लोहरदगा: केंद्र सरकार द्वारा जनगणना- 2027 की जनसंख्या गणना की तारीख घोषित किए जाने के साथ ही सरना धर्म कोड का मुद्दा एक बार फिर गरमा गया है. लोहरदगा सांसद सह कांग्रेस के छत्तीसगढ़ प्रभारी सुखदेव भगत ने अलग सरना धर्म कोड की मांग दोहराते हुए इसे आदिवासी अस्मिता और धार्मिक पहचान से जुड़ा सवाल बताया है.


केंद्र की 30 अक्टूबर की अधिसूचना के मुताबिक अधिकांश राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों में जनसंख्या गणना 25 जनवरी से 28 फरवरी 2027 तक होगी. इसके बाद 1 से 5 मार्च तक रिविजनल राउंड होगा.
सुखदेव भगत ने आरोप लगाया कि जनगणना की तारीख सामने आने के बावजूद अलग सरना धर्म कोड को लेकर अब तक अपेक्षित निर्णय नहीं हुआ है. उन्होंने कहा कि वे विधायक और प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष रहते हुए भी इस मांग को उठाते रहे हैं और सांसद बनने के बाद संसद में भी इसे उठाया.
‘आदिवासियों की अलग धार्मिक पहचान को मान्यता मिले’
भगत ने कहा कि आदिवासी समाज की अपनी पूजा पद्धति, परंपराएं, रीति-रिवाज और प्रकृति आधारित आस्था है. ऐसे में जनगणना में अलग सरना धर्म कोड की व्यवस्था नहीं होना आदिवासी समाज की धार्मिक पहचान के साथ अन्याय है. उन्होंने इसे मौलिक अधिकारों से जोड़ते हुए केंद्र सरकार से जनगणना से पहले निर्णय लेने की मांग की.
गौरतलब है कि झारखंड विधानसभा ने नवंबर 2020 में विशेष सत्र के दौरान अलग ‘सरना आदिवासी धर्म’ कोड की मांग वाला प्रस्ताव पारित कर केंद्र को भेजा था. यह मांग इसके बाद भी विभिन्न मंचों पर उठती रही है.
संसद में फिर मुद्दा उठाने की घोषणा
सांसद ने कहा कि वे सरना धर्म कोड के सवाल को संसद में फिर व्यापक स्तर पर उठाएंगे. उन्होंने चेतावनी दी कि यदि जनगणना में सरना धर्म कोड को स्थान नहीं दिया गया तो आदिवासी समाज देशव्यापी स्तर पर इसका विरोध करेगा.
भगत ने कांग्रेस नेता राहुल गांधी के पूर्व चुनावी बयान का भी उल्लेख करते हुए कहा कि INDIA गठबंधन की सरकार बनने पर सरना धर्म कोड लागू करने की बात कही गई थी. सांसद ने कहा कि जनगणना शुरू होने में अब कुछ ही महीने शेष हैं, इसलिए केंद्र को आदिवासी समाज की लंबे समय से चली आ रही मांग पर स्थिति स्पष्ट करनी चाहिए.

