जमशेदपुर/ सरायकेला: निखार सबलोक हत्याकांड की जांच अब केवल इस सवाल तक सीमित नहीं रह गई है कि गोली किसने चलाई, सुपारी किसने दी और हत्या की योजना कहां बनी. इस हत्याकांड के पीछे कथित आपराधिक नेटवर्क, गैंगवार, जमीन कारोबार और पुराने गिरोहों के बीच वर्चस्व की लड़ाई की परतें खुल रही हैं. इसी बीच एक और बेहद संवेदनशील सवाल उभर रहा है- क्या अपराध की दुनिया ने मीडिया और सोशल मीडिया से जुड़े कुछ लोगों को अपने प्रभाव और सुरक्षा कवच के रूप में इस्तेमाल करने की कोशिश की थी ?


सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक अशोक सिंह राघव की कॉल डिटेल और उसके संपर्कों की जांच में मीडिया से जुड़े कई लोगों के नाम चर्चा में आए हैं. सूत्र इनकी संख्या 34 तक बता रहे हैं. दावा किया जा रहा है कि पुलिस के हाथ कई संदिग्ध चैट भी लगे हैं. यहां तक कि राघव के फोन से पुलिस को महिला तथाकथित पत्रकारों के अश्लील चैटिंग और वीडीओ क्लिप भी हाथ लगे हैं. हालांकि पुलिस ने न तो इन 34 नामों की कोई आधिकारिक सूची सार्वजनिक की है और न यह कहा है कि कॉल डिटेल में किसी पत्रकार का नंबर होना अपने आप में अपराध में संलिप्तता का प्रमाण है. इसलिए सवाल उन 34 लोगों को पहले से दोषी ठहराने का नहीं, बल्कि यह पता लगाने का है कि संपर्क सामान्य पत्रकारिता के थे या किसी ने पेशे की सीमा लांघकर आपराधिक नेटवर्क के लिए भूमिका निभाई. यही अंतर इस पूरी जांच का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा हो सकता है.
विक्रम शर्मा से शुरू हुआ था ‘छवि बदलने’ का खेल ?
इस कहानी को समझने के लिए कुछ महीने पीछे जाना होगा. 13 फरवरी 2026 को देहरादून के सिल्वर सिटी मॉल के पास विक्रम शर्मा की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी. सार्वजनिक रिपोर्टों में विक्रम को जमशेदपुर का हिस्ट्रीशीटर और दुमका जेल में बंद गैंगस्टर अखिलेश सिंह का पुराना करीबी अथवा ‘गुरु’ बताया गया. बाद में देहरादून पुलिस की जांच में हत्या के पीछे गणेश सिंह गिरोह की भूमिका बताई गई और दो आरोपियों की गिरफ्तारी भी हुई. अन्य आरोपियों की तलाश अबतक जारी है. कहीं भी आधिकारिक तौर पर विक्रम शर्मा की हत्या के पीछे गणेश गिरोह की पुष्टि नहीं हुई है. जमशेदपुर पुलिस अब इस मामले को अपने तरीके से जांच करने का दावा कर रही है. विक्रम की जिंदगी के अंतिम दौर को लेकर एक अलग सवाल उठता है. अपराध की पुरानी छवि के समानांतर वह कारोबारी और सार्वजनिक चेहरा बनाने की दिशा में सक्रिय दिखाई देता था. उसके खिलाफ पुराने आपराधिक मामलों की खबरें सार्वजनिक रिकॉर्ड में मौजूद थीं. यहीं से मीडिया की भूमिका की पड़ताल जरूरी हो जाती है. यदि किसी गंभीर आपराधिक इतिहास वाले व्यक्ति को पैसे लेकर लगातार ‘समाजसेवी’ की छवि में प्रस्तुत किया गया, तो यह पत्रकारिता और विज्ञापन के बीच पारदर्शिता का प्रश्न है. बड़े- बड़े अख़बार समूहों में विक्रम शर्मा का विज्ञापन उसकी हत्या के बाद भी विज्ञापन कई सवालों को जन्म दे रहा है साथ ही इसकी जांच भी जरुरी हो चली है कि फंडिंग किस श्रोत से हुआ या होता रहा.
