सरायकेला: सरायकेला- खरसावां की राजनीति में इस समय सबसे बड़ा सवाल विपक्ष और सत्ता के बीच मुकाबले से ज्यादा दोनों प्रमुख राजनीतिक दलों के भीतर चल रही गुटबाजी का है. झारखंड मुक्ति मोर्चा और भाजपा दोनों ही अपने- अपने संगठन के भीतर खेमेबंदी, नेतृत्व की स्वीकार्यता और टिकट की दावेदारी को लेकर एक ऐसे दौर से गुजर रहे हैं, जिसका असर आने वाले वर्षों की चुनावी राजनीति पर पड़ सकता है.



यह कहना अभी जल्दबाजी होगा कि किसी दल में टूट तय है. लेकिन पार्टी के भीतर असंतोष, नेताओं की महत्वाकांक्षा और समानांतर राजनीतिक केंद्रों की सक्रियता को नजरअंदाज करना भी मुश्किल है. खासकर झामुमो में सांसद जोबा माझी, विधायक दशरथ गागराई, गणेश महाली और जिला संगठन से जुड़े समीकरणों को लेकर राजनीतिक हलकों में चर्चाएं तेज हैं. दूसरी तरफ भाजपा में चंपाई सोरेन के आने के बाद पुराने संगठनात्मक समीकरण और नए राजनीतिक समूहों के बीच तालमेल भी एक महत्वपूर्ण सवाल बना हुआ है.
दिलचस्प बात यह है कि दोनों दलों की समस्या का चरित्र अलग होते हुए भी मूल सवाल लगभग एक ही है- क्या पार्टी का संगठन एक नेतृत्व के पीछे पूरी तरह एकजुट है ?
झामुमो में असंतोष की चर्चा, लेकिन संगठन अभी सक्रिय
झामुमो को लेकर पार्टी के भीतर नाराजगी की चर्चाएं लगातार सामने आ रही हैं. कुछ कार्यकर्ताओं और युवाओं के बीच यह भावना होने की बात कही जा रही है कि संगठन के फैसलों में सीमित लोगों का प्रभाव बढ़ गया है. चुनाव से पहले हेमंत सोरेन के नेतृत्व में पार्टी में शामिल हुए कुछ युवाओं के स्वयं को असहज महसूस करने की चर्चाएं भी राजनीतिक गलियारों में हैं. हालांकि, इन दावों को पार्टी के आधिकारिक स्तर पर स्वीकार नहीं किया गया है. जबकि पार्टी के कार्यक्रम और संगठनात्मक गतिविधियां जारी हैं, लेकिन उसके भीतर राजनीतिक महत्वाकांक्षाओं का संघर्ष भी जारी है.
सबसे बड़ा सवाल- जोबा माझी या कोई नया चेहरा ?
सिंहभूम की सांसद जोबा माझी झामुमो की प्रमुख राजनीतिक चेहरों में हैं. 2026 में भी वे क्षेत्र में सक्रिय दिखाई दी हैं और सरायकेला विधानसभा क्षेत्र के गांवों में विकास योजनाओं को लेकर कार्यक्रम कर चुकी हैं. लेकिन पार्टी के भीतर उनके भविष्य को लेकर चर्चाएं भी शुरू हो गई हैं. राजनीतिक सूत्रों की मानें तो एक खेमा नहीं चाहता कि अगले लोकसभा चुनाव में जोबा माझी को दोबारा टिकट मिले. दूसरा खेमा खरसावां विधायक दशरथ गागराई के पक्ष में माहौल बनाने की कोशिश कर रहा है. जिलाध्यक्ष और पार्टी के कई प्रमुख आदिवासी नेता उनके कार्यक्रम से दूरी बनाते देखे जा रहे हैं. यहां एक बात महत्वपूर्ण है- टिकट की चर्चा और टिकट का फैसला दो अलग- अलग चीजें हैं. अभी चुनाव दूर हैं और पार्टी नेतृत्व ने किसी तरह का अंतिम निर्णय नहीं किया है. इसलिए इन चर्चाओं को फिलहाल संभावित राजनीतिक समीकरण के तौर पर ही देखा जाना चाहिए. लेकिन ऐसी चर्चाएं किसी भी संगठन के लिए महत्वपूर्ण संकेत होती हैं. क्योंकि जब टिकट की लड़ाई चुनाव से काफी पहले शुरू हो जाती है, तो उसका असर संगठन की एकजुटता पर पड़ता है.
