आदित्यपुर: सरायकेला- खरसावां की राजनीति में लंबे समय से खामोश चल रहे झामुमो नेता और पूर्व भाजपा प्रत्याशी गणेश महाली ने अचानक ऐसी एंट्री मारी है, जिसने राजनीतिक गलियारों में चर्चाओं का बाजार गर्म कर दिया है. निकाय चुनाव के बाद लगभग राजनीतिक रूप से निष्क्रिय दिख रहे गणेश महाली गुरुवार को अचानक झारखंड क्षत्रिय संघ के अध्यक्ष शंभूनाथ सिंह के समर्थन में सामने आए और सीधे पूर्व मुख्यमंत्री चंपाई सोरेन पर निशाना साध दिया.


मामला आदित्यपुर के एस-टाइप चौक स्थित 3600 वर्गफीट जमीन और वहां हुए अतिक्रमण हटाओ अभियान से जुड़ा है. चंपाई सोरेन ने दो दिन पहले आरोप लगाया था कि शंभूनाथ सिंह के इशारे पर फुटपाथ दुकानदारों को हटाया गया है और प्रशासन को इस मामले में कार्रवाई करनी चाहिए. लेकिन अब शंभूनाथ सिंह और गणेश महाली दोनों ने इस आरोप को खारिज करते हुए पलटवार किया है.
गणेश महाली ने दावा किया कि जिस जमीन को लेकर विवाद खड़ा किया जा रहा है, वह आवास बोर्ड द्वारा पहले से आवंटित भूमि है, जिसे वर्ष 2011 में वैधानिक प्रक्रिया के तहत खरीदा गया था. उन्होंने यह भी याद दिलाया कि 2014 और 2019 के विधानसभा चुनाव में इसी स्थान पर उनका चुनावी कार्यालय संचालित हुआ था.
लेकिन इस पूरे विवाद का सबसे दिलचस्प पहलू जमीन नहीं, बल्कि गणेश महाली की मौजूदगी है. क्योंकि जिस शंभूनाथ सिंह के समर्थन में वे सामने आए हैं, उन्हें भाजपा और विशेष रूप से पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन मुंडा का करीबी माना जाता है. दूसरी ओर गणेश महाली आज झामुमो में हैं, लेकिन उनका राजनीतिक डीएनए भाजपा से जुड़ा रहा है. वे भाजपा के टिकट पर दो बार सरायकेला विधानसभा चुनाव लड़ चुके हैं.
राजनीतिक समीकरण तब बदले जब 2024 विधानसभा चुनाव से पहले चंपाई सोरेन भाजपा में शामिल हुए और भाजपा ने सरायकेला से उन्हें उम्मीदवार बना दिया. इसके बाद गणेश महाली ने भाजपा छोड़कर झामुमो का दामन थामा. हालांकि चुनावी नतीजों में उन्हें फिर हार का सामना करना पड़ा और तीसरी बार भी जीत उनसे दूर रह गई.
यहीं से राजनीतिक सवाल उठने शुरू होते हैं. आखिर झामुमो में रहते हुए गणेश महाली भाजपा समर्थक माने जाने वाले शंभूनाथ सिंह के पक्ष में क्यों उतर आए ? क्या यह सिर्फ एक स्थानीय विवाद है या इसके पीछे कोई बड़ा राजनीतिक संदेश छिपा है ?
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि झामुमो में गणेश महाली की सक्रियता पिछले दो- तीन महीने में काफी सीमित रही है. पार्टी के भीतर उनकी भूमिका भी पहले जैसी प्रभावशाली नहीं दिखी. ऐसे में भाजपा से जुड़े माने जाने वाले चेहरे के साथ सार्वजनिक मंच साझा करना कई संकेत दे रहा है.
इधर यह भी किसी से छिपा नहीं है कि अर्जुन मुंडा और चंपाई सोरेन के बीच राजनीतिक दूरी और अंदरूनी शीत युद्ध की चर्चा लंबे समय से होती रही है. ऐसे में गणेश महाली का यह कदम राजनीतिक पर्यवेक्षकों को नई संभावनाओं की ओर देखने के लिए मजबूर कर रहा है.
नगर निगम चुनाव भी इस पूरे घटनाक्रम का एक अहम हिस्सा माना जा रहा है. शंभूनाथ सिंह का आरोप है कि उनके समर्थित उम्मीदवारों को सहयोग नहीं मिलने के कारण कुछ लोग व्यक्तिगत और राजनीतिक दुर्भावना से प्रेरित होकर उन पर आरोप लगा रहे हैं. वहीं चंपाई खेमे का मानना है कि अतिक्रमण और स्थानीय हितों के मुद्दे को दबाने की कोशिश की जा रही है.
*अब बड़ा सवाल यह है कि क्या यह केवल जमीन विवाद है, या सरायकेला की राजनीति में नए समीकरणों की शुरुआत ?*
क्या गणेश महाली झामुमो में असहज हैं? क्या वे कोई नया राजनीतिक संदेश देना चाहते हैं ? क्या भाजपा और झामुमो के बीच खिंची रेखाओं के बीच कुछ नए पुल बन रहे हैं? या फिर यह केवल स्थानीय स्तर का एक सामरिक राजनीतिक दांव है ?
फिलहाल इन सवालों का जवाब भविष्य के गर्भ में है, लेकिन इतना तय है कि गणेश महाली की इस अप्रत्याशित सक्रियता ने सरायकेला की सियासत में नई बहस छेड़ दी है. आने वाले दिनों में यह विवाद सिर्फ जमीन तक सीमित रहेगा या बड़े राजनीतिक घटनाक्रम का आधार बनेगा, इस पर सबकी नजर टिकी हुई है.
सरायकेला की राजनीति में अक्सर शांत दिखने वाली सतह के नीचे गहरी हलचलें चलती रहती हैं. गणेश महाली की अचानक हुई वापसी, भाजपा से जुड़े माने जाने वाले चेहरे के समर्थन में खुलकर उतरना और चंपाई सोरेन पर सीधा हमला कई राजनीतिक संकेत दे रहा है. फिलहाल यह सिर्फ एक विवाद नहीं, बल्कि सरायकेला की बदलती राजनीतिक पटकथा का नया अध्याय दिखाई दे रहा है. आने वाले दिनों में अगर कोई बड़ा राजनीतिक उलटफेर होता है, तो उसकी शुरुआती आहट शायद यहीं से मानी जाएगी.



