“कलाकारों की दो टूक- सिर्फ भवन नहीं, मजबूत संस्थागत व्यवस्था से बचेगी विरासत”


सरायकेला: जिस छऊ ने सरायकेला को विश्व के सांस्कृतिक मानचित्र पर विशिष्ट पहचान दिलाई, आज उसी विरासत को सहेजने के लिए स्थापित सरकारी संस्था अपने भविष्य के एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ी है. शनिवार को उपायुक्त की अध्यक्षता में होने वाली बैठक पर छऊ कलाकारों, गुरुओं और कला प्रेमियों की निगाहें टिकी हैं. वर्षों से लंबित सवालों पर यदि बैठक में ठोस निर्णय लेकर प्रभावी प्रस्ताव राज्य सरकार को भेजा जाता है, तो यह राजकीय छऊ नृत्य कला केंद्र को संस्थागत रूप से मजबूत करने की दिशा में दशकों बाद बड़ी पहल साबित हो सकती है.
दुनिया ने छऊ को पहचाना, मगर उसका अपना केंद्र अब भी संसाधनों का मोहताज
वर्ष 1961 में तत्कालीन बिहार सरकार ने सरायकेला की विशिष्ट छऊ परंपरा के संरक्षण, प्रशिक्षण और संवर्धन के उद्देश्य से राजकीय छऊ नृत्य कला केंद्र की स्थापना की थी. इसके बाद सरायकेला छऊ ने राष्ट्रीय सीमाओं को पार कर अंतरराष्ट्रीय मंचों तक अपनी पहचान बनाई. छऊ को यूनेस्को की अमूर्त सांस्कृतिक विरासत में स्थान मिलने से इसकी वैश्विक प्रतिष्ठा और मजबूत हुई.
विडंबना यह है कि इस विश्व प्रसिद्ध कला का प्रमुख सरकारी प्रशिक्षण केंद्र आज भी नियमित नृत्य प्रशिक्षक, इंस्ट्रक्टर, वाद्य प्रशिक्षक और अन्य आवश्यक कर्मचारियों की कमी से जूझ रहा है. सीमित संसाधनों के बीच वरिष्ठ गुरुओं और कलाकारों की साधना ने परंपरा को जीवित रखा, लेकिन अब सवाल यह है कि क्या किसी विश्वस्तरीय सांस्कृतिक विरासत का भविष्य केवल व्यक्तिगत समर्पण के भरोसे छोड़ा जा सकता है?
छह दशक बाद संस्थागत पुनर्गठन की उम्मीद
सरायकेला छऊ आर्टिस्ट एसोसिएशन के अनुसार वर्षों के संघर्ष, लगातार पत्राचार और मांगों के बाद वर्ष 1961 में स्थापना के पश्चात पहली बार कार्यकारी समिति एवं स्टैंडिंग कमेटी के पुनर्गठन की दिशा में महत्वपूर्ण पहल हुई है. इसी कारण शनिवार की बैठक को सामान्य प्रशासनिक बैठक से कहीं अधिक महत्वपूर्ण माना जा रहा है.

राज्य सरकार की ओर से कला केंद्र के संरक्षण, संवर्धन और बेहतर संचालन से जुड़े चार महत्वपूर्ण विषयों पर मैनेजिंग कमेटी एवं स्टैंडिंग कमेटी से विचार-विमर्श कर ठोस प्रस्ताव विभाग को भेजने के निर्देश की बात सामने आई है. ऐसे में कलाकारों को उम्मीद है कि इस बार चर्चा केवल समस्याओं को दर्ज करने तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि उनके समाधान की स्पष्ट रूपरेखा भी बनेगी.
10 करोड़ का भवन महत्वपूर्ण, मगर भवन से ही नहीं बचेगी कला
राजकीय छऊ नृत्य कला केंद्र के लिए करीब 10 करोड़ रुपये की लागत से प्रस्तावित बहुउद्देशीय कला भवन की प्रक्रिया आगे बढ़ रही है. इसके साथ मौजूदा आधारभूत संरचना के विकास के लिए करीब 50 लाख रुपये का प्रस्ताव तैयार किए जाने की भी बात है. कलाकार इस पहल को जरूरी मानते हैं, लेकिन उनका स्पष्ट कहना है कि भव्य भवन छऊ को मंच दे सकता है, भविष्य नहीं. भविष्य के लिए गुरु, प्रशिक्षक, वाद्य विशेषज्ञ, नियमित प्रशिक्षण और मजबूत प्रशासनिक व्यवस्था चाहिए. यही वजह है कि बैठक में नियमित प्रशिक्षकों एवं आवश्यक कर्मचारियों की व्यवस्था के साथ 16 पदों पर पारदर्शी आउटसोर्सिंग का मामला भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है. कलाकार चाहते हैं कि आउटसोर्सिंग केवल पद भरने की प्रक्रिया न बने, बल्कि कला केंद्र की वास्तविक जरूरत और योग्य व्यक्तियों के चयन को प्राथमिकता देते हुए पूरी प्रक्रिया पारदर्शी रखी जाए.
