चाईबासा: मिट्टी की खुशबू, तेजी से घूमता चाक और कुम्हार के हाथों में धीरे-धीरे आकार लेता दीपक. दीपावली से पहले सोनुआ में स्कूली बच्चों को किताबों से अलग एक ऐसी पाठशाला मिली, जहां पाठ्यक्रम नहीं बल्कि परंपरा, संस्कृति और हुनर का पाठ पढ़ाया गया. सोनुआ मॉडल स्कूल के बच्चे स्थानीय कुम्हार बस्ती पहुंचे और मिट्टी के दीये बनाने की सदियों पुरानी कला को करीब से जाना.


कुम्हारों ने बच्चों को बताया कि मिट्टी का एक दीया तैयार करने में कितनी मेहनत और धैर्य लगता है. मिट्टी तैयार करने से लेकर उसे चाक पर आकार देने, सुखाने और फिर पकाने तक की पूरी प्रक्रिया बच्चों को समझाई गई.

सबसे दिलचस्प पल तब आया जब बच्चों ने खुद चाक पर हाथ आजमाया. कई बच्चों ने कुम्हारों के मार्गदर्शन में मिट्टी को आकार देकर दीया बनाने की कोशिश की. उनके लिए यह अनुभव किसी जीवंत पाठशाला से कम नहीं था. बच्चों ने उत्सुकता के साथ न केवल कुम्हारों की कला देखी, बल्कि यह भी समझा कि दीपावली में जलने वाले एक छोटे से मिट्टी के दीये के पीछे एक कारीगर की कितनी मेहनत छिपी होती है.
दीपावली कुम्हारों के लिए उम्मीद और रोजगार का पर्व
बाजार में रंग-बिरंगी इलेक्ट्रॉनिक लाइटों और आधुनिक सजावटी सामान की भरमार के बावजूद मिट्टी के दीयों का सांस्कृतिक महत्व आज भी कायम है. दीपावली का समय कुम्हार परिवारों के लिए केवल त्योहार नहीं, बल्कि रोजगार और बेहतर आमदनी की उम्मीद भी लेकर आता है.
ऐसे में स्थानीय कुम्हारों से मिट्टी के दीये खरीदना पारंपरिक कारीगरों की कला और आजीविका को प्रोत्साहित करने का माध्यम भी बन सकता है.
सोनुआ मॉडल स्कूल के बच्चों की कुम्हार बस्ती की यह यात्रा एक संदेश भी छोड़ गई कि नई पीढ़ी को अपनी लोककला और परंपराओं से जोड़ने के लिए उन्हें केवल किताबों में पढ़ाना पर्याप्त नहीं, बल्कि उस कला को करीब से देखने, समझने और अनुभव करने का अवसर देना भी जरूरी है.
रिपोर्ट: जयंत प्रमाणिक

