जमशेदपुर/ सरायकेला: युवा उद्यमी निखार सबलोक की हत्या को आठ दिन गुजरने के बाद भी यदि पुलिस की ओर से हत्याकांड की पूरी गुत्थी सुलझाने का आधिकारिक दावा सामने नहीं आया है, तो उससे भी बड़ा सवाल इस मामले के इर्द- गिर्द चल रहा कथित ‘मीडिया ट्रायल’ बनता जा रहा है. हत्या के दूसरे दिन से ही शहर के कुछ मीडिया संस्थानों और वेबसाइटों में जिस तेजी से शूटर, साजिशकर्ता, गिरफ्तारी और अलग- अलग राज्यों में चल रही कार्रवाई से जुड़ी खबरें सामने आती रहीं, उसने हत्याकांड को सुलझाने के बजाय सूचनाओं का ऐसा जाल खड़ा कर दिया है जिसमें तथ्य, दावा और कयास के बीच की रेखा लगातार धुंधली होती दिख रही है.


सबसे गंभीर बात यह है कि जिन गिरफ्तारियों और संदिग्धों को लेकर मीडिया में बार- बार दावे सामने आए, पुलिस की आधिकारिक जानकारी उनसे मेल नहीं खाती रही. ऐसे में सवाल केवल यह नहीं है कि कौन-सी खबर सही और कौन-सी गलत निकली. बड़ा सवाल यह है कि हत्या जैसे संवेदनशील मामले में पुलिस जांच पूरी होने से पहले इतने व्यवस्थित तरीके से अलग- अलग नाम और थ्योरी आखिर किस आधार पर सार्वजनिक की जा रही हैं ?
हत्या के दूसरे दिन से शुरू हुआ ‘खुलासों’ का सिलसिला
निखार की हत्या के बाद शुरुआती दौर में जमीन विवाद समेत कई संभावनाओं की चर्चा हुई. इसके बाद अचानक कथित शूटरों की गिरफ्तारी की खबरें सामने आने लगीं. फिर साजिशकर्ता बताए जाने वाले लोगों के नाम मीडिया में उछले. कुछ रिपोर्टों में बिहार तो कुछ में कानपुर सहित दूसरे राज्यों तक जांच और संदिग्धों के तार पहुंचने के दावे किए गए. इसी बीच सोशल मीडिया पर तीसरे पक्ष की ओर से कथित रूप से वारदात की जिम्मेदारी लेने का मामला भी सामने आया. स्वाभाविक रूप से इससे जांच को लेकर भ्रम और बढ़ा.
यहां सबसे महत्वपूर्ण तथ्य यही है कि किसी व्यक्ति का नाम मीडिया या सोशल मीडिया पर सामने आना उसे अपराधी साबित नहीं करता. जब तक पुलिस साक्ष्य के आधार पर गिरफ्तारी और भूमिका की पुष्टि न करे अथवा अदालत में आरोप प्रमाणित न हों, ऐसे दावों को अंतिम निष्कर्ष के रूप में पेश करना न केवल जल्दबाजी है बल्कि वास्तविक जांच की दिशा को भी प्रभावित कर सकता है.
अशोक सिंह राघव पर संदेह की चर्चा, मगर सवाल प्रमाण का
इस हत्याकांड में अशोक सिंह राघव का नाम भी चर्चा में आया. पुलिस जांच में उस दिशा को लेकर संदेह या पड़ताल की बात सामने आई हो सकती है, लेकिन संदेह, जांच और अपराध सिद्ध होना तीन अलग- अलग अवस्थाएं हैं.
यहीं मीडिया की जिम्मेदारी सबसे अधिक महत्वपूर्ण हो जाती है. जांच के किसी एक संभावित एंगल को अंतिम कहानी बनाकर प्रस्तुत कर दिया जाए तो इससे वास्तविक अपराधियों को जांच की दिशा समझने, साक्ष्य मिटाने या स्वयं को बचाने का मौका भी मिल सकता है. इसलिए सवाल यह भी होना चाहिए कि अशोक सिंह राघव या किसी दूसरे व्यक्ति का नाम यदि जांच पूरी होने से पहले सार्वजनिक हुआ तो वह जानकारी कहां से आई ? क्या वह आधिकारिक पुलिस ब्रीफिंग का हिस्सा थी या किसी हितधारक द्वारा मीडिया में प्लांट की गई सूचना ?
