जमशेदपुर: छोटी- छोटी बचत से जमा की गई रकम जब वर्षों बाद भी हाथ न आए तो वह सिर्फ आर्थिक समस्या नहीं रह जाती. उसके साथ परिवार की कई योजनाएं भी अटक जाती हैं. किसी के लिए यह बेटी की शादी की जमा पूंजी है, किसी के लिए बच्चों की पढ़ाई का पैसा तो किसी बुजुर्ग के लिए जीवन भर की बचत. सहारा समूह की सहकारी समितियों में जमा रकम की वापसी को लेकर परेशान जमाकर्ताओं की कहानी भी कुछ ऐसी ही है.


जमशेदपुर में सहारा से जुड़े जमाकर्ता और कार्यकर्ता अब अपनी मांग सरकार तक पहुंचाने के लिए मेल एवं पत्राचार अभियान चला रहे हैं. अभियान से जुड़े लोगों का कहना है कि वे शांतिपूर्ण और लोकतांत्रिक तरीके से लगातार पत्र और ई-मेल भेजकर भुगतान की प्रक्रिया तेज करने तथा लंबित समस्याओं का स्थायी समाधान निकालने की मांग कर रहे हैं.
रकम अपनी, लेकिन इंतजार खत्म नहीं
जमाकर्ताओं की सबसे बड़ी परेशानी यह है कि उन्होंने अपनी जरूरतों को टालकर भविष्य के लिए पैसा जमा किया था. कई लोगों के निवेश की अवधि पूरी होने के बावजूद उन्हें अपनी पूरी राशि वापस पाने के लिए लंबी प्रक्रिया से गुजरना पड़ रहा है.

अभियान से जुड़े लोगों का दावा है कि देशभर में सहारा से जुड़े करीब 13 करोड़ जमाकर्ताओं का मुद्दा है, जबकि अकेले जमशेदपुर रीजन में 20 लाख से अधिक जमाकर्ता प्रभावित हैं.
केंद्र सरकार ने सहारा समूह की चार सहकारी समितियों के पात्र वास्तविक जमाकर्ताओं के लिए CRCS- Sahara Refund Portal बनाया है. सहकारिता मंत्रालय के अनुसार भुगतान सुप्रीम कोर्ट के आदेश के तहत SEBI- Sahara Refund Account से केंद्रीय सहकारी समितियों के रजिस्ट्रार को हस्तांतरित धन से किया जा रहा है.
पोर्टल खुला, लेकिन हर निवेशक की समस्या एक जैसी नहीं
रिफंड व्यवस्था शुरू होने के बावजूद जमाकर्ताओं की शिकायतों का एक हिस्सा दस्तावेज, दावे की पात्रता, रिकॉर्ड में अंतर और भुगतान की सीमा जैसी व्यावहारिक समस्याओं से जुड़ा रहा है. सरकार ने समय-समय पर रिफंड की सीमा बढ़ाने और त्रुटिपूर्ण दावों को दोबारा प्रस्तुत करने की सुविधा भी दी है.

यही कारण है कि सहारा का मामला केवल यह कह देने से खत्म नहीं होता कि रिफंड पोर्टल उपलब्ध है. जिन परिवारों की बड़ी रकम वर्षों की बचत से बनी है, उनके लिए सवाल यह है कि उनकी पूरी पात्र राशि कब और किस प्रक्रिया से वापस मिलेगी. आधिकारिक रिफंड आवेदन और स्थिति की जानकारी के लिए जमाकर्ता सरकारी पोर्टल का इस्तेमाल कर सकते हैं.
जमाकर्ता ही नहीं, कार्यकर्ताओं की भी अलग पीड़ा
इस पूरे प्रकरण का दूसरा पहलू सहारा से वर्षों तक जुड़े रहे कार्यकर्ताओं और एजेंटों का है. यही लोग कभी मोहल्लों, बाजारों और गांवों में जाकर छोटी बचत को निवेश से जोड़ते थे. जमाकर्ताओं और संस्था के बीच उनका सीधा संपर्क था.
अब अभियान से जुड़े कार्यकर्ताओं का कहना है कि संस्थागत गतिविधियों में आई बाधाओं के बाद बड़ी संख्या में लोगों की नियमित आय प्रभावित हुई है. कई कार्यकर्ताओं का दावा है कि उनके सामने परिवार चलाने और रोजगार का संकट खड़ा हो गया है. उनके मुताबिक जमाकर्ता उनसे अपनी रकम के बारे में पूछते हैं, जबकि भुगतान प्रक्रिया पर उनका स्वयं कोई नियंत्रण नहीं है.
कार्यकर्ताओं की यह स्थिति रिफंड मांग रहे जमाकर्ताओं से अलग है. जमाकर्ताओं की पात्र राशि की वापसी एक कानूनी और प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत हो रही है, जबकि कार्यकर्ताओं के रोजगार, बकाया या आजीविका से जुड़ी मांगों की प्रकृति अलग हो सकती है.
पत्रों में सिर्फ पैसा नहीं, वर्षों के इंतजार की बेचैनी
जमशेदपुर रीजन में चलाए जा रहे मेल और पत्राचार अभियान का उद्देश्य अब इसी इंतजार को सरकार के सामने सामूहिक रूप से रखना है. जमाकर्ता चाहते हैं कि भुगतान की प्रक्रिया सरल हो, लंबित मामलों के निपटारे की स्पष्ट व्यवस्था बने और जिन दावों में दस्तावेजी त्रुटियां हैं, उनके समाधान के लिए आसानी से उपलब्ध सहायता तंत्र हो. वहीं कार्यकर्ता अपने रोजगार और आजीविका से जुड़ी समस्याओं पर भी सरकार का ध्यान चाहते हैं.
सहारा से जुड़े लोगों के लिए यह मामला अब आंकड़ों से कहीं आगे निकल चुका है. जिन परिवारों ने भविष्य की जरूरतों के लिए अपनी आय का हिस्सा वर्षों तक बचाया, उनके लिए हर बीतता साल इंतजार को और भारी बनाता है. मेल और पत्रों के इस अभियान के पीछे सबसे बड़ी मांग यही है कि पात्र जमाकर्ताओं को उनकी रकम मिलने की प्रक्रिया निश्चित, सरल और समयबद्ध हो तथा उन्हें बार-बार अपनी ही बचत के लिए भटकना न पड़े.

