सरायकेला: नई फसल की खुशबू, गहरी आस्था और सदियों पुरानी राजपरंपरा का अनूठा संगम मंगलवार को सरायकेला में देखने को मिला. नुआखाई जंताल पूजा के अवसर पर पाऊड़ीमेड स्थित पाऊड़ी पीठ और मां झुमकेश्वरी की पारंपरिक विधि-विधान से पूजा-अर्चना की गई. सरकारी स्तर पर आयोजित इस धार्मिक अनुष्ठान में नई फसल से तैयार चावल का प्रसाद सबसे पहले मां पाऊड़ी को अर्पित किया गया. इसके बाद श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद का वितरण किया गया.


नुआखाई जंताल पूजा सरायकेला के लिए केवल धार्मिक अनुष्ठान नहीं, बल्कि यहां की प्राचीन आस्था, कृषि संस्कृति, राजपरंपरा और सामुदायिक विरासत का जीवंत प्रतीक है. नई फसल से प्राप्त अन्न को सबसे पहले मां पाऊड़ी को समर्पित करने की परंपरा लंबे समय से चली आ रही है. इस परंपरा के माध्यम से प्रकृति और अन्नदाता के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए क्षेत्र में अच्छी फसल, सुख-शांति और समृद्धि की कामना की जाती है.
पूजा के दौरान देहुरी ने पारंपरिक विधि-विधान से माता की पूजा-अर्चना कर नई फसल से तैयार प्रसाद मां की पीठ पर अर्पित किया. धार्मिक अनुष्ठान के बाद श्रद्धालुओं के बीच प्रसाद का वितरण हुआ. पूरे आयोजन के दौरान पाऊड़ी पीठ परिसर में श्रद्धा और पारंपरिक आस्था का माहौल बना रहा. सरकारी स्तर पर आयोजित इस पूजा में राजकीय छऊ कला केंद्र के निदेशक अमित कुमार ने यजमान की भूमिका निभाई और विधि-विधान के साथ माता की पूजा-अर्चना की.
राजपरिवार की आस्था का प्रमुख केंद्र है पाऊड़ी पीठ
पाऊड़ी पीठ को सरायकेला राजपरिवार की आस्था के प्रमुख केंद्रों में माना जाता है. यही कारण है कि नुआखाई जंताल पूजा के दौरान धार्मिक अनुष्ठान के साथ सरायकेला की सदियों पुरानी राजपरंपरा और सांस्कृतिक विरासत की झलक भी देखने को मिलती है. यह आयोजन नई पीढ़ी को अपनी जड़ों, परंपराओं और सांस्कृतिक पहचान से जोड़ने का महत्वपूर्ण माध्यम भी है. पूजा समारोह में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार से सम्मानित ब्रजेंद्र कुमार पटनायक एवं सुशांत महापात्र के अलावा आशीष कर, भोला महंती, संतोष कर, मनोरंजन साहू, गजेंद्र मोहंती, गणेश महंती, ठाकुर सरदार, सिद्धेश्वर दरोगा, अध्यापदो साहू और राकेश कवि सहित अन्य कलाकार एवं संस्कृति से जुड़े लोग उपस्थित रहे. नुआखाई जंताल पूजा ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि सरायकेला की पहचान केवल उसके इतिहास से नहीं, बल्कि उन जीवंत परंपराओं से भी है, जिन्हें आज भी पूरी श्रद्धा, आस्था और विधि-विधान के साथ निभाया जा रहा है.
प्रमोद सिंह (संपादक)

