मनोहरपुर : पश्चिम सिंहभूम जिले के मनोहरपुर प्रखंड अंतर्गत सारंडा क्षेत्र की विभिन्न समस्याओं को लेकर भारत आदिवासी पार्टी एवं वनाधिकार समिति ने राज्यपाल और जिला प्रशासन को ज्ञापन सौंपकर उच्च स्तरीय जांच तथा त्वरित कार्रवाई की मांग की है. ज्ञापन में जल जीवन मिशन योजना में करोड़ों रुपये की अनियमितता, ग्रामीणों को शुद्ध पेयजल नहीं मिलने तथा वर्षों से बसे वनग्रामों के लोगों को वनाधिकार पट्टा और मूलभूत सुविधाओं से वंचित रखने का आरोप लगाया गया है.

ज्ञापन में कहा गया है कि केंद्र एवं राज्य सरकार की महत्वाकांक्षी जल जीवन मिशन योजना के तहत मनोहरपुर प्रखंड के लाईलोर एवं मकरडा पंचायत सहित कई गांवों में जलमीनार और पाइपलाइन निर्माण कार्य कराया गया था. योजना का उद्देश्य गांवों तक पाइपलाइन के माध्यम से शुद्ध पेयजल पहुंचाना था. इसके लिए लगभग 53 करोड़ 28 लाख रुपये से अधिक की राशि खर्च की गई. इसके बावजूद अधिकांश गांवों में आज तक नियमित जलापूर्ति शुरू नहीं हो सकी है.
ग्रामीणों ने आरोप लगाया है कि कई स्थानों पर केवल मुख्य पाइपलाइन बिछाकर कार्य अधूरा छोड़ दिया गया, जबकि घर-घर नल कनेक्शन नहीं दिया गया. कुछ गांवों में जलमीनार बनकर तैयार है, लेकिन अब तक पानी की आपूर्ति शुरू नहीं हुई है. ग्रामीणों का कहना है कि विभागीय लापरवाही, तकनीकी खामियों और संवेदकों की उदासीनता के कारण करोड़ों रुपये खर्च होने के बावजूद लोग आज भी नदी-नाला का पानी पीने को मजबूर हैं.
ज्ञापन में पेयजल एवं स्वच्छता प्रमंडल चक्रधरपुर के उस दावे पर भी सवाल उठाया गया है, जिसमें पंचायत के नौ गांवों के 1196 परिवारों तक पाइपलाइन के माध्यम से शुद्ध पेयजल पहुंचाने की बात कही गई थी. ग्रामीणों ने इसे केवल कागजी उपलब्धि बताया है. मामले की SIT, विजिलेंस अथवा ACB से जांच कराने तथा दोषी अधिकारियों और संवेदकों पर कार्रवाई की मांग की गई है. साथ ही योजनाओं का तकनीकी एवं वित्तीय ऑडिट कराने की भी मांग उठाई गई है.
इसी के साथ सारंडा वन क्षेत्र में वर्षों से बसे वनवासियों के अधिकारों का मुद्दा भी प्रमुखता से उठाया गया. उपायुक्त पश्चिम सिंहभूम को सौंपे गए ज्ञापन में कहा गया है कि सारंडा के विभिन्न वनग्रामों में पिछले 30 से 35 वर्षों से लगभग 6000 से 7000 अनुसूचित जनजाति परिवार निवास कर रहे हैं. ये परिवार खेती और वनोपज पर निर्भर हैं, लेकिन आज भी शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, सड़क और बिजली जैसी बुनियादी सुविधाओं से वंचित हैं.
ज्ञापन में बताया गया कि वनाधिकार अधिनियम 2006 के तहत कई ग्रामीणों ने वर्ष 2020 में ही वनाधिकार पट्टा के लिए आवेदन दिया था, लेकिन अब तक पट्टा निर्गत नहीं किया गया है. ग्रामीणों का कहना है कि एक ओर सर्वोच्च न्यायालय द्वारा सारंडा क्षेत्र को वन्यजीव अभ्यारण्य घोषित करने की प्रक्रिया चल रही है, वहीं दूसरी ओर वर्षों से बसे वनवासियों के अधिकारों की अनदेखी की जा रही है.
भारत आदिवासी पार्टी एवं वनाधिकार समिति ने प्रशासन से मांग की है कि वर्ष 2005 से पूर्व से बसे वनग्रामों की पहचान कर उन्हें शीघ्र वनाधिकार पट्टा दिया जाए. साथ ही क्षेत्र के सभी वनग्रामों में शिक्षा, स्वास्थ्य, पेयजल, सड़क और बिजली जैसी मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने हेतु आवश्यक निर्देश जारी किए जाएं. संगठनों ने चेतावनी दी है कि यदि जल्द कार्रवाई नहीं हुई तो क्षेत्र में व्यापक जनआंदोलन किया जाएगा.
रिपोर्ट: ज्योतिष महाली