क्या राघव ने विक्रम के मॉडल को आगे बढ़ाया ?
निखार सबलोक हत्याकांड के बाद गिरफ्तार अशोक कुमार सिंह उर्फ राघव और विक्रम शर्मा के पुराने संबंध अब विशेष महत्व रखते हैं. एक हालिया रिपोर्ट में राघव के कथित पुलिस बयान के आधार पर बताया गया है कि वह वर्ष 2003- 04 में विक्रम शर्मा के संपर्क में आया था और उसने स्वयं अखिलेश सिंह को अपने गिरोह का सरगना बताया. उसी रिपोर्ट में उसके हाथ पर विक्रम शर्मा के नाम का टैटू होने की बात भी कही गई है. यानी विक्रम, अखिलेश और राघव के बीच पुराने संपर्क की कड़ी केवल अपराध जगत की चर्चा भर नहीं रह जाती. लेकिन इसका अर्थ यह भी नहीं कि तीनों से जुड़ा हर अपराध एक ही कमांड पर हुआ. हर वारदात में भूमिका अलग- अलग साक्ष्यों से स्थापित करनी होगी. और निखार हत्याकांड में यही सबसे बड़ा सवाल है. निखार की हत्या किसकी थी- अखिलेश की योजना या राघव की अपनी चाल ?
निखार सबलोक की हत्या के बाद पुलिस ने राघव को मुख्य साजिशकर्ता के रूप में गिरफ्तार किया है. पुलिस छह आरोपियों की गिरफ्तारी कर चुकी है और हथियार, मोबाइल तथा वारदात में इस्तेमाल कार की बरामदगी की जानकारी भी सामने आई है. लेकिन मामले ने नया मोड़ तब लिया जब राघव की ओर से कथित रूप से यह कहानी सामने आई कि निखार की हत्या अखिलेश सिंह के कहने पर कराई गई. एक प्रकाशित रिपोर्ट में राघव के कथित बयान का विस्तृत विवरण भी सामने आया है, जिसमें अखिलेश सिंह का नाम लिया गया है. मगर आरोपी का बयान और पुलिस का स्वतंत्र रूप से स्थापित निष्कर्ष दो अलग चीजें हैं.
यही वह बिंदु है जहां जांच को राघव की कहानी से आगे जाकर पूछना होगा- क्या अखिलेश सिंह की ओर से कोई आदेश आया था ? उसका इलेक्ट्रॉनिक या मानवीय साक्ष्य क्या है ? शूटरों और मध्यस्थों तक पैसा किस रास्ते पहुंचा ? फोन, व्हाट्सएप अथवा दूसरे माध्यमों से किसने किससे संपर्क किया ? और सबसे महत्वपूर्ण- हत्या से किसे तत्काल फायदा होना था ?
विक्रम की हत्या के छह महीने बाद निखार की हत्या- क्या दोनों गैंगवार की एक ही श्रृंखला ?
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि विक्रम शर्मा की हत्या की जांच में देहरादून पुलिस ने गणेश सिंह गिरोह की भूमिका बताई थी. निखार हत्याकांड की जांच में भी गैंगवार और गणेश सिंह से जुड़ी प्रतिद्वंद्विता का पहलू सामने आता रहा है. ऐसे में पुलिस के सामने स्वाभाविक सवाल होगा कि फरवरी में विक्रम की हत्या और अगस्त में निखार की हत्या क्या दो अलग- अलग वारदातें हैं या एक लंबे गैंगवार के अलग अध्याय ? इसका उत्तर अभी जांच से निकलना बाकी है.
‘1200 करोड़ के साम्राज्य’ का दावा- सबूत कहां है ?