अलग- अलग संस्थान, मगर खबरों का पैटर्न लगभग एक जैसा क्यों ?
हत्याकांड की रिपोर्टिंग को लेकर एक और पहलू जांच योग्य है. शहर के कुछ मुख्यधारा मीडिया संस्थानों और वेबसाइटों की रिपोर्टों में यदि घटनाक्रम, संदिग्धों और कथित पुलिस कार्रवाई को लेकर लगभग समान नैरेटिव लगातार दिखाई देता है, तो उसके स्रोत की पड़ताल पत्रकारिता के स्तर पर भी होनी चाहिए. समान रिपोर्टिंग अपने आप में किसी साजिश का प्रमाण नहीं है. संभव है कि पत्रकारों के पुलिस अथवा अन्य सूत्र समान हों. लेकिन यदि लगातार ऐसी सूचनाएं प्रकाशित हों जिन्हें बाद में पुलिस आधिकारिक तौर पर खारिज करती रहे, तो सवाल उठना स्वाभाविक है कि गलत सूचना का मूल स्रोत कौन है और बार-बार वही सूचना मीडिया तक क्यों पहुंच रही है ? यहीं ‘मीडिया मैनेजमेंट’ की आशंका जन्म लेती है. मगर बिना प्रमाण इसे स्थापित तथ्य कहना भी वही गलती होगी, जिस मीडिया ट्रायल पर सवाल उठाया जा रहा है.
क्या भ्रम का फायदा असली अपराधियों को मिल रहा है ?
हत्या की जांच में सबसे महत्वपूर्ण सवाल है- निखार की हत्या क्यों हुई, वास्तविक टार्गेट कौन था, शूटर कौन थे और हत्या की साजिश किसने रची ? यदि इन चार सवालों के आधिकारिक जवाब अभी सामने नहीं आए हैं तो मीडिया द्वारा पहले ही अपराधियों की पूरी श्रृंखला तैयार कर देना खतरनाक हो सकता है. एक दिन एक नाम, दूसरे दिन दूसरा शहर, तीसरे दिन कथित शूटर और चौथे दिन कथित साजिशकर्ता. इससे जनता के बीच ऐसा भ्रम पैदा हो सकता है कि पुलिस ने लगभग पूरा मामला सुलझा लिया है, जबकि आधिकारिक स्थिति अलग हो. और यदि कोई वास्तविक साजिशकर्ता पर्दे के पीछे है, तो क्या लगातार बदलती थ्योरी उसके लिए सुरक्षा कवच का काम कर रही है ? इस सवाल का जवाब केवल निष्पक्ष पुलिस अनुसंधान दे सकता है.
बीमारी, अस्पताल और संयोग पर भी सावधानी जरूरी
मामले से जुड़े या चर्चा में आए किसी व्यक्ति के अचानक बीमार होने अथवा अस्पताल में भर्ती होने को अपने आप अपराध से जोड़ देना भी उचित नहीं होगा. बीमारी वास्तविक भी हो सकती है. लेकिन यदि पुलिस किसी व्यक्ति से पूछताछ करना चाहती है और उसी दौरान स्वास्थ्य संबंधी परिस्थिति उत्पन्न होती है, तो पुलिस के पास चिकित्सकीय दस्तावेजों का सत्यापन करते हुए कानूनसम्मत तरीके से जांच आगे बढ़ाने का विकल्प रहता है. इसलिए बिना प्रमाण किसी बीमारी को ‘जांच से बचने की चाल’ बताना भी मीडिया ट्रायल का ही दूसरा रूप होगा.
