जामताड़ा: महाविद्यालय में सेमेस्टर-7 की परीक्षा के दौरान शैक्षणिक व्यवस्था और परीक्षा की पारदर्शिता को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो रहे हैं. छात्रों का आरोप है कि महाविद्यालय में न तो उन्हें निर्धारित पाठ्यक्रम की पुस्तकें उपलब्ध कराई गईं और न ही समय पर पूरा कोर्स पढ़ाया गया. ऐसे में परीक्षा की तैयारी को लेकर विद्यार्थियों के सामने असमंजस की स्थिति बनी हुई है.


इसी बीच कुछ छात्रों की कथित बातचीत से एक और चौंकाने वाली बात सामने आई है. चर्चा है कि पीडीएफ फाइलों की मदद से GPT के माध्यम से प्रश्नोत्तर तैयार किए जा रहे हैं और उन्हें बेहद छोटे अक्षरों में प्रिंट कराया जा रहा है. आरोप है कि इन प्रिंटआउट का इस्तेमाल परीक्षा के दौरान अनुचित तरीके से किया जा सकता है. हालांकि, इस कथित तैयारी और परीक्षा में इसके इस्तेमाल की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है.

छात्रों की बातचीत में परीक्षा को लेकर एक बेपरवाही भरा जवाब भी सुनाई दिया- ‘हम परीक्षा में बैठेंगे तो लिखेंगे क्या.’ यह कथन महाविद्यालय की शैक्षणिक व्यवस्था पर सवाल खड़ा करता है. आखिर जब पाठ्यक्रम पूरा कराने और विद्यार्थियों को पढ़ाई के लिए आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराने की जिम्मेदारी महाविद्यालय की है, तो इसकी कमी का खामियाजा विद्यार्थियों को क्यों भुगतना पड़े?
सवाल पूछने पर प्रशासन ने जताई अनभिज्ञता
मामले को लेकर इंडिया न्यूज वायरल बिहार-झारखंड के पत्रकार ने परीक्षा केंद्र पर पहुंचकर परीक्षा नियंत्रक डॉ. एसएन बंद्योपाध्याय से छात्रों के बीच हो रही बातचीत और छोटे अक्षरों में तैयार किए जा रहे प्रिंटआउट के संबंध में सवाल किया. इस पर परीक्षा नियंत्रक ने ऐसी किसी गतिविधि की जानकारी होने से इनकार किया. वहीं, महाविद्यालय के प्राचार्य कौशल कुमार ने भी कॉलेज में कदाचार होने की बात से इनकार किया.
हालांकि, जब पत्रकार ने परीक्षा नियंत्रक को छात्रों के बीच हुई कथित बातचीत से अवगत कराया, तो उन्होंने सख्त रुख अपनाते हुए पत्रकार से ही सवाल किया कि प्राचार्य की अनुमति के बिना महाविद्यालय परिसर में प्रवेश कैसे किया गया? इस दौरान पत्रकार का नाम और मोबाइल नंबर भी नोट किया जाने लगा. कुछ देर बाद परीक्षा नियंत्रक का रुख हालांकि नरम पड़ गया.
अब उठ रहे हैं ये चुभते सवाल
* जब सेमेस्टर-7 का पाठ्यक्रम समय पर पूरा नहीं कराया गया, तो इसकी जवाबदेही किसकी है?
* विद्यार्थियों को निर्धारित पाठ्यक्रम की पुस्तकें उपलब्ध कराना महाविद्यालय की जिम्मेदारी नहीं है?
* क्या परीक्षा से पहले विद्यार्थियों की शैक्षणिक समस्याओं को लेकर कोई समीक्षा की गई?
* GPT के माध्यम से तैयार छोटे अक्षरों वाले प्रश्नोत्तर प्रिंटआउट की चर्चा है, तो परीक्षा केंद्र की निगरानी व्यवस्था कितनी प्रभावी है?
* परीक्षा नियंत्रक और प्राचार्य को ऐसी कथित गतिविधियों की जानकारी क्यों नहीं मिली?
* पत्रकार के सवालों का जवाब देने के बजाय उसके प्रवेश और पहचान पर सवाल उठाना क्या मूल मुद्दे से ध्यान भटकाने जैसा नहीं है?
* यदि परीक्षा व्यवस्था पूरी तरह पारदर्शी है, तो छात्रों की शिकायतों की निष्पक्ष जांच कराने में क्या परेशानी है?
सवाल सिर्फ नकल का नहीं, जवाबदेही का भी
यह पूरा मामला केवल परीक्षा में संभावित नकल तक सीमित नहीं है, बल्कि महाविद्यालय की शैक्षणिक जिम्मेदारी और प्रशासनिक निगरानी पर भी सवाल खड़ा करता है. यदि विद्यार्थियों को समय पर किताबें नहीं मिलीं और पाठ्यक्रम अधूरा रहा, तो इसकी जिम्मेदारी तय होनी चाहिए. वहीं, यदि परीक्षा में अनुचित सामग्री के इस्तेमाल की तैयारी हो रही है, तो उसे रोकने के लिए सख्त निगरानी भी जरूरी है.
महाविद्यालय प्रशासन को छात्रों की शिकायतों और कथित चिट प्रकरण की निष्पक्ष जांच कर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए. आखिर डिग्री की परीक्षा में विद्यार्थियों के ज्ञान और मेहनत का मूल्यांकन होना चाहिए या छोटे अक्षरों में तैयार प्रिंटआउट का?
रिपोर्ट: मनीष वर्णवाल

