्थ्य व्यवस्था आधुनिक और मजबूत दिखाई देती है, लेकिन जमीनी हकीकत मरीजों और उनके परिजनों की पीड़ा में साफ नजर आती है. जामताड़ा की जनता अब कटाक्ष कर रही है-
“यहां अस्पताल पहुंचने से पहले मरीज को दवा नहीं, दुआ की जरूरत पड़ती है.”
रिपोर्ट: मनीष बर्णवाल

