सरायकेला: नगर पंचायत के पूर्व उपाध्यक्ष और समाजसेवी मनोज चौधरी ने शुक्रवार को स्थानीय कुम्हारों से मुलाकात कर उनके हाथों से बनाए गए मिट्टी के दीये, कलश और मूर्तियां खरीदीं. उन्होंने इस मौके पर “वोकल फॉर लोकल” का संदेश देते हुए कहा कि देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए हमें स्थानीय शिल्पकारों और माटी कला से जुड़े लोगों को प्रोत्साहित करना चाहिए.

मनोज चौधरी ने कहा कि हमारे पूर्वजों ने धार्मिक अनुष्ठानों, पर्व-त्योहारों और सोलह संस्कारों के माध्यम से एक स्वस्थ परंपरा स्थापित की थी, जिसमें सभी वर्गों को समान अवसर मिले. लेकिन आधुनिकता की चकाचौंध ने हमारी संस्कृति और परंपराओं को प्रभावित किया है. इसके दुष्प्रभाव से माटी शिल्प का पुश्तैनी कारोबार आज संकट में है.
उन्होंने कहा कि मिट्टी के दीये केवल सजावट का साधन नहीं, बल्कि हमारी संस्कृति, आस्था और पर्यावरण का प्रतीक हैं. जबकि झालरें और प्लास्टिक लाइटें बिजली की खपत बढ़ाने के साथ प्रदूषण भी फैलाती हैं. मनोज चौधरी ने भावुक अपील करते हुए कहा “आपका खरीदा हुआ एक दिया किसी गरीब कुम्हार परिवार के घर में दीपावली की खुशियां ला सकता है.”
उन्होंने कहा कि एक छोटा-सा दिया केवल रोशनी ही नहीं फैलाता, बल्कि यह संदेश देता है कि अंधकार चाहे कितना भी गहरा क्यों न हो, एक छोटी लौ भी उसे मिटा सकती है. यही भारतीय संस्कृति की आत्मा है, जो अब आधुनिकता की भीड़ में कहीं खोती जा रही है.
मनोज चौधरी ने आमजनों से अपील की कि इस दीपावली पर एक संकल्प लें — कृत्रिम रोशनी की बजाय मिट्टी के दीयों की सादगी को अपनाएं. अपने घर, मंदिर, आंगन और छत पर मिट्टी के दीये जलाएं और उन कुम्हार परिवारों के जीवन में भी रोशनी फैलाएं जिनके हाथों ने इस मिट्टी को आकार दिया है.

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