
सरायकेला: जिला शिक्षा विभाग एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में है. विभाग में कार्यरत बताई जा रही सांत्वना जेना की नियुक्ति, वर्षों से वेतन भुगतान, प्रभारी बीपीओ का अतिरिक्त दायित्व दिए जाने तथा लगभग 30 प्रतिशत वेतन वृद्धि (इंक्रीमेंट) मिलने के दावों ने विभागीय कार्यप्रणाली पर कई सवाल खड़े कर दिए हैं. विभागीय सूत्रों का कहना है कि यदि पूरे मामले की निष्पक्ष एवं दस्तावेजों के आधार पर जांच कराई जाए तो कई अहम तथ्य सामने आ सकते हैं. वहीं जिला शिक्षा पदाधिकारी कैलाश मिश्रा ने इस संबंध में अनभिज्ञता जताते हुए कहा कि उन्हें इस विषय की जानकारी नहीं है.


सूत्रों के अनुसार सांत्वना जेना पहले नेशनल प्रोग्राम फॉर एजुकेशन ऑफ गर्ल्स एट एलिमेंट्री लेवल (एनपीईजीईएल) योजना से जुड़ी थीं. यह योजना वर्ष 2010 के आसपास समाप्त हो गई. योजना बंद होने के बाद अधिकांश कर्मियों की सेवाएं समाप्त हो गईं, लेकिन बताया जाता है कि वे जिला शिक्षा कार्यालय से जुड़ी रहीं.
यहीं से सवाल उठना शुरू होता है. यदि योजना समाप्त हो चुकी थी, तो उसके बाद उनकी प्रशासनिक स्थिति क्या थी. किस आदेश के आधार पर उन्हें विभाग में कार्य करने की अनुमति मिली. यदि उन्हें किसी अन्य व्यवस्था के तहत रखा गया, तो उसके दस्तावेज क्या हैं.
सूत्रों के अनुसार सांत्वना जेना वर्ष 2010 के बाद से भी जिला शिक्षा विभाग में कार्यरत हैं, जबकि उनकी नियमित नियुक्ति से संबंधित स्पष्ट अभिलेख विभागीय फाइलों में उपलब्ध नहीं होने का दावा किया जा रहा है. आरोप है कि उन्हें प्रारंभ में दैनिक मजदूरी (डेली वेजेज) के आधार पर रखा गया था, लेकिन बाद में लगातार वेतन का भुगतान होता रहा. सूत्रों का दावा है कि पिछले लगभग 16 वर्षों के दौरान उन्हें विभाग से लाखों रुपये का वेतन मिला. यदि जांच में नियुक्ति प्रक्रिया नियमों के अनुरूप नहीं पाई जाती है तो सरकारी धन के उपयोग और वित्तीय जवाबदेही पर भी गंभीर प्रश्न खड़े हो सकते हैं.
मामले का सबसे चर्चित पहलू यह है कि सांत्वना जेना को प्रभारी बीपीओ (ब्लॉक कार्यक्रम पदाधिकारी) का अतिरिक्त प्रभार भी सौंपा गया. विभागीय सूत्रों का सवाल है कि यदि किसी कर्मचारी की नियुक्ति को लेकर ही विवाद है तो उसे इतने महत्वपूर्ण पद की जिम्मेदारी किस आधार पर दी गई. इस मुद्दे को लेकर विभाग के भीतर भी विभिन्न प्रकार की चर्चाएं होने का दावा किया जा रहा है.
सूत्रों का यह भी कहना है कि कई पूर्व जिला शिक्षा पदाधिकारियों ने इस मामले में कार्रवाई के लिए पत्राचार किया था, लेकिन उन पत्रों पर आगे कोई ठोस कार्रवाई नहीं हुई. कुछ लोगों का यह भी आरोप है कि कार्रवाई से जुड़े महत्वपूर्ण दस्तावेज समय के साथ फाइलों से गायब हो गए. हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है.
विभाग के कुछ कर्मचारियों ने नाम प्रकाशित नहीं करने की शर्त पर बताया कि यदि नियुक्ति से संबंधित पूरी फाइल सार्वजनिक कर दी जाए तो वास्तविक स्थिति स्वतः स्पष्ट हो जाएगी. उनका कहना है कि पूरे मामले की जांच जिला प्रशासन अथवा किसी स्वतंत्र एजेंसी से कराई जानी चाहिए.
मामले में एक और गंभीर दावा यह भी किया जा रहा है कि वर्तमान एडीपीओ प्रकाश कुमार के कार्यकाल में सांत्वना जेना को लगभग 30 प्रतिशत वेतन वृद्धि (इंक्रीमेंट) का लाभ दिया गया. सूत्रों का कहना है कि सामान्य परिस्थितियों में दैनिक मजदूरी पर कार्यरत कर्मियों को इस प्रकार का नियमित इंक्रीमेंट देने का कोई प्रावधान नहीं होता. यदि जांच में यह दावा सही पाया जाता है तो वित्तीय नियमों के पालन को लेकर भी सवाल उठ सकते हैं.
जब इस पूरे मामले पर जिला शिक्षा पदाधिकारी कैलाश मिश्रा से प्रतिक्रिया ली गई तो उन्होंने कहा कि “मुझे इस विषय की कोई जानकारी नहीं है. उनके इस बयान के बाद यह सवाल उठने लगा है कि यदि विभागाध्यक्ष को ही अपने विभाग में कार्यरत कर्मियों की नियुक्ति और पदस्थापन की जानकारी नहीं है, तो विभागीय व्यवस्था की निगरानी और जवाबदेही किस स्तर पर तय होगी.
अब जिले में इस मामले की उच्चस्तरीय जांच की मांग तेज हो रही है. मांग की जा रही है कि यह स्पष्ट किया जाए कि सांत्वना जेना की नियुक्ति किस आदेश के तहत हुई, उन्हें वर्षों तक किस आधार पर वेतन का भुगतान किया गया, प्रभारी बीपीओ का अतिरिक्त दायित्व किस नियम के तहत सौंपा गया तथा यदि किसी स्तर पर अनियमितता हुई है तो उसके लिए जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय की जाए.
यदि जांच में लगाए गए आरोप सही साबित होते हैं तो यह मामला केवल एक कर्मचारी तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि जिला शिक्षा विभाग की प्रशासनिक कार्यप्रणाली, नियुक्ति प्रक्रिया और वित्तीय अनुशासन पर भी बड़े सवाल खड़े करेगा। वहीं यदि आरोप निराधार पाए जाते हैं तो जांच से वास्तविक स्थिति भी सामने आ जाएगी.
प्रमोद सिंह (संपादक)