दशरथ गागराई की बढ़ती राजनीतिक भूमिका
खरसावां विधायक दशरथ गागराई झामुमो के मजबूत क्षेत्रीय चेहरों में हैं. पार्टी की जिला और बूथ स्तर की गतिविधियों में उनकी सक्रियता दिखाई देती है. फरवरी 2026 में खरसावां में आयोजित बूथ स्तर के कार्यकर्ता सम्मेलन में भी उन्होंने कार्यकर्ताओं को संगठन और सरकारी योजनाओं को लेकर सक्रिय रहने का आह्वान किया था. जुलाई में कुचाई और राजनगर की जिला स्तरीय बैठक में भी उनकी मौजूदगी रही. आदिवासी चेहरा और खरसावां से तीन बार विधायक रह चुके दशरथ की यही सक्रियता उन्हें भविष्य के राजनीतिक समीकरणों में महत्वपूर्ण बनाती है. लेकिन दशरथ गागराई के लिए भी चुनौती यही होगी कि वे केवल विधानसभा क्षेत्र के मजबूत नेता के रूप में नहीं, बल्कि पूरे जिले में स्वीकार्य नेतृत्व के रूप में अपनी स्थिति कितनी मजबूत कर पाते हैं.
गणेश महाली की अपनी राजनीतिक जमीन
तीन बार सरायकेला विधानसभा सीट से चुनाव लड़ चुके गणेश महाली भी इस राजनीतिक कहानी का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं. वे पहले भाजपा में रहे और बाद में झामुमो में आए. वर्तमान में पार्टी की गतिविधियों में उनकी मौजूदगी देखी जाती है. जून 2026 में एसआईआर को लेकर झामुमो के कार्यक्रम में जोबा माझी, दशरथ गागराई और गणेश महाली एक ही मंच पर मौजूद थे. लेकिन राजनीति में मंच साझा करना और अंदरूनी राजनीतिक समीकरण एक ही बात नहीं होते. सूत्रों के मुताबिक गणेश महाली की नजर खरसावां विधानसभा क्षेत्र की राजनीति पर है. यदि ऐसा है तो आने वाले समय में झामुमो के भीतर एक और संभावित प्रतिस्पर्धा पैदा हो सकती है. यानी पार्टी के सामने केवल सांसद के टिकट का सवाल नहीं, बल्कि विधानसभा सीटों के संभावित दावेदारों का संतुलन भी चुनौती होगा.
जिलाध्यक्ष बनाम सांसद की चर्चा कितनी गंभीर ?
पार्टी के जिला संगठन और सांसद के बीच कथित मतभेद की चर्चाएं भी राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हैं. खासकर कांग्रेस से झामुमो में आए प्रोफेसर केपी सोरेन की सक्रियता के बाद इन समीकरणों को लेकर चर्चा तेज होने की बात कही जा रही है. यदि किसी पार्टी में जिला संगठन और निर्वाचित जनप्रतिनिधि के बीच दूरी बढ़ती है तो उसका सीधा असर बूथ स्तर पर पड़ सकता है. क्योंकि चुनाव सिर्फ बड़े नेताओं के चेहरे से नहीं जीते जाते. बूथ कमेटी, पंचायत स्तर के कार्यकर्ता, पुराने कार्यकर्ताओं की सक्रियता और स्थानीय नेताओं का आपसी समन्वय चुनाव का वास्तविक ढांचा तैयार करते हैं. यही वजह है कि झामुमो नेतृत्व के लिए सबसे बड़ी चुनौती गुटों को खत्म करना नहीं, बल्कि गुटों को एक चुनावी टीम में बदलना होगी. जिलाध्यक्ष को लेकर पार्टी के पुराने नेताओं और पदाधिकारियों में भी असंतोष देखा जा रहा है. खासकर आदिवासी नेताओं में उनको लेकर मतभेद धीरे- धीरे सुलग रहा है जो कभी भी विस्फोट रूप ले सकता है. कुछ महतो (कुड़मी) नेताओं में भी जिलाध्यक्ष को लेकर नाराजगी देखी जा रही है. इससे पार्टी के कुड़मी वोटर पर असर दिख सकता है. वैसे कुड़मी वोटर अब खुद को JLKM का मान चुके हैं. ज्यादातर कुड़मी वोटरों ने बीजेपी और झामुमो से दूरी बना ली है.
