सरायकेला: कांड्रा थाना क्षेत्र के सुदूरवर्ती हुदू पंचायत के तुमसा गांव में जमीन विवाद को लेकर सोमवार को दिनभर चला हाईवोल्टेज ड्रामा देर शाम करीब सात बजे ग्रामसभा के फैसले के बाद समाप्त हो गया. शुरुआत एक परिवार के सदस्यों को बंधक बनाकर मारपीट किए जाने की सूचना से हुई थी, लेकिन पुलिस-प्रशासन के मौके पर पहुंचने और ग्रामीणों का पक्ष सामने आने के बाद घटनाक्रम ने नया मोड़ ले लिया. अंततः पारंपरिक ग्रामसभा ने जमीन पर यथास्थिति बनाए रखने का फैसला सुनाया. तीन सदस्यों भृगु राम सरदार, जटल सरदार और हबलू सरदार पर मामूली आर्थिक दंड लगाने के बाद उन्हें पुलिस के हवाले कर दिया गया. इस पूरे घटनाक्रम के दौरान इंडिया न्यूज वायरल बिहार-झारखंड के रिपोर्टर विपिन वार्ष्णेय को भी ग्रामीणों ने कुछ समय तक रोककर रखा, जिन्हें बाद में पुलिस के हस्तक्षेप के बाद जाने दिया गया.


‘परिवार को बंधक बनाया गया है’, इस सूचना से शुरू हुआ घटनाक्रम
मामले की शुरुआत जिला परिषद सदस्य लक्ष्मी सरदार द्वारा पुलिस और मीडिया को दी गई सूचना से हुई. बताया गया कि ऊपरबेड़ा निवासी कार्तिक सरदार, उसके पिता भृगु राम सरदार, बड़े पिता जटल सरदार, चचेरे भाई हबलू सरदार और मां करुणा सरदारिन को रविवार दोपहर से तुमसा सरकारी स्कूल मैदान में ग्रामीणों ने बंधक बना रखा है और उनके साथ मारपीट की जा रही है. सूचना गंभीर थी. सोमवार को कांड्रा थाना पुलिस गांव पहुंची. उनके साथ कवरेज के लिए इंडिया न्यूज वायरल बिहार-झारखंड के रिपोर्टर विपिन वार्ष्णेय भी पहुंचे.
मगर गांव पहुंचते ही घटनाक्रम पलट गया
ग्रामीण पुलिस और पत्रकार की मौजूदगी से नाराज हो गए और उन्हें घेर लिया. ग्रामीणों का कहना था कि जिस घटनाक्रम को ‘बंधक बनाने’ के रूप में प्रस्तुत किया जा रहा है, वास्तविकता उससे अलग है. वे कार्तिक सरदार को मौके पर बुलाने और ग्रामसभा में उसका पक्ष रखने की मांग पर अड़ गए.
मामला गंभीर हुआ तो एसपी ने भेजा अतिरिक्त बल
हालात की गंभीरता की जानकारी पुलिस अधीक्षक मनोज स्वर्गीयारी को दी गई. उनके निर्देश पर अनुमंडल पुलिस पदाधिकारी अनुभव भारद्वाज के नेतृत्व में अतिरिक्त पुलिस बल तुमसा भेजा गया. टीम में मुख्यालय डीएसपी, इंस्पेक्टर राजेश कुमार, ट्रैफिक इंस्पेक्टर राजू, सब इंस्पेक्टर सोनू कुमार, सुनील कुमार सिंह, हीरालाल, बृजभूषण पांडे समेत अन्य पुलिसकर्मी शामिल थे. प्रशासन की ओर से अंचल अधिकारी प्रवीण कुमार भी दलबल के साथ मौके पर पहुंचे. इतनी बड़ी संख्या में पुलिस और प्रशासनिक अधिकारियों को देखकर ग्रामीण बाहरी हस्तक्षेप को लेकर और नाराज हो गए. हालांकि पुलिस ने संयम बरता और बातचीत का रास्ता अपनाया. इसी दौरान पुलिस के हस्तक्षेप के बाद ग्रामीणों ने पत्रकार विपिन वार्ष्णेय को जाने दिया.
आखिर ग्रामीण इतने नाराज क्यों थे ?