अपराध जगत में कथित रूप से अखिलेश-विक्रम नेटवर्क की संपत्ति और कारोबार को लेकर बड़ी- बड़ी रकम की चर्चा होती रही है. सूत्रों के बीच 1200 करोड़ रुपये के कथित नेटवर्क का आंकड़ा भी उछाला जा रहा है. लेकिन इस आंकड़े की कोई पुष्ट आधिकारिक वित्तीय जांच या पुलिस दस्तावेज फिलहाल सार्वजनिक रूप से उपलब्ध नहीं है. इसलिए इसे तथ्य के रूप में प्रस्तुत करना जल्दबाजी होगी. मगर जांच के लिए प्रश्न जरूर बनता है- विक्रम की हत्या के बाद उसके कारोबार, संपत्तियों और प्रभाव वाले नेटवर्क का नियंत्रण किसके पास गया ? उसमें राघव की वास्तविक स्थिति क्या थी ? और यदि अखिलेश सिंह की रिहाई निकट होने की बात सही थी, तो उससे मौजूदा समीकरण पर क्या असर पड़ सकता था ? इन सवालों के जवाब बैंकिंग ट्रेल, संपत्ति रिकॉर्ड, बेनामी लेनदेन, कॉल रिकॉर्ड और संबंधित लोगों से पूछताछ से ही मिल सकते हैं.
राघव की CDR: पत्रकार होना अपराध नहीं, लेकिन ‘ऑपरेटर’ बनना जांच का विषय
यहीं इस कहानी में मीडिया की एंट्री होती है. यदि राघव की CDR में पत्रकारों या मीडिया संस्थानों से जुड़े लोगों के नंबर मिलते हैं तो पुलिस को बहुत सावधानी से जांच करनी होगी. एक अपराध संवाददाता का अपराधियों, पुलिस अधिकारियों, वकीलों और जेल सूत्रों से संपर्क होना पत्रकारिता का सामान्य हिस्सा भी हो सकता है. इसलिए CDR में नाम होना= अपराधी से मिलीभगत, यह समीकरण स्वीकार नहीं किया जा सकता. लेकिन तस्वीर तब बदल जाएगी यदि जांच में यह सामने आए कि किसी मीडिया कर्मी ने पैसे लेकर अपराधी की छवि बनाने, पुलिस कार्रवाई की अंदरूनी जानकारी पहुंचाने, गवाह या शिकायतकर्ता पर दबाव बनाने, जांच को प्रभावित करने, झूठी कहानी प्लांट करने या आरोपी और सिस्टम के बीच बिचौलिए की भूमिका निभाई. यदि ऐसा कोई प्रमाण सामने आता है तो वह पत्रकारिता नहीं, संभावित आपराधिक सहयोग का मामला होगा.
अस्पताल का अध्याय भी उठाता है सवाल
राघव को पूछताछ के दौरान स्वास्थ्य खराब होने के बाद अस्पताल में भर्ती कराया गया था. उसके TMH में भर्ती होने की खबर सार्वजनिक रूप से दर्ज है. बाद में उसे अस्पताल से डिस्चार्ज कर न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया. इस दौरान अस्पताल से उसका कथित बयान अथवा इंटरव्यू सामने आने ने मामले को और संवेदनशील बना दिया. यहां भी जांच योग्य प्रश्न है- गंभीर हत्याकांड में पुलिस की निगरानी में मौजूद आरोपी तक मीडिया की पहुंच कैसे हुई ? क्या वह औपचारिक और अधिकृत इंटरव्यू था ? यदि नहीं, तो संपर्क किसने कराया ? क्या उसके माध्यम से किसी खास नैरेटिव को सार्वजनिक करने की कोशिश हुई ? इन प्रश्नों का उत्तर रिकॉर्ड से निकलना चाहिए, अनुमान से नहीं.
पुलिस और प्रशासन भी सवालों से बाहर नहीं
यदि जांच में यह सामने आता है कि अपराध से जुड़े लोग वर्षों से मीडिया, कारोबार और दूसरे सार्वजनिक मंचों के सहारे अपना प्रभाव बढ़ा रहे थे तो सवाल केवल पत्रकारों पर नहीं रुकेगा. पुलिस का खुफिया तंत्र क्या जानकारी जुटा रहा था ? पुराने हिस्ट्रीशीटरों और उनके सक्रिय नेटवर्क की निगरानी किस स्तर पर थी ? अपराध से अर्जित संपत्ति और कारोबार की वित्तीय जांच हुई या नहीं ? और यदि किसी संगठित गिरोह ने प्रभावशाली लोगों का नेटवर्क तैयार किया तो स्थानीय सिस्टम को इसकी भनक कब लगी ? क्राइम इन्वेस्टिगेशन तभी निष्पक्ष कहलाएगा जब जांच का दायरा अपराधी से लेकर उसके आर्थिक, संस्थागत और प्रभाव वाले नेटवर्क तक समान रूप से पहुंचे.
