
सरायकेला: विश्वविख्यात श्रीजगन्नाथ मंदिर में मंगलवार को आस्था और श्रद्धा के बीच पावन नेत्र उत्सव का आयोजन हुआ. अनासर (विश्राम काल) के बाद भगवान श्रीजगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा के नेत्रों का पुनः अंकन (नेत्रदान) किया गया. इसके साथ ही मंदिर के पट श्रद्धालुओं के लिए खोल दिए गए. जैसे ही भगवान के दर्शन हुए, मंदिर परिसर “जय जगन्नाथ” के जयघोष से गूंज उठा. बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं ने महाप्रभु के प्रथम दर्शन कर सुख, शांति और समृद्धि की कामना की.


नेत्र उत्सव के अवसर पर सरायकेला राजपरिवार के राजा प्रताप आदित्य सिंह देव ने मंदिर पहुंचकर विधि-विधान से पूजा-अर्चना की और राज्य व जनकल्याण की मंगलकामना की. वैदिक मंत्रोच्चार और पारंपरिक धार्मिक अनुष्ठानों के बीच संपन्न हुए इस आयोजन में सुबह से ही श्रद्धालुओं की लंबी कतारें लगी रहीं. शाम को श्रद्धालुओं के बीच महाप्रभु का महाप्रसाद भी वितरित किया जाएगा.
सनातन परंपरा के अनुसार स्नान पूर्णिमा पर 108 कलशों के पवित्र जल से महाभिषेक के बाद भगवान श्रीजगन्नाथ, बलभद्र और सुभद्रा लगभग 15 दिनों तक अनासर गृह में विश्राम करते हैं. इस दौरान श्रद्धालुओं को दर्शन नहीं होते. विश्राम काल समाप्त होने के बाद भगवान के नेत्रों का पुनः चित्रांकन किया जाता है, जिसे नेत्र उत्सव या नवयौवन दर्शन कहा जाता है. इसी दिन भगवान अपने नवीन एवं दिव्य स्वरूप में भक्तों को प्रथम दर्शन देते हैं.
अब ऐतिहासिक सरायकेला रथयात्रा की तैयारियां अंतिम चरण में पहुंच चुकी हैं. 16 जुलाई से शुरू होने वाली रथयात्रा में भगवान श्रीजगन्नाथ, भगवान बलभद्र और देवी सुभद्रा भव्य रथ पर सवार होकर मौसीबाड़ी के लिए प्रस्थान करेंगे. सरायकेला की रथयात्रा की सबसे अनूठी परंपरा यह है कि यहां भगवान दो दिनों में मौसीबाड़ी पहुंचते हैं. पहले दिन रथ गोपबंधु चौक तक पहुंचता है, जहां रात्रि विश्राम होता है, जबकि दूसरे दिन यात्रा पूरी कर भगवान मौसीबाड़ी पहुंचते हैं.
रथयात्रा और ऐतिहासिक जगन्नाथ मेले को लेकर पूरे शहर में उत्सव का माहौल है. प्रशासन और मेला समिति ने सुरक्षा, यातायात, पेयजल, स्वास्थ्य, साफ-सफाई तथा श्रद्धालुओं की सुविधा के लिए व्यापक तैयारियां पूरी कर ली हैं. झारखंड समेत देश के विभिन्न राज्यों से हजारों श्रद्धालुओं के सरायकेला पहुंचने की संभावना है.
प्रमोद सिंह (संपादक)





