सरायकेला: सावधान… खतरा अभी टला नहीं है. कांड्रा थाना क्षेत्र के तुमसा गांव में रविवार से सोमवार तक जो घटनाक्रम सामने आया, उसे महज जमीन विवाद या ग्रामसभा का आंतरिक मामला मानकर फाइल बंद करना भविष्य के लिए खतरनाक हो सकता है. एक परिवार को कथित तौर पर रातभर बंधक रखना, सैकड़ों लोगों का पारंपरिक हथियारों के साथ घेराव और पुलिस के पहुंचने के बाद भी तनाव खत्म न होना बताता है कि विवाद जमीन के एक टुकड़े से कहीं आगे निकल चुका है.


सबसे चिंताजनक आरोप यह है कि मौके पर मौजूद भीड़ के बीच से पुलिस को कथित तौर पर यह तक कहा गया कि अंधेरा होने पर हथियार छीन लिए जाएंगे. यदि पुलिस जांच में यह बात पुष्ट होती है तो इसे सामान्य ग्रामीण आक्रोश मानना बड़ी भूल होगी. यह कानून के अधिकार को खुली चुनौती है.
विवाद की जड़ में जमीन, दावे दोनों तरफ
हुदू पंचायत के ऊपरबेड़ा निवासी कार्तिक सरदार भूमिज समुदाय से आते हैं. उनका दावा है कि तुमसा में उनके पुरखों की जमीन पर कब्जा किया जा रहा है और सरकारी रिकॉर्ड आज भी उनके परिवार के नाम है. दूसरी ओर संथाल समुदाय के ग्रामीणों का दावा है कि उनके पूर्वजों ने वर्षों पहले भूमिज परिवार से आपसी लिखा- पढ़ी अथवा मौखिक समझौते के आधार पर जमीन ली थी और तभी से उसे जोत-आबाद करते आ रहे हैं.

यही वह बिंदु है जहां प्रशासन की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण हो जाती है. कौन सही है और कौन गलत, इसका फैसला भीड़ की संख्या से नहीं बल्कि खतियान, रजिस्टर-II, लगान, कब्जे के इतिहास, कथित पुराने दस्तावेज और संबंधित भूमि कानूनों की जांच से होना चाहिए.
ग्रामसभा शक्तिशाली है, लेकिन संविधान से ऊपर नहीं
झारखंड के अनुसूचित क्षेत्रों में ग्रामसभा को विशेष संवैधानिक और कानूनी संरक्षण प्राप्त है. पांचवीं अनुसूची और PESA व्यवस्था का उद्देश्य आदिवासी समाज की परंपरा, संस्कृति, सामुदायिक संसाधनों और स्वशासन की रक्षा करना है. झारखंड पंचायत राज अधिनियम भी अनुसूचित क्षेत्रों में ग्रामसभा को परंपरागत तरीके से विवाद समाधान और भूमि, जल तथा जंगल जैसे प्राकृतिक संसाधनों के प्रबंधन की भूमिका देता है. लेकिन अधिनियम में यह शर्त भी स्पष्ट है कि ऐसी परंपरागत व्यवस्था संविधान और लागू कानूनों के विपरीत नहीं हो सकती.

