जामताड़ा: सदर अस्पताल जामताड़ा से सरकारी एंबुलेंस में मरीजों के उपयोग में आने वाली एक्स-रे मशीन को अस्पताल से बाहर ले जाने के मामले में अब जांच तेज हो गई है. इंडिया न्यूज वायरल बिहार झारखंड में प्रमुखता से खबर प्रकाशित होने के बाद जामताड़ा के उपायुक्त सह जिला दंडाधिकारी आलोक कुमार ने मामले को गंभीरता से लेते हुए सिविल सर्जन डॉ. एसके मिश्रा को जांच कर दोषी पाए जाने वाले कर्मियों के विरुद्ध कार्रवाई करने का निर्देश दिया है. उपायुक्त ने जांच समिति को दो दिनों के भीतर रिपोर्ट सौंपने को कहा है.


खबर प्रकाशित होने के बाद स्वास्थ्य विभाग में इस मामले को लेकर हलचल तेज हो गई है. अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर किसके आदेश पर सदर अस्पताल की एक्स-रे मशीन को सरकारी एंबुलेंस में लादकर अस्पताल से बाहर ले जाया गया? क्या मशीन को बाहर ले जाने के लिए सक्षम अधिकारी से अनुमति ली गई थी, या फिर सरकारी संसाधनों के इस्तेमाल में निर्धारित प्रक्रिया की अनदेखी की गई? जांच में इन सवालों का जवाब तलाशना होगा.
एंबुलेंस में जीपीएस, ट्रैकिंग से खुल सकता है पूरा मामला
इस पूरे प्रकरण में एक महत्वपूर्ण पहलू सरकारी एंबुलेंस में लगा जीपीएस सिस्टम है. जिस एंबुलेंस से एक्स-रे मशीन को अस्पताल से बाहर ले जाया गया, उसमें जीपीएस उपलब्ध होने की बात सामने आई है. ऐसे में संबंधित अवधि का जीपीएस रिकॉर्ड खंगालने से एंबुलेंस की आवाजाही, उसके रूट और रुकने के स्थानों की जानकारी मिल सकती है. इससे मशीन को कहां ले जाया गया और पूरे घटनाक्रम में किन लोगों की भूमिका रही, इसकी जांच में मदद मिल सकती है.
यदि जांच के दौरान जीपीएस रिकॉर्ड, वाहन लॉगबुक, मशीन को बाहर ले जाने से संबंधित अनुमति-पत्र और मरम्मत के दस्तावेजों का मिलान किया जाता है, तो मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकती है. हालांकि, जीपीएस रिकॉर्ड से वाहन की आवाजाही का पता चल सकता है, लेकिन मशीन ले जाने का आदेश किसने दिया और उसका उद्देश्य क्या था, यह संबंधित दस्तावेजों एवं कर्मियों के बयान से ही स्पष्ट होगा.
टेक्नीशियन ने बताया था मरम्मत के लिए ले जाई गई मशीन
मशीन को एंबुलेंस से उतारने के दौरान अस्पताल के एक्स-रे टेक्नीशियन किरण कुमार ने इसे मरम्मत के लिए ले जाने की बात कही थी. यदि मशीन वास्तव में मरम्मत के लिए भेजी गई थी, तो यह जांच का विषय है कि इसकी जानकारी अस्पताल प्रबंधन को थी या नहीं और इसके लिए विधिवत अनुमति ली गई थी या नहीं.
साथ ही, मशीन को किस मरम्मत केंद्र या स्थान पर भेजा गया, उसे ले जाने का आदेश किस अधिकारी ने दिया, मरम्मत से संबंधित कोई कार्यादेश जारी हुआ था या नहीं और सरकारी एंबुलेंस के इस्तेमाल की स्वीकृति किसने दी थी—इन सभी बिंदुओं की जांच जरूरी है. जांच समिति को केवल मौखिक दावों के आधार पर निष्कर्ष निकालने के बजाय उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर जवाबदेही तय करनी होगी.
अस्पताल की निगरानी व्यवस्था पर भी उठे सवाल
इस मामले ने सदर अस्पताल में सरकारी संसाधनों की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े किए हैं. इससे पहले भी अस्पताल में मरीजों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएं उपलब्ध कराने को लेकर विवाद सामने आते रहे हैं. बीते 16 जुलाई को इलाज में लापरवाही के आरोप के बीच आक्रोशित परिजनों और स्थानीय लोगों ने अस्पताल में तोड़फोड़ की थी. उस घटना के बाद अस्पताल प्रबंधन की ओर से नौ लोगों के खिलाफ मामला दर्ज कराया गया था.
अस्पताल की व्यवस्था में सुधार के उद्देश्य से उपायुक्त ने पहले प्रशिक्षु उपसमाहर्ता को सप्ताह के सातों दिन निगरानी की जिम्मेदारी भी सौंपी थी. अब एक्स-रे मशीन को अस्पताल से बाहर ले जाने का मामला सामने आने के बाद निगरानी व्यवस्था की प्रभावशीलता पर भी सवाल उठ रहे हैं.
जांच समिति के सामने जवाबदेही तय करने की चुनौती
उपायुक्त के निर्देश पर मामले की जांच कर दो दिनों के भीतर रिपोर्ट सौंपने की जिम्मेदारी संबंधित जांच समिति को दी गई है। समिति में डॉ. नीलेश, डॉ. विशाल और प्रशिक्षु उपसमाहर्ता दिव्यांशु मिश्रा को शामिल किए जाने की जानकारी सामने आई है. समिति को घटनाक्रम के सभी पहलुओं की पड़ताल कर तथ्यों के आधार पर रिपोर्ट तैयार करनी होगी.
जांच के दौरान एंबुलेंस के जीपीएस रिकॉर्ड, लॉगबुक, मशीन को अस्पताल से बाहर ले जाने की अनुमति, मरम्मत से संबंधित दस्तावेज और संबंधित कर्मियों के बयान अहम साबित हो सकते हैं. इससे यह भी स्पष्ट हो सकेगा कि मशीन को बाहर ले जाने की प्रक्रिया नियमानुसार थी या इसमें किसी स्तर पर अनियमितता हुई.
अब निगाहें जांच रिपोर्ट पर
मामला सामने आने के बाद अब सबकी निगाहें जांच समिति की रिपोर्ट पर टिकी हैं. उपायुक्त ने दोषी पाए जाने वाले कर्मियों के विरुद्ध कार्रवाई के निर्देश दिए हैं. ऐसे में जांच में किसी भी तरह की अनियमितता सामने आने पर संबंधित लोगों की जिम्मेदारी तय करना महत्वपूर्ण होगा.
मरीजों के लिए उपलब्ध संसाधनों का इस्तेमाल मरीजों की सुविधा और अस्पताल की जरूरतों के अनुरूप होना चाहिए. यदि मशीन को मरम्मत के लिए ले जाने की प्रक्रिया नियमों के तहत हुई है, तो दस्तावेजों से यह स्पष्ट होना चाहिए. वहीं, यदि अनुमति या निर्धारित प्रक्रिया का उल्लंघन हुआ है, तो जवाबदेही तय करना जरूरी है. अब देखना होगा कि दो दिनों में जांच समिति किन तथ्यों को सामने लाती है और स्वास्थ्य विभाग इस मामले में क्या कार्रवाई करता है.
रिपोर्ट: मनीष बरनवाल

