सरायकेला/ Pramod Singh प्रखंड शिक्षा कार्यालय इन दिनों शिक्षा का नहीं, “विशेष कृपा” का केंद्र बना हुआ है. यहां किताबों से ज्यादा “कनेक्शन” और नियमों से ज्यादा “रिश्ते” पढ़ाए जा रहे हैं. कहते हैं स्कूलों में शिक्षक बच्चों का भविष्य बनाते हैं, लेकिन यहां कहानी थोड़ी अलग है.

दो शिक्षक कामिनी कांत मेहता और विमल डोगरा अपने- अपने विद्यालयों में कम और प्रखंड कार्यालय में ज्यादा दिखाई देते हैं. ऐसे में सवाल उठता है कि स्कूल में बच्चे पढ़ रहे हैं या “भगवान भरोसे स्वाध्याय” कर रहे हैं.
सूत्र बताते हैं कि कार्यालय में फाइलें कम और फरमान ज्यादा चलते हैं. सुबह से शाम तक ये दोनों शिक्षक ऐसे सक्रिय रहते हैं मानो प्रखंड शिक्षा कार्यालय का संचालन इन्हीं के जिम्मे हो. अब यह स्पष्ट नहीं है कि ये शिक्षा दे रहे हैं या प्रशासन चला रहे हैं.
मजेदार बात यह है कि नियम- कायदे शायद छुट्टी पर हैं. शिकायतें भी हुईं, फाइलें भी चलीं, लेकिन कार्रवाई कहीं रास्ते में ही चाय- नाश्ते पर रुक गई लगती है. चर्चा यह भी है कि बिना “ऊपर की कृपा” के इतना प्रभाव संभव नहीं.
कुछ लोग तो मजाक में कहने लगे हैं कि सरायकेला में अब नई व्यवस्था लागू हो गई है “जहां पोस्टिंग से ज्यादा पकड़ जरूरी है.” वहीं स्कूलों की हालत ऐसी है कि बच्चे शायद अब किताबों से ज्यादा किस्मत पर भरोसा करना सीख रहे हैं.
कार्यालय के कर्मचारी भी इस नई व्यवस्था से परेशान हैं, लेकिन बोलें भी तो कैसे. यहां आवाज उठाने से ज्यादा “आवाज दबाने” की कला विकसित हो चुकी है. सबसे बड़ा नुकसान शिक्षा का हो रहा है. जिन बच्चों के लिए शिक्षक नियुक्त हैं, वे इंतजार कर रहे हैं कि शायद कभी उनके गुरुजी भी स्कूल का रास्ता याद कर लें. अब सवाल वही पुराना है- क्या इस मामले की जांच होगी या फिर यह भी फाइलों की भीड़ में खो जाएगा. फिलहाल सरायकेला में शिक्षा नहीं, “व्यवस्था का व्यंग” पढ़ाया जा रहा है.