इसलिए ग्रामसभा की शक्ति को किसी व्यक्ति को रातभर बंधक रखने, उसकी स्वतंत्रता छीनने अथवा आर्थिक दंड और वस्तु देकर ‘जमानत’ लेने की स्वतः कानूनी शक्ति मान लेना उचित नहीं होगा. यदि किसी जमीन के स्वामित्व अथवा हस्तांतरण पर विवाद है तो उसका अंतिम कानूनी समाधान सक्षम राजस्व अथवा न्यायिक प्रक्रिया से ही निकलेगा. राज्य का राजस्व विभाग भी भूमि के शांतिपूर्ण उपयोग की रक्षा और उसमें अवरोध करने वालों के विरुद्ध कार्रवाई को अपने उद्देश्यों में शामिल करता है.
मौखिक दावे से जमीन का मालिक कौन, प्रशासन तय करे
यहीं प्रशासन को तत्काल हस्तक्षेप करना चाहिए. एक पक्ष के पास सरकारी रिकॉर्ड होने का दावा है और दूसरा पीढ़ियों से कब्जे एवं पुराने समझौते का दावा कर रहा है. दोनों दावों की निष्पक्ष जांच जरूरी है. अनुसूचित क्षेत्र में भूमि संरक्षण के विशेष प्रावधानों का अर्थ यह भी है कि जमीन के हस्तांतरण को सामान्य निजी लेन-देन की तरह नहीं देखा जा सकता. पांचवीं अनुसूची अनुसूचित क्षेत्रों के प्रशासन के लिए विशेष संवैधानिक व्यवस्था देती है. इसलिए सवाल यह भी जांच का विषय होना चाहिए कि कथित पुराना हस्तांतरण हुआ था तो उसका स्वरूप क्या था, वह उस समय लागू भूमि कानूनों के अनुरूप था या नहीं और वर्तमान राजस्व अभिलेख किसके पक्ष में हैं.
रविवार की ग्रामसभा से सोमवार के टकराव तक
कार्तिक सरदार का आरोप है कि रविवार की ग्रामसभा में उसके नहीं पहुंचने के बाद उसके माता-पिता, बड़े पिता और भाई को रोक लिया गया. ग्रामीणों का पक्ष बताया जा रहा है कि कार्तिक को दस्तावेज लेकर ग्रामसभा में आना था. आरोप है कि चारों को रातभर तुमसा सरकारी स्कूल मैदान के समीप बरगद के नीचे बने चौपाल में रखा गया और बड़ी संख्या में ग्रामीण वहां मौजूद रहे. सोमवार को सूचना मिलने के बाद पुलिस गांव पहुंची, लेकिन स्थिति इतनी तनावपूर्ण हो गई कि बड़ी संख्या में पुलिस अधिकारियों और जवानों की मौजूदगी के बावजूद तत्काल समाधान नहीं निकल सका. यहां तक कि मिडियाकर्मी को भी कैमरा चलाने पर आंतरिक मामला बताकर तस्वीर लेने से रोक दिया गया. अंचल अधिकारी गम्हरिया के सरकारी अंगरक्षक द्वारा तस्वीर लेने पर भी ग्रामीण उग्र हो गए और जमकर बवाल काटा. किसी तरह देर शाम आर्थिक दंड का कथित फरमान और अगले दिन एक व्यक्ति द्वारा खस्सी देकर मुक्त होने की बात भी सामने आई है. इन सभी आरोपों की प्रशासनिक जांच आवश्यक है.
इसे संथाल बनाम भूमिज बनने से पहले रोकना होगा
सबसे महत्वपूर्ण जिम्मेदारी प्रशासन की अब शुरू होती है. इसे दो आदिवासी समुदायों के बीच संघर्ष का रूप लेने देना बेहद खतरनाक होगा. किसी पूरे समुदाय को घटना के लिए जिम्मेदार ठहराना भी गलत होगा. विवाद कुछ व्यक्तियों और जमीन के दावों से जुड़ा है, इसलिए कार्रवाई भी व्यक्ति और साक्ष्य आधारित होनी चाहिए. प्रशासन को तत्काल विवादित भूमि की राजस्व जांच, दोनों पक्षों के दस्तावेजों का सत्यापन, कथित बंधक बनाए जाने और धमकी की अलग पुलिस जांच तथा गांव में शांति व्यवस्था सुनिश्चित करनी चाहिए. साथ ही यह भी पता लगाया जाना चाहिए कि क्या पर्दे के पीछे कोई व्यक्ति या समूह विवाद को भड़का रहा है. क्योंकि सोमवार को पुलिस की मौजूदगी में जो तनाव दिखाई दिया, वह एक चेतावनी है.
ग्रामसभा का सम्मान जरूरी है. आदिवासी स्वशासन की रक्षा भी जरूरी है. लेकिन ग्रामसभा और संविधान को आमने- सामने खड़ा करना दोनों के साथ अन्याय होगा. तुमसा में फिलहाल भीड़ छंट गई है, लोग घर लौट गए हैं. लेकिन जमीन का मूल विवाद वहीं है. यदि प्रशासन ने अभी दस्तावेज, कानून और संवाद के जरिए स्थायी समाधान नहीं निकाला तो अगली बार विवाद केवल एक परिवार को बंधक बनाने तक सीमित रहे, इसकी कोई गारंटी नहीं है.
संतोष कुमार
प्रधान संपादक

