सरायकेला: जिले में अवैध महुआ शराब के खिलाफ उत्पाद विभाग की कार्रवाई एक बार फिर सुर्खियों में है. रविवार को राजनगर थाना क्षेत्र के जनबानी और हनुमतबेड़ा गांव में उत्पाद विभाग की टीम ने छापेमारी कर चार अवैध चुलाई भट्ठियों को ध्वस्त किया तथा करीब 7,100 किलोग्राम जावा महुआ और 140 लीटर अवैध महुआ शराब बरामद करने का दावा किया है. विभाग की कार्रवाई कागज पर बड़ी सफलता जरूर नजर आती है, लेकिन इसके साथ ही एक बड़ा सवाल भी खड़ा हो रहा है. अगर अवैध शराब के अड्डों पर लगातार छापेमारी हो रही है, तो कार्रवाई के कुछ समय बाद उन्हीं इलाकों में फिर से चुलाई का कारोबार कैसे शुरू हो जाता है.


उपायुक्त नीतीश कुमार सिंह के निर्देश और उत्पाद अधीक्षक क्षितिज विजय मिंज के नेतृत्व में जिले में अवैध शराब के निर्माण, भंडारण, परिवहन और बिक्री के खिलाफ लगातार अभियान चलाया जा रहा है. रविवार की कार्रवाई भी गुप्त सूचना के आधार पर की गई. विभाग के अनुसार, चार अवैध चुलाई भट्ठियों को ध्वस्त किया गया तथा बड़ी मात्रा में जावा महुआ और तैयार शराब जब्त की गई. बरामद सामग्री को जब्त कर संबंधित अवैध चुलाई अड्डा संचालकों के खिलाफ झारखंड उत्पाद अधिनियम की सुसंगत धाराओं के तहत अभियोग दर्ज करने की कार्रवाई की जा रही है.
लेकिन जमीनी हकीकत को लेकर स्थानीय स्तर पर कई सवाल उठ रहे हैं. स्थानीय सूत्रों का दावा है कि कई स्थानों पर उत्पाद विभाग की टीम के लौटने के बाद कुछ ही समय में अवैध शराब की चुलाई और बिक्री फिर शुरू हो जाती है. यदि ये आरोप सही हैं, तो सवाल सिर्फ भट्ठियां ध्वस्त करने तक सीमित नहीं रहता, बल्कि यह भी देखना जरूरी हो जाता है कि अवैध कारोबार के वास्तविक संचालकों तक कार्रवाई क्यों नहीं पहुंच पाती.
*हजारों किलो जावा महुआ, फिर भी संचालक कौन !*
उत्पाद विभाग की कार्रवाई में अक्सर बड़ी मात्रा में जावा महुआ और तैयार शराब बरामद होने की जानकारी सामने आती है, लेकिन कई मामलों में अवैध शराब कारोबार से जुड़े लोगों की गिरफ्तारी नहीं होने को लेकर भी सवाल उठते हैं. यही बात कार्रवाई की प्रभावशीलता पर बड़ा प्रश्नचिह्न खड़ा करती है.
स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि किसी स्थान पर लंबे समय से बड़े पैमाने पर अवैध शराब की चुलाई हो रही है और वहां से हजारों किलोग्राम जावा महुआ बरामद होता है, तो यह केवल एक दिन का काम नहीं हो सकता. ऐसे में यह पता लगाना जरूरी है कि इस कारोबार का संचालन कौन कर रहा था, शराब कहां खपाई जा रही थी और इसके पीछे कौन-कौन लोग जुड़े हैं.
अवैध शराब के खिलाफ कार्रवाई का उद्देश्य केवल भट्ठियां तोड़ना या जावा महुआ नष्ट करना नहीं होना चाहिए. असली चुनौती उन लोगों तक पहुंचने की है, जो इस पूरे अवैध कारोबार को संचालित करते हैं.
*बार-बार कार्रवाई, फिर भी कारोबार कैसे शुरू ?*
यदि किसी इलाके में बार-बार एक ही तरह की कार्रवाई होती है और कुछ दिनों बाद फिर उसी स्थान अथवा आसपास के क्षेत्रों में चुलाई शुरू हो जाती है, तो यह विभागीय निगरानी और कार्रवाई के परिणामों पर गंभीर सवाल खड़े करता है.
स्थानीय स्तर पर यह भी चर्चा है कि कई बार छापेमारी के दौरान मुख्य आरोपी मौके पर नहीं मिलते और सिर्फ शराब बनाने की सामग्री बरामद कर कार्रवाई पूरी कर दी जाती है. हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन यदि ऐसी शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं तो उत्पाद विभाग को इसकी निष्पक्ष जांच कर वास्तविक स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए.
कुछ स्थानीय सूत्रों ने आरोप लगाया है कि कुछ अवैध शराब कारोबारियों को कथित तौर पर छापेमारी की जानकारी पहले ही मिल जाती है और विभागीय टीम के पहुंचने से पहले वे मौके से निकल जाते हैं. ऐसे आरोप बेहद गंभीर हैं और पुष्टि के बिना इन्हें तथ्य नहीं माना जा सकता.
