सरायकेला: शहर के विकास, साफ-सफाई, सड़क, नाली और बुनियादी सुविधाओं में सुधार की उम्मीद के साथ जनता ने सरायकेला नगर पंचायत के जनप्रतिनिधियों को चुना था. लोगों को भरोसा था कि नई व्यवस्था में शहर की तस्वीर बदलेगी और वर्षों से लंबित समस्याओं का समाधान होगा. लेकिन नगर पंचायत के गठन के नौ महीने बीत जाने के बाद भी विकास कार्यों को लेकर अपेक्षित बदलाव नजर नहीं आने की शिकायतें सामने आ रही हैं. जनप्रतिनिधियों के बीच कथित आपसी खींचतान और नगर पंचायत के पदाधिकारियों की कार्यशैली को लेकर उठ रहे सवालों ने आम लोगों की चिंता बढ़ा दी है.


स्थिति यह सवाल खड़ा कर रही है कि आखिर नगर पंचायत की राजनीति में जनता की समस्याएं प्राथमिकता क्यों नहीं बन पा रही हैं. चुनाव के दौरान विकास के बड़े-बड़े वादे किए गए थे, लेकिन स्थानीय लोगों का कहना है कि उनकी उम्मीदों के अनुरूप जमीनी स्तर पर काम दिखाई नहीं दे रहा है. ऐसे में जनता के बीच निराशा और नाराजगी बढ़ना स्वाभाविक है.
विकास की जगह आपसी खींचतान पर सवाल
नगर पंचायत की राजनीति में यदि जनप्रतिनिधियों का समय एक-दूसरे की कमियां गिनाने, आरोप-प्रत्यारोप लगाने और अपना राजनीतिक वर्चस्व स्थापित करने में ही बीतता रहेगा, तो शहर का विकास कैसे होगा? जनता को इस बात से कोई खास मतलब नहीं है कि राजनीतिक श्रेय किसे मिलता है या किसका पलड़ा भारी रहता है. लोगों की प्राथमिकता साफ-सफाई, नियमित कचरा उठाव, जर्जर सड़कों की मरम्मत, नालियों की व्यवस्था, पेयजल की उपलब्धता और पर्याप्त स्ट्रीट लाइट जैसी बुनियादी सुविधाएं हैं.
शहरवासियों की अपेक्षा है कि जनप्रतिनिधि आपसी मतभेदों से ऊपर उठकर विकास के मुद्दों पर एकजुट हों. राजनीतिक प्रतिस्पर्धा लोकतंत्र का हिस्सा है, लेकिन जब इसका असर जनहित के कार्यों पर पड़ने लगे, तो सवाल उठना लाजिमी है.
पदाधिकारियों की कार्यशैली पर भी उठ रहे सवाल
नगर पंचायत की व्यवस्था को लेकर लोगों की नाराजगी केवल जनप्रतिनिधियों की कथित आपसी खींचतान तक सीमित नहीं है. स्थानीय लोगों का आरोप है कि कुछ पदाधिकारियों की कार्यशैली के कारण भी आम जनता को परेशानी का सामना करना पड़ रहा है. अपनी समस्याओं के समाधान के लिए लोगों को बार-बार कार्यालयों के चक्कर लगाने पड़ते हैं और अपेक्षित राहत नहीं मिलने की शिकायतें सामने आती हैं.
ऐसे में सवाल उठता है कि जब जनप्रतिनिधियों के बीच तालमेल की कमी की चर्चा हो और पदाधिकारियों के कामकाज से भी लोग संतुष्ट नहीं हों, तो आम नागरिक अपनी समस्याओं के समाधान के लिए आखिर किसके पास जाएं?
हालांकि, पदाधिकारियों की कार्यशैली को लेकर सामने आ रही शिकायतों की निष्पक्ष समीक्षा और संबंधित पक्ष का जवाब भी जरूरी है, ताकि वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सके. नगर पंचायत की कार्यप्रणाली में पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करना समय की मांग है.
बैठकों और आश्वासनों से नहीं, धरातल पर काम से बदलेगी तस्वीर
नगर पंचायत का कामकाज केवल बैठकों, प्रस्तावों और आश्वासनों तक सीमित नहीं रह सकता. योजनाओं को समय पर धरातल पर उतारना, नागरिकों की शिकायतों पर त्वरित कार्रवाई करना और विकास कार्यों की नियमित निगरानी करना भी उतना ही जरूरी है.
शहर में साफ-सफाई की नियमित व्यवस्था, जलजमाव से निजात, नालियों की मरम्मत, सड़कों की स्थिति में सुधार और पर्याप्त रोशनी जैसी समस्याएं सीधे आम लोगों के दैनिक जीवन को प्रभावित करती हैं. इन मुद्दों पर ठोस पहल ही जनता के बीच नगर पंचायत की विश्वसनीयता बढ़ा सकती है.
यदि जनप्रतिनिधियों के बीच आपसी तालमेल की कमी के कारण विकास योजनाएं प्रभावित हो रही हैं, तो इसका नुकसान किसी राजनीतिक दल या व्यक्ति को नहीं, बल्कि पूरे शहर को उठाना पड़ता है.
नौ महीने बीते, अब जवाबदेही तय करने का समय
चुनाव के समय जनता से किए गए वादे केवल भाषणों और नारों तक सीमित नहीं रहने चाहिए. जनप्रतिनिधियों की असली परीक्षा चुनाव जीतने के बाद शुरू होती है. जनता यह जानना चाहती है कि जिन समस्याओं के समाधान का भरोसा दिलाया गया था, उन पर अब तक कितनी प्रगति हुई है और आने वाले समय में क्या ठोस कदम उठाए जाएंगे.
नगर पंचायत के जनप्रतिनिधियों को समझना होगा कि राजनीतिक मतभेद अपनी जगह हैं, लेकिन जनहित सर्वोपरि है. वहीं, पदाधिकारियों की जिम्मेदारी है कि वे नियमों के अनुरूप पारदर्शिता के साथ काम करें और आम लोगों की शिकायतों का समयबद्ध समाधान सुनिश्चित करें.
पांच साल के कार्यकाल पर अभी से उठने लगे सवाल
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि आपसी खींचतान और शिकायतों का सिलसिला इसी तरह जारी रहा, तो पांच साल के कार्यकाल में सरायकेला नगर पंचायत की तस्वीर कैसे बदलेगी? कहीं ऐसा न हो कि कार्यकाल पूरा होने तक विकास के वादे केवल कागजों और भाषणों तक सिमटकर रह जाएं और जनता बुनियादी सुविधाओं के लिए भटकती रहे.
अब देखना यह होगा कि नगर पंचायत के जनप्रतिनिधि आपसी विवादों से बाहर निकलकर विकास को प्राथमिकता देते हैं या खींचतान का सिलसिला आगे भी जारी रहता है. साथ ही, यह भी महत्वपूर्ण होगा कि पदाधिकारी अपनी कार्यशैली में सुधार लाकर जनता का भरोसा जीतने के लिए क्या कदम उठाते हैं.
फिलहाल, सरायकेला की जनता को आरोप-प्रत्यारोप नहीं, विकास चाहिए. आश्वासन नहीं, धरातल पर काम चाहिए. जनता यह जानना चाहती है कि उसकी समस्याओं का समाधान कब होगा और नगर पंचायत की व्यवस्था जवाबदेह कब बनेगी. आखिर नगर पंचायत की कुर्सी जनता की सेवा के लिए है, न कि आपसी वर्चस्व की लड़ाई और आम लोगों को कार्यालयों के चक्कर लगवाने के लिए.
रिपोर्ट: प्रमोद सिंह (संपादक)

