
सरायकेला: शिक्षा के मंदिर में पारदर्शिता और निष्पक्षता की उम्मीद रखने वाले अभिभावकों व शिक्षकों के बीच एक बार फिर सवाल खड़े हो गए हैं. इस बार विवाद राष्ट्रीय स्तर की प्रतिष्ठित सुब्रतो कप फुटबॉल प्रतियोगिता में शिक्षकों की प्रतिनियुक्ति को लेकर है. आरोप है कि प्रखंड संसाधन केंद्र (बीआरसी) सरायकेला ने निष्पक्ष चयन प्रक्रिया को दरकिनार करते हुए फिर से उन्हीं विवादित छवि वाले शिक्षकों को जिम्मेदारी सौंप दी, जिनके नाम पहले भी चर्चाओं में रहे हैं. इससे न केवल खेल भावना पर सवाल उठे हैं, बल्कि शिक्षा विभाग की कार्यशैली भी कठघरे में आ गई है.


शिक्षा विभाग के सूत्रों के अनुसार प्रखंड संसाधन केंद्र सरायकेला में अब एक तथाकथित “मैडम राज” की चर्चा जोरों पर है. सूत्रों का दावा है कि सुब्रतो कप के लिए शिक्षकों की प्रतिनियुक्ति सूची कार्यालय में सामान्य प्रक्रिया के तहत तैयार नहीं की गई, बल्कि इसे गोपनीय तरीके से कहीं और तैयार किया गया. इसके बाद अंतिम समय में प्रखंड शिक्षा प्रसार पदाधिकारी दिनेश दंडपात से हस्ताक्षर कराकर सूची जारी कर दी गई, ताकि उसमें किसी प्रकार के संशोधन की संभावना न रहे.
अब पूरे प्रखंड में यह चर्चा का विषय बना हुआ है कि आखिर हर आयोजन और हर प्रतिनियुक्ति में बार- बार वही चेहरे क्यों दिखाई देते हैं. लोगों का आरोप है कि योग्य और अन्य शिक्षकों की अनदेखी कर कुछ चुनिंदा लोगों को लगातार प्राथमिकता दी जा रही है.
लोग यह भी सवाल उठा रहे हैं कि क्या इन शिक्षकों को विशेष संरक्षण प्राप्त है, या फिर इसके पीछे कोई और वजह है. चर्चा यहां तक है कि कहीं अधिकारियों पर किसी प्रकार का दबाव तो नहीं है, अथवा प्रतिनियुक्ति की प्रक्रिया में किसी प्रकार के आर्थिक लेन- देन का खेल तो नहीं चल रहा. हालांकि इन आरोपों की आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है.
सुब्रतो कप जैसी प्रतिष्ठित प्रतियोगिता में भी पक्षपात के आरोप लगने से अभिभावकों, खिलाड़ियों और खेलप्रेमियों में नाराजगी देखी जा रही है. उनका कहना है कि यदि जिम्मेदारियों के चयन में ही निष्पक्षता नहीं होगी तो खिलाड़ियों को समान अवसर मिलने की उम्मीद कैसे की जा सकती है.
फिलहाल प्रखंड शिक्षा प्रसार पदाधिकारी दिनेश दंडपात तथा प्रखंड संसाधन केंद्र की ओर से इन आरोपों पर कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया सामने नहीं आई है. ऐसे में पूरे मामले को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं जारी हैं. यदि इन आरोपों में सच्चाई है तो यह शिक्षा विभाग की पारदर्शिता और विश्वसनीयता पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है, वहीं विभाग का पक्ष सामने आने के बाद ही पूरे मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी.
प्रमोद सिंह
संपादक