तीन आरोपियों का रिमांड खोल सकता है सबसे महत्वपूर्ण कड़ी
निखार हत्याकांड में गिरफ्तार रितेश सिंह, सुनील रजक और अंकित सिंह को पुलिस रिमांड पर लेकर पूछताछ आगे बढ़ा रही है. यह पूछताछ मामले के लिए बेहद महत्वपूर्ण हो सकती है. अब पुलिस को शूटर और हथियार से आगे बढ़कर कमांड चेन खोजनी होगी. हत्या का अंतिम आदेश किसने दिया ? पैसा किसने दिया ? किसने रेकी कराई ? किसने शूटर उपलब्ध कराए ? निखार के बाद अगला निशाना कौन था ? और अखिलेश सिंह का नाम जांच से निकल रहा है या केवल राघव के बयान से ?यही प्रश्न तय करेंगे कि राघव किसी और का आदेश मान रहा था या स्वयं कोई बड़ा खेल खेल रहा था.
अभिमन्यु और शिबू से जुड़ी कड़ी भी महत्वपूर्ण
अभिमन्यु उर्फ सिंटू सिंह को लेकर गिरफ्तारी की सूचना सामने आने की बात कही जा रही है, जबकि शिबू की तलाश जारी रहने की सूचना है. इस स्तर पर पुलिस की आधिकारिक पुष्टि और आगे की कानूनी कार्रवाई महत्वपूर्ण होगी. विशेष रूप से शूटर और मध्यस्थों की पूछताछ से यह स्थापित हो सकता है कि आदेश की श्रृंखला कहां जाकर खत्म होती है. पुलिस सूत्र बताते हैं कि अभिमन्यु से पूछताछ में कई अहम जानकारी हाथ लगे हैं. प्रारंभिक तौर पर राघव ही मास्टर माइंड है इसमें अखिलेश सिंह का नाम फिलहाल सामने नहीं आया है. हालांकि इसपर पुलिस के आधिकारिक पुष्टि का इंतजार है.
इस जांच का सबसे विस्फोटक हिस्सा वे कथित 34 मीडिया नाम हो सकते हैं जिनकी चर्चा राघव की कॉल डिटेल को लेकर हो रही है. पहले पुलिस जांच यह स्थापित करे कि इनमें कौन केवल पेशेगत संपर्क में था और कौन, कथित नेटवर्क का सक्रिय हिस्सा है. यदि जांच में लेनदेन, कॉल पैटर्न, संदेश, बिचौलिये की भूमिका या जांच प्रभावित करने का प्रमाण मिलता है, तब नाम सामने आने चाहिए. और यदि प्रमाण नहीं मिलता तो किसी पत्रकार की प्रतिष्ठा को केवल फोन कॉल के आधार पर कठघरे में खड़ा नहीं किया जाना चाहिए. यही कसौटी पुलिस पर भी लागू होनी चाहिए और मीडिया पर भी. निखार सबलोक हत्याकांड इसलिए अब एक हत्या की कहानी से बड़ा होता जा रहा है. इसके एक सिरे पर निखार है, दूसरे पर राघव. पीछे विक्रम शर्मा की हत्या और अखिलेश सिंह का पुराना नेटवर्क है. बीच में जमीन, पैसा, गैंगवार और प्रभाव की दुनिया है.
और अब सवाल मीडिया तक पहुंच रहा है
क्या अपराधियों ने बंदूक के साथ कलम और कैमरे को भी अपना हथियार बनाने की कोशिश की ? यदि हां, तो उन चेहरों का पर्दाफाश होना चाहिए. मगर वह पर्दाफाश CDR में नंबर देखकर नहीं, साक्ष्य के आधार पर होना चाहिए. क्योंकि इस जांच में जितना जरूरी अपराध की सल्तनत का सच सामने आना है, उतना ही जरूरी पत्रकारिता और पुलिस जांच की विश्वसनीयता बचाए रखना भी है.