भाजपा की स्थिति भी पूरी तरह सहज नहीं
अगर झामुमो के भीतर खेमेबंदी की चर्चा है तो भाजपा भी इससे पूरी तरह मुक्त नहीं है. पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन के भाजपा में आने के बाद सरायकेला की भाजपा राजनीति में नया समीकरण बना. एक तरफ उनके साथ झामुमो से आए नेताओं का समूह है, दूसरी तरफ लंबे समय से भाजपा के संगठन में काम कर रहे पुराने नेता और कार्यकर्ता हैं. राजनीतिक चर्चा यह है कि इन दोनों धाराओं के बीच अभी पूरी तरह स्वाभाविक सामंजस्य नहीं बन पाया है. हालांकि भाजपा लगातार संगठनात्मक कार्यक्रम कर रही है. मई 2026 में सरायकेला- खरसावां में पार्टी का दो दिवसीय प्रशिक्षण वर्ग आयोजित हुआ, जिसमें पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा ने कार्यकर्ताओं को संगठन मजबूत करने का संदेश दिया. फरवरी 2026 में खरसावां में नए मंडल अध्यक्षों के सम्मान कार्यक्रम में भी अर्जुन मुंडा ने संगठन और समर्पित कार्यकर्ताओं को भाजपा की ताकत बताया था. इससे एक बात साफ है- भाजपा का पुराना संगठन अभी भी सक्रिय है और उसका अपना प्रभाव कायम है.
अर्जुन मुंडा बनाम चंपाई सोरेन ?
राजनीतिक हलकों में भाजपा के भीतर दो प्रभाव क्षेत्रों की चर्चा होती है. एक तरफ अर्जुन मुंडा की लंबे समय से स्थापित राजनीतिक और संगठनात्मक पकड़ है. दूसरी तरफ चंपाई सोरेन का अपना जनाधार और झामुमो से भाजपा में आया राजनीतिक नेटवर्क है. लेकिन इसे सीधे तौर पर ‘अर्जुन बनाम चंपाई’ कहना फिलहाल राजनीतिक सरलीकरण होगा. दोनों नेताओं की अपनी भूमिका है और पार्टी संगठन औपचारिक रूप से एक है. असल चुनौती यह है कि क्या चंपाई सोरेन के साथ भाजपा में आए नेताओं को पार्टी के पुराने संगठन में पूरी तरह राजनीतिक जगह मिल पाती है ? अगर इन नेताओं को लगता है कि वे उपेक्षित हैं, तो असंतोष पैदा हो सकता है. दूसरी ओर पुराने भाजपा कार्यकर्ताओं को यदि लगता है कि बाहरी नेताओं को प्राथमिकता मिल रही है, तो उनमें भी असहजता पैदा हो सकती है. दोनों स्थितियां भाजपा के लिए नुकसानदेह होंगी.
गीता कोड़ा भी एक संभावित फैक्टर
लोकसभा की राजनीति में गीता कोड़ा का नाम भी पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता. हालांकि उनकी सरायकेला विधानसभा क्षेत्र में सक्रियता फिलहाल सीमित दिखाई देती है, लेकिन सिंहभूम की व्यापक राजनीति में उनका राजनीतिक अनुभव और आधार आने वाले चुनावी समीकरणों में उपयोगी हो सकता है. इसलिए भाजपा के सामने भी भविष्य में सवाल होगा कि लोकसभा और विधानसभा के लिए वह किस चेहरे को आगे करती है और अलग- अलग सामाजिक एवं क्षेत्रीय समीकरणों को किस तरह साधती है.
असल लड़ाई विचारधारा की कम, टिकट और प्रभाव की ज्यादा
सरायकेला की राजनीति को समझने के लिए सबसे महत्वपूर्ण बिंदु यही है. झामुमो और भाजपा दोनों के भीतर जो असंतोष दिखाई देता है, उसकी जड़ केवल वैचारिक मतभेद नहीं है. टिकट, संगठन पर पकड़, राजनीतिक भविष्य और स्थानीय नेतृत्व में हिस्सेदारी इसके बड़े कारण हो सकते हैं. यही वजह है कि चुनाव नजदीक आने के साथ यह संघर्ष और तेज हो सकता है. आज जो नेता एक मंच पर दिखाई दे रहे हैं, जरूरी नहीं कि कल टिकट के सवाल पर भी उसी तरह एकजुट रहें.