लेकिन सवाल यह है कि यदि विभाग को लगातार सूचना के आधार पर छापेमारी करनी पड़ रही है और फिर भी मुख्य संचालक हाथ नहीं लगते, तो सूचना तंत्र और कार्रवाई की गोपनीयता की समीक्षा क्यों नहीं की जाती.
*‘मनी टोकन’ के आरोपों पर भी उठे सवाल*
स्थानीय सूत्रों की ओर से उत्पाद विभाग की कार्रवाई को लेकर ‘मनी टोकन’ के नाम पर गंभीर आरोप भी लगाए जा रहे हैं. दावा किया जा रहा है कि जहां कथित तौर पर ऐसा लेन-देन बंद हो जाता है, वहां कार्रवाई होती है और जहां कथित भुगतान जारी रहने की चर्चा है, वहां अवैध चुलाई को संरक्षण मिलने की बात कही जाती है.
इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है और इनके आधार पर किसी अधिकारी या कर्मचारी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता. बावजूद इसके, यदि स्थानीय स्तर पर ऐसे आरोप लगातार उठ रहे हैं तो विभाग के लिए इनका स्पष्ट जवाब देना जरूरी हो जाता है.
पारदर्शिता के लिए विभाग को यह बताना चाहिए कि छापेमारी किन आधारों पर की जाती है, कितने मामलों में प्राथमिकी दर्ज हुई, कितने आरोपियों की गिरफ्तारी हुई और कितने मामलों में न्यायालय तक कार्रवाई पहुंची.
*भट्ठियां नहीं, पूरा नेटवर्क तोड़ना होगा*
अवैध शराब के खिलाफ अभियान की सफलता का आकलन सिर्फ इस बात से नहीं होना चाहिए कि कितनी भट्ठियां तोड़ी गईं या कितने लीटर शराब बरामद हुई. असली सवाल यह है कि कितने कारोबारियों की पहचान हुई, कितने आरोपी गिरफ्तार हुए, अवैध शराब की आपूर्ति श्रृंखला कितनी टूटी और दोबारा उसी स्थान पर कारोबार शुरू होने से रोकने के लिए क्या व्यवस्था की गई.
राजनगर जैसे ग्रामीण क्षेत्रों में यदि अवैध चुलाई लंबे समय से चल रही है तो केवल छापेमारी करके लौट जाना स्थायी समाधान नहीं है. इसके लिए नियमित निगरानी, मजबूत स्थानीय सूचना तंत्र और बार-बार चिन्हित होने वाले अड्डों पर लगातार नजर रखना जरूरी है.
रविवार की कार्रवाई में 7,100 किलो जावा महुआ और 140 लीटर अवैध शराब की बरामदगी निश्चित रूप से बड़ी कार्रवाई है. लेकिन इसके बाद विभाग के सामने सबसे बड़ी चुनौती यही है कि क्या इन भट्ठियों के पीछे काम करने वाले वास्तविक संचालकों तक कार्रवाई पहुंच पाएगी.
यदि आरोपी पकड़े जाते हैं, उनके खिलाफ मजबूत कानूनी कार्रवाई होती है और संबंधित क्षेत्र में दोबारा अवैध चुलाई शुरू नहीं होती, तभी इस अभियान को वास्तविक सफलता माना जाएगा. वहीं, यदि कार्रवाई के कुछ दिन बाद फिर उसी इलाके में चुलाई शुरू हो जाती है और विभाग को इसकी भनक तक नहीं लगती, तो उसकी कार्यप्रणाली, निगरानी व्यवस्था और सूचना तंत्र पर सवाल उठना स्वाभाविक है.
उत्पाद अधीक्षक क्षितिज विजय मिंज ने कहा है कि जिले में अवैध शराब के खिलाफ अभियान लगातार जारी रहेगा और इस तरह की गतिविधियों में संलिप्त लोगों के खिलाफ नियमानुसार कठोर कार्रवाई की जाएगी. उन्होंने आम नागरिकों से भी अवैध शराब के निर्माण, बिक्री और परिवहन की सूचना प्रशासन अथवा उत्पाद विभाग को देने की अपील की है.
जनता को छापेमारी की तस्वीर नहीं, अवैध कारोबार पर स्थायी रोक चाहिए. भट्ठियां तोड़ना आसान है, लेकिन उस नेटवर्क को तोड़ना असली चुनौती है. अब देखना यह होगा कि उत्पाद विभाग इस चुनौती का सामना सिर्फ कागजी कार्रवाई से करता है या वास्तव में अवैध शराब के कारोबार की जड़ तक पहुंचकर कार्रवाई करता है.
प्रमोद सिंह (संपादक)


































































