सरायकेला: जिले के शिक्षा विभाग में सब कुछ ठीक- ठाक नहीं चल रहा है. यहां किसी को चार-चार महीने तक मानदेय के लिए इंतजार करना पड़ रहा है, तो किसी पर विभागीय मेहरबानी की ऐसी कहानी सामने आ रही है, जिसने पूरे भुगतान तंत्र को सवालों के घेरे में खड़ा कर दिया है. आखिर सरकारी नियमों और विभागीय आदेशों की अनदेखी कर वर्षों तक एक ही व्यक्ति को प्रखंड साधन सेवी के बराबर मानदेय, भत्ता और वार्षिक वेतन वृद्धि का लाभ किसके आदेश पर मिलता रहा. क्या विभाग में भुगतान के अलग- अलग नियम लागू हैं ? यदि नहीं, तो इस कथित मेहरबानी के पीछे कौन है !


शिक्षा विभाग के सूत्रों से मिली जानकारी के अनुसार, प्रखंड साधन सेवी के मानदेय भुगतान को लेकर गंभीर अनियमितता के आरोप सामने आए हैं. मामले में बीपीओ सांत्वना जेना को वर्ष 2008 से ही प्रखंड साधन सेवी के बराबर मानदेय दिए जाने की बात कही जा रही है. आरोप है कि उन्हें केवल निर्धारित मानदेय ही नहीं, बल्कि उससे जुड़े विभिन्न भत्तों और वार्षिक वेतन वृद्धि का लाभ भी लगातार दिया जाता रहा है.
2015 का विभागीय पत्र बना जांच का आधार
इस पूरे मामले में 27 जनवरी 2015 को जारी पत्रांक संख्या NPEGEL/A1/10/3/2005/2/7 महत्वपूर्ण माना जा रहा है. तत्कालीन झारखंड शिक्षा परियोजना निदेशक पूजा सिंघल द्वारा जारी इस पत्र में स्पष्ट उल्लेख किया गया था कि जिला कार्यकारिणी के माध्यम से एनपीईजीईएल के जिला जेंडर समन्वयक को प्रखंडों में रिक्त पड़े प्रखंड साधन सेवी के पद पर लघुकालीन संविदा के आधार पर सेवा में लिया जा सकता है. साथ ही, कार्यरत अवधि के दौरान उनके मानदेय का भुगतान जिला प्रबंधन मद से किए जाने का उल्लेख था.
अब सवाल यह है कि जब विभागीय पत्र में भुगतान की व्यवस्था स्पष्ट रूप से निर्धारित थी, तो संबंधित कर्मचारी को प्रखंड साधन सेवी के बराबर मानदेय, भत्ते और वार्षिक वृद्धि किस आधार पर दी गई. क्या इसके लिए सक्षम प्राधिकारी की स्वीकृति ली गई थी ? क्या भुगतान से संबंधित कोई अलग आदेश जारी हुआ था ? यदि ऐसा कोई आदेश है, तो उसे सार्वजनिक कर स्थिति स्पष्ट क्यों नहीं की जा रही है.
तत्कालीन एडीपीओ की भूमिका पर भी सवाल
विभागीय सूत्रों का आरोप है कि इस भुगतान प्रक्रिया में तत्कालीन एडीपीओ प्रकाश कुमार की भूमिका की भी जांच होनी चाहिए. सूत्रों के मुताबिक, उनके कार्यकाल के दौरान ही इस तरह के भुगतान की प्रक्रिया शुरू हुई थी. हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि और संबंधित अधिकारियों का पक्ष सामने आना अभी बाकी है. इसलिए पूरे मामले में दस्तावेजों के आधार पर निष्पक्ष जांच जरूरी है.
कर्मियों के वेतन पर संकट, भुगतान में कथित विशेष मेहरबानी क्यों ?
विभाग की कार्यप्रणाली पर सबसे बड़ा सवाल तब खड़ा होता है, जब एक तरफ आउटसोर्सिंग और संविदा कर्मियों को चार- चार महीने तक मानदेय नहीं मिलने की शिकायतें सामने आ रही हैं, वहीं दूसरी तरफ एक कर्मचारी को वर्षों से कथित तौर पर अतिरिक्त आर्थिक लाभ दिए जाने का आरोप लग रहा है. आखिर भुगतान की प्राथमिकता तय करने का आधार क्या है ? क्या विभाग में सभी कर्मियों के लिए एक समान व्यवस्था है या फिर कुछ लोगों के लिए अलग नियम बनाए गए हैं.
डीसी साहब, अब फाइलों की जांच जरूरी
उपायुक्त नितिश कुमार सिंह को अब इस मामले को गंभीरता से लेने की जरुरत है. इस मामले को सामान्य शिकायत समझकर फाइलों में दबाने के बजाय वर्ष 2008 से अब तक सांत्वना जेना को किए गए मानदेय भुगतान, भत्तों और वार्षिक वेतन वृद्धि का पूरा ब्योरा मंगाने की जरुरत है. 27 जनवरी 2015 के विभागीय पत्र, नियुक्ति एवं संविदा से जुड़े आदेश, जिला कार्यकारिणी की स्वीकृति, भुगतान की संचिका और तत्कालीन अधिकारियों की अनुशंसाओं की बिंदुवार जांच जरुरी है. साथ ही, तत्कालीन एडीपीओ प्रकाश कुमार सहित भुगतान प्रक्रिया से जुड़े सभी जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका भी जांच के दायरे में लाने की जरूरत है. यदि भुगतान नियमों के अनुरूप हुआ है, तो विभाग दस्तावेजों के साथ स्थिति स्पष्ट करे. और यदि नियमों की अनदेखी हुई है, तो जिम्मेदारी तय कर उचित कार्रवाई की जाए.
सवाल सिर्फ एक कर्मचारी के मानदेय का नहीं, बल्कि पूरे जिला शिक्षा विभाग की कार्यप्रणाली और सरकारी धन के इस्तेमाल की पारदर्शिता का है. आशंका है कि इस मामले की परतें खुलीं तो शिक्षा विभाग में वर्षों से चल रही भुगतान व्यवस्था से जुड़े कई चौंकाने वाले तथ्य सामने आ सकते हैं.
प्रमोद सिंह (संपादक)