गुटबाजी किसके लिए ज्यादा खतरनाक
झामुमो के लिए खतरा
यदि जोबा माझी, दशरथ गागराई, गणेश महाली और जिला संगठन से जुड़े अलग- अलग राजनीतिक केंद्रों के बीच संतुलन नहीं बनाया गया तो पार्टी को सबसे बड़ा नुकसान बूथ स्तर पर हो सकता है. पुराने कार्यकर्ता यदि निष्क्रिय होते हैं और नए कार्यकर्ताओं को पर्याप्त राजनीतिक जगह नहीं मिलती तो संगठन का विस्तार कागज पर तो दिखाई देगा, लेकिन चुनाव के समय उसकी वास्तविक ताकत कमजोर पड़ सकती है.
भाजपा के लिए खतरा
भाजपा की चुनौती दूसरी है. उसके पास मजबूत संगठन और पुराने कार्यकर्ताओं का नेटवर्क है. लेकिन चंपाई सोरेन के साथ आए राजनीतिक समूह को संगठन में कितनी जगह और भूमिका मिलती है, यह महत्वपूर्ण होगा. यदि पुराने और नए भाजपा नेताओं के बीच तालमेल बन गया तो भाजपा मजबूत हो सकती है. यदि दोनों खेमे अपने-अपने प्रभाव क्षेत्र बचाने में लग गए तो इसका लाभ सीधे झामुमो को मिल सकता है.
और यहीं से शुरू होती है तीसरी राजनीति
सरायकेला में आने वाले दिनों में केवल भाजपा बनाम झामुमो का मुकाबला नहीं होगा. असल मुकाबला होगा- कौन अपनी पार्टी की गुटबाजी को नियंत्रित कर पाता है. जिस दल में टिकट बंटवारे से पहले ही अंदरूनी संघर्ष खुलकर सामने आ गया, उसके लिए चुनाव में उम्मीदवार तय करना मुश्किल हो सकता है.
इसके उलट जिस दल ने समय रहते अपने संभावित दावेदारों को एक साथ बैठा लिया, पुराने कार्यकर्ताओं को सम्मान दिया और नए नेताओं को भूमिका दी, वही चुनावी मैदान में बढ़त बना सकता है.
भविष्य की राजनीति का सबसे बड़ा सवाल
सरायकेला की राजनीति में अभी कोई अंतिम तस्वीर नहीं बनी है. झामुमो सत्ता में होने का लाभ और हेमंत सोरेन की राजनीतिक पकड़ के सहारे मजबूत रहना चाहता है. भाजपा अपने संगठन, विपक्ष की भूमिका और चंपाई सोरेन के राजनीतिक प्रभाव को जोड़कर अपना आधार बढ़ाना चाहेगी. लेकिन दोनों दलों के सामने एक समान चुनौती है-
“बाहर के विरोधी से पहले भीतर के विरोधी को कैसे साधें ?”
अगर झामुमो अपने नेताओं की महत्वाकांक्षाओं को समन्वय में बदल लेता है तो उसकी संगठनात्मक ताकत बरकरार रह सकती है. अगर भाजपा पुराने संगठन और चंपाई खेमे के बीच सफलतापूर्वक संतुलन बना लेती है तो वह झामुमो के लिए गंभीर चुनौती बन सकती है. और यदि दोनों दल अपनी- अपनी गुटबाजी को नियंत्रित करने में असफल रहे, तो सरायकेला की राजनीति में तीसरे विकल्प, निर्दलीय चेहरे या छोटे क्षेत्रीय समीकरणों के लिए भी जगह बन सकती है. फिलहाल तस्वीर इतनी ही साफ है कि सरायकेला की अगली राजनीतिक लड़ाई सिर्फ झामुमो बनाम भाजपा नहीं होगी. यह दोनों दलों के भीतर नेतृत्व, टिकट और राजनीतिक वर्चस्व की लड़ाई भी होगी.
संतोष कुमार
प्रधान संपादक





