
सरायकेला: कांग्रेस छोड़ झारखंड मुक्ति मोर्चा (झामुमो) का दामन थामने वाले झारखंड आंदोलनकारी और शिक्षाविद केपी सोरेन को लेकर पार्टी के भीतर मतभेद अब सार्वजनिक होते नजर आ रहे हैं. एक प्रमुख अखबार में प्रकाशित रिपोर्ट में झामुमो जिलाध्यक्ष डॉ. शुभेंदु महतो के हवाले से केपी सोरेन को “स्लीपर सेल” बताए जाने के बाद जिले की राजनीति में नई बहस छिड़ गई है.


राजनीतिक जानकारों का मानना है कि किसी नए नेता के पार्टी में शामिल होने के तुरंत बाद इस तरह की सार्वजनिक टिप्पणी संगठन के भीतर चल रही असहजता की ओर संकेत करती है. खासकर तब, जब केपी सोरेन को 3 जून को पार्टी के प्रदेश महासचिव विनोद पांडे, सिंहभूम सांसद जोबा माझी, खरसावां विधायक दशरथ गागराई, ईचागढ़ विधायक सविता महतो और जिलाध्यक्ष डॉ. शुभेंदु महतो की मौजूदगी में औपचारिक रूप से झामुमो में शामिल कराया गया था.
हालांकि चर्चा इस बात को लेकर भी है कि पार्टी में शामिल कराए जाने के बाद अब तक केपी सोरेन की सदस्यता संबंधी औपचारिक प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है. इसे लेकर राजनीतिक गलियारों में कई तरह के सवाल उठ रहे हैं. हालांकि इस संबंध में अख़बार के जरिये जिलाध्यक्ष ने दावा किया है कि केपी सोरेन ने प्राथमिक सदस्यता को लेकर न तो आवेदन दिया है न ही उनसे संपर्क किया है. ऐसे में उस कार्यक्रम का क्या हुआ जिसमें दर्जनों पार्टी के पदाधिकारी और सैंकड़ो कार्यकर्ताओं की मौजदगी में केपी सोरेन पार्टी में शामिल हुए. क्या ये महज औपचारिकता थी या अखबारी ढोंग ? लोग अब इसकी चर्चा करने लगे हैं.
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि सरायकेला जिले में झामुमो पिछले कुछ चुनावों में अपेक्षित प्रदर्शन नहीं कर सकी है. वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव में सरायकेला विधानसभा क्षेत्र में पार्टी का वोट प्रतिशत घटा. इसके बाद विधानसभा चुनाव में भी पार्टी को हार का सामना करना पड़ा. वहीं आदित्यपुर नगर निगम चुनाव में पार्टी समर्थित मेयर प्रत्याशी को भी सफलता नहीं मिली. ऐसे में संगठन के भीतर नए चेहरों के आगमन को लेकर अलग- अलग धाराएं बनना स्वाभाविक माना जा रहा है.
विश्लेषकों का यह भी मानना है कि यदि कोई नेता अपने साथ नए सामाजिक वर्गों और समर्थकों को जोड़ने में सफल होता है, तो स्थानीय स्तर पर राजनीतिक प्रतिस्पर्धा बढ़ना भी स्वाभाविक है. यही वजह है कि केपी सोरेन को लेकर पार्टी के भीतर अलग- अलग राय सामने आ रही है. राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी है कि भविष्य में केपी सोरेन सरायकेला विधानसभा से एक मजबूत दावेदार बन सकते हैं.
इस पूरे विवाद पर प्रतिक्रिया देते हुए केपी सोरेन ने संयमित रुख अपनाया. उन्होंने कहा कि वह मुख्यमंत्री हेमंत सोरेन और सांसद जोबा माझी के कार्यों से प्रभावित होकर कांग्रेस छोड़कर झामुमो में आए हैं. पार्टी नेतृत्व का जो भी निर्णय होगा, वह उन्हें स्वीकार होगा. उन्होंने कहा कि उनका उद्देश्य संगठन को मजबूत करना और अधिक से अधिक लोगों को पार्टी से जोड़ना है, न कि किसी प्रकार का विवाद खड़ा करना.
फिलहाल “स्लीपर सेल” वाले बयान ने झामुमो की जिला इकाई में चल रही संभावित अंदरूनी खींचतान को राजनीतिक चर्चा का विषय बना दिया है. अब सभी की नजर इस बात पर है कि पार्टी नेतृत्व इस पूरे विवाद पर क्या रुख अपनाता है और संगठन के भीतर उठे इन सवालों का समाधान किस प्रकार करता है.


