सरायकेला: कला की कोई सीमा नहीं होती. जब कला की साधना और परंपरा पीढ़ियों को जोड़ती है, तो मंच केवल प्रस्तुति का माध्यम नहीं रहता, बल्कि सम्मान और संस्कृति के संगम का साक्षी बन जाता है. भुवनेश्वर स्थित गुरु केलुचरण महापात्र ओडिसी रिसर्च सेंटर में आयोजित साईं वननेस इंस्टीट्यूट के 13वें वार्षिक समारोह में ओडिसी और सरायकेला छऊ की कला-साधना का अद्भुत संगम देखने को मिला. समारोह में सरायकेला छऊ के वरिष्ठ संगीतज्ञ देवराज दूबे को कला के क्षेत्र में उनके महत्वपूर्ण योगदान के लिए श्री सतीश षडंगी स्मृति सम्मान से सम्मानित किया गया.


समारोह के मुख्य अतिथि जगन्नाथ पुरी के सांसद एवं भारतीय जनता पार्टी के राष्ट्रीय प्रवक्ता संबित पात्रा थे. कार्यक्रम में सत्यबादी विधानसभा क्षेत्र, पुरी के विधायक ओमप्रकाश मिश्र, उत्तर भुवनेश्वर के पूर्व विधायक प्रियदर्शी मिश्र, सामाजिक कार्यकर्ता रोजलीन पाटशानी मिश्र सहित कई गणमान्य लोग मौजूद रहे.
पिता की स्मृति को संस्था के रूप में किया जीवंत
साईं वननेस इंस्टीट्यूट की निदेशिका नीतू षडंगी ने बताया कि उनके पिता स्वर्गीय सतीश षडंगी खरसावां छऊ के सुविख्यात कलाकार थे. उनकी स्मृति को जीवंत रखने तथा बच्चों में कला के प्रति रुचि और संस्कार विकसित करने के उद्देश्य से संस्था की स्थापना की गई है.

उन्होंने कहा कि संस्था को किसी प्रकार की सरकारी अथवा गैर-सरकारी सहायता नहीं मिलती है. इसके बावजूद पिछले 13 वर्षों से कला और संस्कृति की इस यात्रा को निरंतर आगे बढ़ाने का प्रयास किया जा रहा है.
देवराज दूबे को मिला सम्मान
इसी कला-साधना के क्रम में इस वर्ष का श्री सतीश षडंगी स्मृति सम्मान सरायकेला छऊ के सुविख्यात संगीतज्ञ देवराज दूबे को प्रदान किया गया. उन्हें यह सम्मान सरायकेला छऊ के क्षेत्र में उनके महनीय योगदान के लिए दिया गया.
देवराज दूबे कला जगत के प्रतिष्ठित परिवार से आते हैं. वे पद्मश्री से सम्मानित स्वर्गीय पंडित गोपाल प्रसाद दूबे एवं स्वर्गीय सुनील कुमार दूबे के छोटे भाई हैं. वर्तमान में वे स्वर्गीय पंडित गोपाल दूबे की संस्था ‘त्रिनेत्र’ का कार्यभार संभाल रहे हैं.
संजय कर्मकार की ‘आरती’ प्रस्तुति ने बांधा समां
समारोह में कई नामचीन कलाकारों ने ओडिसी नृत्य और चित्रकला के माध्यम से अपनी कला का प्रदर्शन किया. वहीं, सरायकेला छऊ के मूर्धन्य कलाकार संजय कर्मकार ने मंच पर ‘आरती’ नृत्य की मनमोहक प्रस्तुति दी. उनकी प्रस्तुति ने दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर दिया. प्रस्तुति के बाद पूरा सभागार तालियों की गड़गड़ाहट से गूंज उठा.
भुवनेश्वर में आयोजित इस समारोह में सरायकेला छऊ की शानदार उपस्थिति ने एक बार फिर यह संदेश दिया कि कला की जड़ें स्थानीय मिट्टी में भले ही गहरी हों, लेकिन उसकी पहचान और प्रभाव की कोई सीमा नहीं होती.
प्रमोद सिंह (संपादक)