शहर पहले भी पूछ चुका है कई अनुत्तरित सवाल
निखार सबलोक हत्याकांड को लेकर बेचैनी इसलिए भी ज्यादा है क्योंकि जमशेदपुर के अपराध इतिहास में कई चर्चित घटनाओं को लेकर आज भी आम लोगों के बीच सवाल मौजूद हैं. करणी सेना से जुड़े विनय सिंह हत्याकांड, अपराधकर्मी अनुज कनौजिया से जुड़े एनकाउंटर और युवा उद्यमी कैरव गांधी अपहरण प्रकरण जैसे मामलों को लेकर समय- समय पर सवाल उठते रहे हैं. इनके प्रत्येक मामले की कानूनी और पुलिस रिकॉर्ड की स्थिति अलग हो सकती है, इसलिए उन्हें ‘अनसुलझा’ घोषित करने के बजाय पुलिस को सार्वजनिक रूप से यह स्पष्ट करना चाहिए कि वर्तमान स्थिति क्या है. इसी तरह देहरादून में हुए विक्रम शर्मा हत्याकांड को लेकर जमशेदपुर में चर्चा बनी रही है. चूंकि वारदात दूसरे राज्य की है, इसकी जांच का सीधा दायित्व जमशेदपुर पुलिस पर नहीं डाला जा सकता. फिर भी विक्रम शर्मा के स्थानीय संबंधों के कारण शहर के लोगों और परिजनों के लिए यह जानना स्वाभाविक है कि हत्या किसने और क्यों की.
पुलिस पर भी जवाबदेही, मीडिया को भी दिखानी होगी जिम्मेदारी
निखार सबलोक हत्याकांड में सवाल केवल मीडिया से नहीं पूछे जाने चाहिए. पुलिस की भी जवाबदेही है कि आठ दिनों की जांच में कहां तक प्रगति हुई, कौन-सी बातें अफवाह हैं और किन बिंदुओं की वास्तविक जांच चल रही है, इसकी उतनी जानकारी सार्वजनिक करे जितनी अनुसंधान प्रभावित किए बिना संभव हो. दूसरी तरफ मीडिया की जिम्मेदारी है कि ‘सूत्रों’ की आड़ में किसी व्यक्ति को शूटर, साजिशकर्ता या अपराधी घोषित करने से बचे. विशेषकर तब, जब पुलिस स्वयं उन दावों की पुष्टि नहीं कर रही हो.
सबसे बड़ा सवाल- नैरेटिव कौन सेट कर रहा है ?
निखार हत्याकांड अब केवल ‘किसने गोली मारी ?’ का सवाल नहीं रह गया है. इसके साथ एक दूसरा सवाल भी जुड़ गया है- हत्या के बाद से सूचना का नैरेटिव कौन तय कर रहा है और क्यों ? यदि मीडिया में चल रही जानकारियां सही हैं तो पुलिस को साक्ष्यों के साथ स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए. यदि वे गलत हैं तो यह पता लगाया जाना चाहिए कि संवेदनशील हत्या मामले में लगातार अपुष्ट जानकारियां कौन फैला रहा है. और यदि जानबूझकर जांच को किसी खास दिशा में मोड़ने के लिए सूचनाएं प्लांट की जा रही हैं तो यह स्वयं जांच का विषय होना चाहिए. सत्ता अथवा पुलिस के ‘मैनेज’ होने की आशंका भी प्रमाण के बिना तथ्य के रूप में नहीं लिखी जा सकती. लेकिन पारदर्शिता की कमी ऐसी आशंकाओं को जन्म जरूर देती है. इसलिए पुलिस के लिए जरूरी है कि वह मीडिया में चल रहे शोर से अलग साक्ष्य, तकनीकी अनुसंधान और वैज्ञानिक जांच के आधार पर मामले को अंजाम तक पहुंचाए.
निखार सबलोक के परिवार और शहर को किसी नई कहानी की जरूरत नहीं है. उन्हें यह जानने का अधिकार है कि हत्या किसने की, क्यों की और किसके इशारे पर की. इस बार भी यदि तथ्य ‘सूत्रों’ और मीडिया ट्रायल के शोर में दब गए तो सवाल केवल पुलिस जांच पर नहीं, उस पत्रकारिता पर भी उठेगा जिसने जांच पूरी होने से पहले ही अपना फैसला सुना दिया.
संतोष कुमार

