
आदित्यपुर: सरायकेला- खरसावां जिले के गम्हरिया प्रखंड अंतर्गत आसांगी मौजा की सरकारी जमीन पर विकास और विरोध आमने- सामने आ गया है. खाता संख्या-342. प्लॉट संख्या-276. रकबा 4.42 एकड़. भूमि की प्रकृति अनाबाद झारखंड सरकार. इसके बावजूद सरकारी जमीन पर पहले मंदिर निर्माण शुरू हुआ और अब जब जिला प्रशासन ने करीब 2.22 एकड़ जमीन औद्योगिक क्षेत्र की कामकाजी महिलाओं के लिए 500 बेड का वर्किंग वूमेन हॉस्टल बनाने हेतु जियाडा को हस्तांतरित किया तो विरोध का झंडा बुलंद कर दिया गया.


सबसे बड़ा तथ्य यह है कि विरोध कर रहे ग्रामीणों के ज्ञापन में स्वयं स्वीकार किया गया है कि संबंधित भूमि अनाबाद झारखंड सरकार की है. यानी जमीन सरकारी है. फिर सवाल उठता है कि सरकारी जमीन पर कब्जा कर निर्माण करने का अधिकार किसने दिया ? क्या सरकारी जमीन पर धार्मिक निर्माण कर देने मात्र से उस पर स्वामित्व का दावा किया जा सकता है ? राजस्व नियम इसका जवाब नहीं में देते हैं.
क्या कहता है नियम
राजस्व अभिलेखों के जानकारों का कहना है कि सरकारी जमीन पर बिना सक्षम अनुमति किसी भी प्रकार का स्थायी निर्माण या कब्जा वैधानिक अधिकार नहीं देता. यदि सरकार सार्वजनिक हित की परियोजना के लिए ऐसी भूमि का उपयोग करती है तो उसे रोकने का अधिकार किसी व्यक्ति या समूह को नहीं है.
सूत्रों की मानें तो सरकारी जमीन पर पहले धार्मिक निर्माण और फिर सरकारी परियोजना का विरोध कोई सामान्य घटनाक्रम नहीं माना जा रहा है. प्रशासनिक हलकों में यह चर्चा भी है कि पूरे मामले में जमीन माफिया अथवा अन्य स्वार्थी तत्वों की भूमिका की जांच की जानी चाहिए. हालांकि इसकी आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है.
जिला प्रशासन का पक्ष पूरी तरह स्पष्ट है. उपायुक्त के निर्देश पर जियाडा को भूमि हस्तांतरित की गई है ताकि औद्योगिक क्षेत्र में कार्यरत हजारों महिलाओं को सुरक्षित आवास उपलब्ध कराया जा सके. यह परियोजना सार्वजनिक हित से जुड़ी है और इसका सीधा लाभ महिला श्रमिकों को मिलेगा.
वहीं दूसरी ओर विरोध कर रहे ग्रामीणों ने मंदिर, तालाब, ग्रामसभा, सड़क और सीवरेज जैसे मुद्दे उठाए हैं. लेकिन ज्ञापन में ऐसा कोई दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किया गया है जिससे यह साबित हो सके कि मंदिर निर्माण के लिए सरकारी अनुमति ली गई थी या जमीन किसी धार्मिक संस्था को विधिवत आवंटित की गई थी.
गम्हरिया के अंचल अधिकारी प्रवीण कुमार ने स्पष्ट शब्दों में कहा है. “सरकारी जमीन के अधिग्रहण अथवा हस्तांतरण की प्रक्रिया में जो भी व्यक्ति बाधा उत्पन्न करेगा. उसके विरुद्ध सरकारी कार्य में बाधा पहुंचाने का मामला दर्ज किया जाएगा.” सीओ के इस बयान के बाद प्रशासन का रुख पूरी तरह स्पष्ट हो गया है. सरकारी परियोजना को हर हाल में आगे बढ़ाया जाएगा और कानून हाथ में लेने वालों के खिलाफ कार्रवाई होगी.
अब सबसे बड़ा सवाल यही है. क्या सरकारी जमीन पर अवैध कब्जे की आड़ में विकास कार्य रोका जाएगा ? या फिर प्रशासन सरकारी संपत्ति को मुक्त कराकर सार्वजनिक हित की परियोजना को धरातल पर उतारेगा ? आने वाले दिनों में इस सवाल का जवाब प्रशासनिक कार्रवाई से मिल जाएगा. वैसे आसांगी खुद एक विस्थापित ग्राम है मगर आसंगी के लोग अपनी जमीन बेचकर कई बिल्डरों और ख़रीदारों को कब्ज़ा लेने नहीं दे रहे हैं. ऐसे कई मामले सामने आ रहे हैं.