प्रशिक्षण से शोध तक बने समग्र कार्ययोजना
कलाकारों की अपेक्षा है कि बैठक का दायरा केवल भवन, अनुदान और नियुक्ति तक सीमित नहीं हो. सरायकेला छऊ के प्रशिक्षण के साथ शोध, दस्तावेजीकरण, व्यवस्थित पाठ्यक्रम, वरिष्ठ गुरुओं के अनुभवों का संरक्षण और युवा कलाकारों के लिए पारदर्शी परियोजनाओं को एक समग्र योजना का हिस्सा बनाया जाए. छऊ जैसी परंपरागत कला में गुरु-शिष्य परंपरा की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण रही है. वरिष्ठ कलाकारों का मानना है कि आज भी कई ऐसे गुरु मौजूद हैं, जिनके पास दशकों का अनुभव और कला की दुर्लभ बारीकियां हैं. यदि उनके ज्ञान का व्यवस्थित दस्तावेजीकरण और नई पीढ़ी तक हस्तांतरण नहीं हुआ तो भविष्य में इस अमूल्य विरासत का एक हिस्सा हमेशा के लिए खो सकता है.
वरिष्ठों का अनुभव बचे, युवाओं को छऊ में दिखे भविष्य
सरायकेला छऊ आर्टिस्ट एसोसिएशन के अध्यक्ष भोला महांति ने कहा कि वर्षों बाद कला केंद्र को संस्थागत रूप से मजबूत करने का अवसर मिला है. ऐसे निर्णय होने चाहिए जिनसे वरिष्ठ कलाकारों के अनुभव का सम्मान हो और युवा कलाकारों को नियमित प्रशिक्षण के साथ रोजगार के अवसर मिलें. पूर्व निदेशक तपन कुमार पटनायक के अनुसार सरायकेला छऊ की परंपरा दशकों तक गुरु-शिष्य परंपरा और नियमित प्रशिक्षण से जीवित रही है. कला केंद्र में प्रशिक्षकों और आवश्यक कर्मियों की नियमित व्यवस्था प्रशिक्षण को स्थायित्व प्रदान करेगी.
छऊ विशेषज्ञ सुशील आचार्य ने प्रशिक्षण के साथ शोध, दस्तावेजीकरण और व्यवस्थित पाठ्यक्रम विकसित करने की आवश्यकता बताई. उनका मानना है कि सरायकेला छऊ की राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा के अनुरूप इसके अकादमिक पक्ष को भी मजबूत करना होगा.
वरिष्ठ कलाकार निवारण महतो ने वरिष्ठ गुरुओं की कला और अनुभव को संरक्षित कर नई पीढ़ी तक पहुंचाने पर जोर दिया. वहीं वरिष्ठ कलाकार तरुण भोल ने कहा कि युवा कलाकारों को परियोजनाओं के माध्यम से आर्थिक सहयोग के साथ नियमित एवं पारदर्शी रोजगार के अवसर मिलने चाहिए, ताकि प्रतिभाशाली युवा छऊ को केवल शौक नहीं, बल्कि अपना भविष्य भी बना सकें.
वर्षों के संघर्ष के बाद उम्मीद की निर्णायक घड़ी
सरायकेला छऊ आर्टिस्ट एसोसिएशन के संरक्षक मनोज कुमार चौधरी ने कहा कि वर्षों के संघर्ष और लगातार पत्राचार के बाद कई महत्वपूर्ण विषय आज निर्णायक स्थिति तक पहुंचे हैं. उम्मीद है कि बैठक में सरकार द्वारा मांगे गए चारों विषयों पर सकारात्मक चर्चा होगी और कला केंद्र के भविष्य को ध्यान में रखते हुए ठोस एवं समग्र प्रस्ताव विभाग को भेजा जाएगा. अब कलाकारों की निगाहें बैठक के नतीजों पर हैं. सवाल केवल यह नहीं कि 10 करोड़ का बहुउद्देशीय भवन कब बनेगा या 50 लाख रुपये से कौन-सी आधारभूत सुविधाएं विकसित होंगी. असली सवाल यह है कि क्या छह दशक से अधिक पुरानी इस सरकारी संस्था को अब स्थायी प्रशिक्षक, जरूरी मानव संसाधन, पारदर्शी प्रशासन, शोध एवं दस्तावेजीकरण और कलाकारों के लिए भविष्य की स्पष्ट नीति मिलेगी?
यदि शनिवार की बैठक इन सवालों का ठोस जवाब तलाशने में सफल होती है, तो यह सिर्फ एक कला केंद्र की प्रशासनिक व्यवस्था सुधारने का निर्णय नहीं होगा. यह उस सांस्कृतिक विरासत के प्रति राज्य की जिम्मेदारी तय करने की शुरुआत होगी, जिसने सरायकेला और झारखंड को दुनिया में पहचान दिलाई है. छऊ को दुनिया पहचान चुकी है. अब बारी उस संस्थान को पहचान, संसाधन और मजबूती देने की है, जिसने पीढ़ियों से इस विरासत की लौ जलाए रखी है.
प्रमोद सिंह (संपादक)