इसके बाद विवाद की दूसरी कहानी सामने आई. ग्रामीणों के अनुसार मामला अचानक पैदा नहीं हुआ, बल्कि जमीन के स्वामित्व और उपयोग को लेकर ऊपरबेड़ा के भूमिज परिवार तथा तुमसा के संथाल समुदाय के कुछ ग्रामीणों के बीच कई वर्षों से विवाद चला आ रहा है. ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि कार्तिक सरदार और उसके परिवार की ओर से अलग- अलग जमीनों पर अपना दावा किया जाता रहा है और विरोध करने पर पुलिस कार्रवाई का भय दिखाया जाता है. ग्रामीणों ने यह भी आरोप लगाया कि उन्हें गांव के तालाब के इस्तेमाल से रोका जाता है और विभिन्न मामलों में पुलिस शिकायतों के जरिए परेशान किया जाता रहा है. ये ग्रामीणों के आरोप हैं, जिनकी स्वतंत्र या आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है.
रविवार को इसी विवाद को लेकर बुलाई गई थी ग्रामसभा
ग्रामीणों के मुताबिक लंबे समय से चले आ रहे इसी विवाद को सुलझाने के लिए रविवार को ग्रामसभा बुलाई गई थी. इसमें कार्तिक सरदार और उसके परिवार को विवादित जमीन से संबंधित दस्तावेज लेकर उपस्थित होने के लिए कहा गया था. ग्रामीणों का कहना है कि कार्तिक सभा में नहीं पहुंचा. इसके बाद आक्रोशित ग्रामीण उसके पिता भृगु राम सरदार, बड़े पिता जटल सरदार, उनके पुत्र हबलू सरदार और कार्तिक की मां करुणा सरदारिन को ग्रामसभा में ले आए.
यहीं से दोनों पक्षों की कहानी अलग हो जाती है
कार्तिक सरदार की ओर से आरोप लगाया गया कि उसके परिजनों को जबरन बंधक बनाकर रखा गया और मारपीट की गई. दूसरी तरफ ग्रामीणों का कहना था कि उन्हें जमीन विवाद पर निर्णय के लिए ग्रामसभा में बैठाया गया था. कार्तिक इस दौरान गम्हरिया स्थित अपने ससुराल पहुंच गया और उसने जिला परिषद सदस्य लक्ष्मी सरदार तथा पुलिस को अपने परिजनों को बंधक बनाए जाने की सूचना दी.
ग्रामीणों की जिद- पहले कार्तिक को बुलाइए
सोमवार को पुलिस-प्रशासन की मौजूदगी में कई दौर की बातचीत हुई, लेकिन ग्रामीण कार्तिक सरदार को मौके पर बुलाने की मांग पर अड़े रहे. ग्रामीणों की नाराजगी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि ग्रामसभा की प्रक्रिया से स्थानीय मुखिया सुगी मुर्मू को भी दूर रखा गया. इसी बीच झारखंड मुक्ति मोर्चा केंद्रीय कार्यसमिति सदस्य कृष्णा बास्के और भाजपा नेता राम हांसदा भी मौके पर पहुंचे. दोनों नेताओं ने ग्रामीणों से बातचीत की और मामले को शांतिपूर्ण तरीके से सुलझाने की अपील की. इसके बाद ग्रामसभा की बैठक संभव हो सकी.
माझी बाबा और ग्राम प्रधान की मौजूदगी में हुआ फैसला
पारंपरिक माझी बाबा बिशुन मुर्मू और ग्राम प्रधान रामेश्वर किस्कू की मौजूदगी में ग्रामसभा हुई. दोनों पक्षों के जमीन विवाद को देखते हुए लिखित रूप से तय किया गया कि जिस जमीन पर जिसका वर्तमान कब्जा है, वहां फिलहाल यथास्थिति बरकरार रहेगी और दूसरे पक्ष की जमीन पर जबरन कब्जा नहीं किया जाएगा. इसके साथ ही ग्रामीणों को परेशान करने और ग्रामसभा से जुड़े घटनाक्रम को कथित तौर पर गलत तरीके से प्रस्तुत करने को लेकर आर्थिक दंड लगाने का निर्णय लिया गया. दंड की राशि जमा किए जाने के बाद गतिरोध समाप्त हुआ. ग्रामसभा ने भृगु राम सरदार, जटल सरदार और हबलू सरदार को पुलिस के हवाले कर दिया. इसके बाद पुलिस-प्रशासन ने राहत की सांस ली.
