सरायकेला: जिले के गम्हरिया अंचल अंतर्गत गोपीनाथपुर मौजा में जमीन के एक बड़े भू-भाग को लेकर पर्दे के पीछे क्या चल रहा है ? वन एवं पर्यावरण से जुड़े नियमों की कसौटी पर प्रस्ताव कितना सही है ? संबंधित भू-भाग में वनभूमि के साथ आदिवासी जमीन की प्रकृति और स्वामित्व क्या है ? और सबसे बड़ा सवाल- क्या किसी प्रभावशाली राजनीतिक नाम और रसूख के सहारे नियमों की दीवार लांघने की तैयारी की जा रही है ?


इन सवालों ने इसलिए गंभीर रूप लेना शुरू कर दिया है क्योंकि सूत्रों से मिल रही जानकारी के अनुसार गोपीनाथपुर मौजा से संबंधित एक बड़े भू-भाग के हस्तांतरण की कथित प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई है और फाइल सचिवालय स्तर तक पहुंचने की चर्चा है. दावा किया जा रहा है कि इस पूरी कवायद के पीछे एक पूर्व मुख्यमंत्री के करीबी माने जाने वाले प्रभावशाली व्यक्ति का हित जुड़ा हुआ है. हालांकि इन सूचनाओं की अभी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है और संबंधित पक्षों का पक्ष सामने आना बाकी है.
ग्रीन जोन के करीब जमीन, फिर हस्तांतरण की इतनी बेचैनी क्यों ?
मामला सामान्य भूमि हस्तांतरण का होता तो शायद इतने सवाल खड़े नहीं होते. लेकिन सूत्र इसे वन एवं पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील क्षेत्र से जोड़ रहे हैं. ऐसे में यह जानना जरूरी है कि संबंधित जमीन की राजस्व और वन अभिलेखों में वास्तविक प्रकृति क्या है और प्रस्तावित उपयोग के लिए किन-किन स्तरों से अनापत्ति अथवा अनुमति जरूरी है.
यदि सभी नियमों का पालन किया गया है तो वन विभाग को बताने में कोई परेशानी नहीं होनी चाहिए कि कितना भू-भाग प्रस्तावित है, जमीन की प्रकृति क्या है, किस उद्देश्य से हस्तांतरण की प्रक्रिया चल रही है और इसके लिए कौन-कौन सी वैधानिक स्वीकृतियां ली गई हैं.
आदिवासी जमीन से छेड़छाड़ का भी गंभीर आरोप
सूत्रों का दावा यहीं तक सीमित नहीं है. संबंधित प्रक्रिया में आदिवासी जमीन के रिकॉर्ड अथवा स्वरूप से छेड़छाड़ किए जाने की भी सूचना मिल रही है. यह आरोप बेहद गंभीर है और इसकी पुष्टि दस्तावेजी जांच के बाद ही हो सकती है. यदि संबंधित भू-भाग में आदिवासी रैयती जमीन शामिल है तो उसके हस्तांतरण से संबंधित वैधानिक प्रावधानों और अभिलेखीय स्थिति की स्वतंत्र जांच आवश्यक हो जाती है.
फाइल सचिवालय तक पहुंची तो किसकी अनुशंसा पर ?
चर्चा है कि फाइल वन विभाग के उच्च स्तर तक भेजी जा चुकी है. यदि ऐसा है तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि प्रस्ताव किस अधिकारी ने तैयार किया, स्थल सत्यापन किसने किया, जमीन की प्रकृति किस आधार पर निर्धारित की गई और किन अधिकारियों की अनुशंसा के बाद फाइल आगे बढ़ी ? सूत्र सचिवालय स्तर पर कार्यरत कुछ महिला कर्मियों की भूमिका को लेकर भी सवाल उठा रहे हैं.
रसूख का नाम आते ही नियमों का रुख बदल गया ?
सूत्रों के दावे के मुताबिक शुरुआत में संबंधित प्रस्ताव को लेकर विभागीय स्तर पर अपेक्षित सहमति नहीं बन रही थी. बाद में एक चर्चित पूर्व मुख्यमंत्री से निकटता का हवाला सामने आने के बाद प्रक्रिया में तेजी आने की चर्चा है. यह दावा भी जांच का विषय है, लेकिन यदि फाइल की समयरेखा इसकी पुष्टि करती है तो मामला और गंभीर हो जाएगा.
वन और जमीन के मामलों में किसी व्यक्ति का राजनीतिक रसूख नियमों का विकल्प नहीं हो सकता. स्वीकृति यदि नियमसम्मत है तो दस्तावेज स्वयं इसकी पुष्टि करेंगे और यदि नियमों में कोई विचलन हुआ है तो उसकी जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए.
मुख्यमंत्री के अधीन विभाग, इसलिए जवाबदेही और बड़ी
मामले की संवेदनशीलता इसलिए भी बढ़ जाती है क्योंकि वन एवं पर्यावरण विभाग सरकार के महत्वपूर्ण विभागों में शामिल है. ऐसे में विभागीय अधिकारियों से अपेक्षा है कि जमीन की प्रकृति, पर्यावरणीय प्रभाव और लागू कानूनी प्रावधानों की जांच किए बिना किसी प्रस्ताव को आगे नहीं बढ़ाया जाए.
India News Viral के पास इस प्रकरण से जुड़ी सूचनाएं लगातार पहुंच रही हैं. इन सूचनाओं और उपलब्ध कराए जा रहे दस्तावेजों का सत्यापन किया जा रहा है. हमारा उद्देश्य किसी व्यक्ति अथवा अधिकारी को बिना प्रमाण दोषी ठहराना नहीं, बल्कि यह पता लगाना है कि गोपीनाथपुर की जमीन से जुड़ी फाइल में वास्तव में क्या हुआ.
यह अभी सिर्फ ट्रेलर है. अगली कड़ी में दस्तावेजों के आधार पर पड़ताल होगी- जमीन कितनी है, किस प्रकृति की है, किसके लिए प्रस्ताव तैयार हुआ, फाइल किस-किस अधिकारी की टेबल से गुजरी और नियमों की कसौटी पर पूरा मामला कहां खड़ा है.