अफीम की खेती और पुराने मुकदमों को लेकर भी ग्रामीणों के गंभीर आरोप
घटनाक्रम के दौरान ग्रामीणों ने कार्तिक सरदार को लेकर कई पुराने आरोप भी लगाए. ग्रामीणों का दावा है कि पूर्व में यह इलाका अफीम की अवैध खेती को लेकर चर्चा में रहा है और कार्तिक पुलिस से संपर्क का प्रभाव दिखाकर ग्रामीणों को विभिन्न मामलों में फंसाने की धमकी देता रहा है. स्थानीय मुखिया के परिवार को भी अफीम की खेती से जुड़े मामले में फंसाने का आरोप ग्रामीणों ने लगाया. ग्रामीणों ने यहां तक आरोप लगाया कि कार्तिक अपने समाज के लोगों के साथ भी जमीन को लेकर विवाद करता रहा है और अपने ही वंशजों की जमीन पर दावा करने के लिए अलग-अलग हथकंडे अपनाता रहा है. इन गंभीर आरोपों को फिलहाल ग्रामीणों के दावे के रूप में ही देखा जाना चाहिए. पुलिस जांच अथवा सक्षम प्राधिकार की पुष्टि के बिना इन्हें स्थापित तथ्य नहीं माना जा सकता.
वर्षों पुराना विवाद, लेकिन समाधान क्यों नहीं हुआ ?
दिनभर के घटनाक्रम के बाद एक बड़ा सवाल स्थानीय पुलिस और प्रशासन की भूमिका को लेकर भी सामने आया. यदि ऊपरबेड़ा और तुमसा के ग्रामीणों के बीच जमीन का विवाद वर्षों से चला आ रहा था, दोनों पक्ष एक-दूसरे के खिलाफ शिकायतें करते रहे थे और मामला पुलिस-अंचल तक पहुंचता रहा था, तो इसका समय रहते संस्थागत समाधान क्यों नहीं कराया गया ? ग्रामीणों का आरोप है कि पूर्व के थाना प्रभारियों ने भी विवाद को गंभीरता से नहीं लिया. सोमवार को हालात इतने बिगड़े कि जमशेदपुर से अतिरिक्त पुलिस बल बुलाना पड़ा और एसडीपीओ, डीएसपी, इंस्पेक्टर से लेकर अंचल अधिकारी तक को गांव पहुंचना पड़ा. समय रहते जमीन के दस्तावेजों की जांच, सीमांकन और दोनों पक्षों के बीच प्रशासनिक स्तर पर समाधान कराया गया होता तो शायद सोमवार जैसी स्थिति से बचा जा सकता था.
लक्ष्मी सरदार का इंतजार करते रहे ग्रामीण
इस पूरे घटनाक्रम के दौरान जिला परिषद सदस्य लक्ष्मी सरदार को लेकर भी ग्रामीणों में नाराजगी देखी गई. ग्रामीणों का कहना था कि प्रारंभिक सूचना उनकी ओर से पुलिस और मीडिया तक पहुंची थी, इसलिए वे चाहते थे कि लक्ष्मी सरदार स्वयं मौके पर आएं और ग्रामीणों का पक्ष भी सुनें. ग्रामीण दिनभर उनका इंतजार करते रहे, लेकिन उनके मौके पर नहीं पहुंचने से नाराजगी बनी रही.
एक सूचना से दिनभर हलकान रहा पूरा प्रशासनिक अमला
रविवार को ग्रामसभा से शुरू हुआ जमीन विवाद सोमवार को पुलिस, प्रशासन, मीडिया और राजनीतिक प्रतिनिधियों की मौजूदगी वाले बड़े घटनाक्रम में तब्दील हो गया. एक समय स्थिति इतनी तनावपूर्ण हो गई कि किसी अप्रिय घटना की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता था. राहत की बात यह रही कि पुलिस ने बल प्रयोग के बजाय संवाद का रास्ता अपनाया और झामुमो नेता कृष्णा बास्के तथा भाजपा नेता राम हांसदा की पहल के बाद पारंपरिक ग्रामसभा के माध्यम से तत्काल गतिरोध समाप्त हो गया.
लेकिन विवाद की जड़ अभी समाप्त नहीं हुई है
ऊपरबेड़ा और तुमसा के बीच वर्षों पुराने जमीन विवाद का स्थायी समाधान जमीन के वैध दस्तावेजों, सरकारी अभिलेखों और विधिसम्मत सीमांकन से ही संभव होगा. ग्रामसभा के सोमवार के फैसले ने फिलहाल टकराव टाल दिया है, मगर अब जिम्मेदारी पुलिस और अंचल प्रशासन की है कि आरोप- प्रत्यारोप से आगे बढ़कर जमीन की वास्तविक स्थिति स्पष्ट करे. वरना वर्षों से सुलग रहा यह विवाद दोबारा कभी भी कानून-व्यवस्था के लिए बड़ी चुनौती बन सकता है.

